- अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो 23 मई को भारत के दौरे पर आ रहे हैं. वे 26 मई तक यहां रहेंगे.
- अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने बताया कि इस दौरान वे कोलकाता, आगरा, जयपुर और राजधानी नई दिल्ली जाएंगे.
- भारत दौरे के अंतिम दिन मार्को रूबियो 26 मई को नई दिल्ली में क्वाड के विदेश मंत्रियों की बैठक में हिस्सा लेंगे.
पिछले करीब 25 सालों से अमेरिका की विदेश नीति में भारत को एक बेहद अहम साझेदार माना जाता रहा है. रिपब्लिकन हो या डेमोक्रेट, हर अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत को चीन के मुकाबले एक मजबूत रणनीतिक साथी के रूप में देखा. लेकिन अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में तस्वीर थोड़ी अलग दिखने लगी है. इसी हफ्ते अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो भारत दौरे पर आ रहे हैं. उनकी यह यात्रा कई मायनों में खास है. विदेश मंत्री बनने के बाद भारत आ रहे मार्को रूबियो की यह यात्रा केवल नई दिल्ली तक ही सीमित नहीं रहेगी. उनके कोलकाता, आगरा और जयपुर जाने का भी कार्यक्रम है. ऐसे में यह एक सामान्य कूटनीतिक यात्रा नहीं मानी जा रही है.
कोलकाता में वे ऐतिहासिक अमेरिकी वाणिज्य दूतावास और मदर टेरेसा से जुड़े स्थलों का दौरा कर सकते हैं. आगरा में ताजमहल और जयपुर में राजस्थानी विरासत को दिखाने की तैयारी है. जानकारों का मानना है कि यह दौरा सिर्फ सरकारी बैठकों तक सीमित नहीं रखा गया ताकि अमेरिका भारत के समाज, संस्कृति और जनता से भी जुड़ाव दिखा सके. पर इन सब के बीच लेकिन असली सवाल कहीं बड़ा है.
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दरअसल, रूबियों का यह दौरा ऐसे समय हो रहा है जब वॉशिंगटन की विदेश नीति में बड़ा बदलाव दिख रहा है.
पहले अमेरिका, चीन को रोकने के लिए भारत को प्राथमिकता देता था. इंडो-पैसिफिक रणनीति में भारत अहम था. क्वाड को चीन के खिलाफ संतुलन माना जाता था. लेकिन अब ट्रंप प्रशासन की प्राथमिकताएं बदलती दिख रही हैं.

ट्रंप की नई विदेश नीति क्या कहती है?
ट्रंप की सोच पारंपरिक अमेरिकी विदेश नीति से काफी अलग मानी जाती है. वे रिश्तों को वैचारिक या रणनीतिक साझेदारी से ज्यादा डील और व्यापारिक फायदे के नजरिए से देखते हैं.
यही कारण है कि उन्होंने पहले भारत पर भारी टैरिफ लगाए. चीन यात्रा की खुलकर तारीफ की. पाकिस्तान के साथ अपने संपर्क को बढ़ाया और इस दरम्यान राष्ट्रीय सुरक्षा नीति में भारत का जिक्र सीमित रखा.
ट्रंप की नीति में यह बदलाव निश्चित तौर पर भारत के लिए चिंता पैदा करने वाला है क्योंकि भारत के लिए अमेरिका सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है.
भारत-अमेरिका रिश्तों का पुराना फॉर्मूला
1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद शुरू हुई नई साझेदारी धीरे-धीरे बेहद मजबूत होती गई. दोनों देशों के पास आने के पीछे अमेरिका को यह लगता था कि चीन तेजी से सुपरपावर बन रहा है ऐसे में एशिया में संतुलन साधने के लिए भारत जरूरी है. दोनों देशों के बीच मजबूत लोकतांत्रिक ढांचे की वजह से यह भारत ही था जो अमेरिका का स्वाभाविक साझेदार बन सकता था.
इसी सोच के तहत रक्षा सहयोग बढ़ा, टेक्नोलॉजी साझेदारी हुई, क्वाड मजबूत हुआ. सैन्य अभ्यास भी बढ़े और व्यापार नई ऊंचाईयों तक पहुंचा.
पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडन के कार्यकाल में यह साझेदारी और भी मजबूत हुई.
अब क्यों उठ रहे सवाल?
डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल में भी दोनों देशों के संबंध प्रगाढ़ थे पर जानकारों का कहना है कि उनके दूसरे कार्यकाल में विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में चीन फर्स्ट नीति उतनी स्पष्ट नहीं दिख रही है जितनी पहले थी.
हडसन इंस्टीट्यूट से जुड़ी अपर्णा पांडे के मुताबिक दोनों देशों के बीच व्यापार और रक्षा सहयोग अब भी बढ़ रहा है लेकिन रणनीतिक गहराई कमजोर पड़ती दिख रही है. शीत युद्ध के दौर वाले कई पुराने तनाव फिर लौटते दिख रहे हैं.
उनका कहना है कि पहले चीन के खिलाफ साझा रणनीति दोनों देशों को जोड़कर रखती थी. अब वो कमजोर पड़ती नजर आ रही है.

पाकिस्तान फिर क्यों अहम होने लगा?
यह इस कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा है. एक समय था जब अमेरिका ने पाकिस्तान से दूरी बनाकर भारत को प्राथमिकता दी थी. लेकिन अब पाकिस्तान फिर अमेरिकी रणनीति में जगह बनाता दिख रहा है. इसके पीछे कई वजहें हैं.
1. पाकिस्तान की ट्रंप से करीबी
पाकिस्तानी नेतृत्व लगातार ट्रंप की तारीफ करता रहा है. यहां तक कि पिछले साल भारत-पाक संघर्ष रुकवाने का श्रेय भी ट्रंप को दिया गया. पाकिस्तान ने तो ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार के योग्य तक बताया.
2. पश्चिम एशिया में भूमिका
ईरान युद्ध के दौरान पाकिस्तान ने मध्यस्थता की कोशिशों में सक्रिय भूमिका निभाई. इससे वॉशिंगटन में उसकी उपयोगिता फिर बढ़ी.
3. रणनीतिक संतुलन
अमेरिका अब सिर्फ भारत पर निर्भर रहकर एशिया नीति नहीं बनाना चाहता. वह कई विकल्प खुले रखना चाहता है.

Photo Credit: AFP
मोदी-ट्रंप रिश्तों में भी आई दूरी?
पहले कार्यकाल में डोनाल्ड ट्रंप और नरेंद्र मोदी की केमिस्ट्री काफी चर्चित रही. हाउडी मोदी कार्यक्रम हो या अहमदाबाद का नमस्ते ट्रंप इवेंट या फिर क्रिकेट स्टेडियम की विशाल रैलियां. इन सबने दोनों नेताओं की दोस्ती को वैश्विक सुर्खियों में ला दिया था.
दोनों नेताओं में राष्ट्रवाद, मजबूत नेतृत्व वाली छवि, बहुसंख्यक समुदाय की राजनीति और पॉपुलिस्ट स्टाइल जैसी कुछ राजनीतिक समानताएं भी देखी जाती हैं. लेकिन अब रिश्तों में पहले जैसी गर्मजोशी कम दिखाई दे रही है.
इसके पीछे अहम कारण- पिछले साल भारत-पाकिस्तान संघर्ष के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने मध्यस्थता का दावा किया था. लेकिन भारत ने सार्वजनिक तौर पर इस भूमिका को ज्यादा महत्व नहीं दिया. कहा जाता है कि इससे ट्रंप नाराज हुए. दूसरी तरफ पाकिस्तान लगातार ट्रंप की भूमिका की तारीफ करता रहा.
क्वाड बैठक क्यों अहम होगी?
रूबियो नई दिल्ली में क्वाड देशों के विदेश मंत्रियों से भी मुलाकात करेंगे.
भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया क्वाड में शामिल हैं. क्वाड को लंबे समय से चीन के प्रभाव को संतुलित करने वाले मंच के तौर पर देखा जाता है.
इस बैठक पर सबकी नजर रहेगी क्योंकि इससे यह संकेत मिल सकता है कि- क्या अमेरिका इंडो-पैसिफिक रणनीति पर पहले जैसा फोकस रखेगा? क्या चीन के खिलाफ साझेदारी जारी रहेगी? या ट्रंप प्रशासन प्राथमिकताएं बदल रहा है?

सर्गियो गोर
सर्गियो गोर कौन हैं और क्यों चर्चा में?
भारत में अमेरिका के राजदूत सर्गियो गोर इस पूरे दौरे के प्रमुख रणनीतिक चेहरों में माने जा रहे हैं. वे ट्रंप के बेहद करीबी माने जाते हैं और ट्रंप प्रशासन में नियुक्तियों को लेकर उनकी मजबूत पकड़ बताई जाती है.
रिपोर्ट्स के मुताबिक, उन्होंने भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को आगे बढ़ाने में भूमिका निभाई. ट्रंप के करीबी सर्कल में उनकी मजबूत पकड़ है. वे कई विदेशी दौरों में रूबियो के साथ भी दिखे हैं. इसलिए माना जा रहा है कि उनका असर भारत नीति पर भी पड़ सकता है.
भारत क्या सोच रहा है?
ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूट की विशेषज्ञ तन्वी मदान के मुताबिक भारत अभी बहुत सावधानी से आगे बढ़ रहा है.
उनका मानना है कि भारत टैरिफ विवाद पर आक्रामक प्रतिक्रिया नहीं दे रहा. ट्रंप से सार्वजनिक टकराव से बच रहा है और लंबी अवधि के रिश्तों को प्राथमिकता दे रहा है.
उनका कहना है कि भारत को यह समझ है कि अमेरिका के साथ मजबूत रिश्ते उसकी रणनीतिक और आर्थिक जरूरतें हैं. पर साथ ही भारत यह भी जानना चाहता है कि- क्या अमेरिका अब भी भारत को चीन संतुलन की रणनीति का केंद्र मानता है? या ट्रंप प्रशासन के लिए रिश्ते सिर्फ व्यापार और तात्कालिक फायदों तक सीमित रहेंगे?

क्या बदल सकती है पूरी रणनीति?
जानकार मानते हैं कि भारत-अमेरिका रिश्ते पूरी तरह टूटने वाले नहीं हैं. इसके पीछे कई मजबूत कारण हैं. इसमें दोनों देशों के बीच साझा हित, चीन की बढ़ती ताकत, रक्षा सहयोग, टेक्नोलॉजी सप्लाई चेन, सेमीकंडक्टर, इंडो-पैसिफिक सुरक्षा और व्यापार अहम हैं.
इन सब वजहों से दोनों देशों को साथ रहना जरूरी लगता है.
लेकिन फर्क इतना है कि पहले जहां रिश्तों में रणनीतिक भरोसा सबसे ऊपर था, अब लेन-देन आधारित राजनीति ज्यादा दिख सकती है.

भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती क्या?
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अमेरिका से रिश्ते मजबूत रखे लेकिन पूरी तरह किसी एक खेमे पर निर्भर भी न हो. इसीलिए भारत रूस से भी रिश्ते बनाए हुए है. मिडिल ईस्ट में संतुलन रख रहा है. क्वाड में भी सक्रिय है और ब्रिक्स में भी शामिल है.
नई दिल्ली की कोशिश यही है कि बदलती वैश्विक राजनीति में वह अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखे.
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