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अटकलों से हकीकत की ओर 'ऑपरेशन टाइगर'! समझिए उद्धव सेना में बिखराव और दिल्ली की बड़ी रणनीति का पूरा समीकरण

महाराष्ट्र की राजनीति में चर्चित 'ऑपरेशन टाइगर' अब सियासी हकीकत बनता नजर आ रहा है. शिवसेना (UBT) के 6 सांसदों द्वारा अलग समूह बनाने की तैयारी से उद्धव ठाकरे गुट को बड़ा झटका लग सकता है.

अटकलों से हकीकत की ओर 'ऑपरेशन टाइगर'! समझिए उद्धव सेना में बिखराव और दिल्ली की बड़ी रणनीति का पूरा समीकरण
बगावत के बाद उद्धव ठाकरे ने सहानुभूति और संघर्ष की राजनीति के सहारे अपने संगठन को बचाए रखा
  • शिवसेना के 6 सांसद अलग संसदीय समूह बनाने की योजना पर काम कर रहे हैं.
  • ऑपरेशन टाइगर पिछले डेढ़ वर्ष से चल रही रणनीति है, जिसमें उद्धव गुट और शिंदे खेमे के सांसदों के बीच संपर्क था.
  • शिवसेना के स्थापना दिवस पर छह सांसदों के शिंदे गुट में शामिल होने का राजनीतिक संदेश महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
मुंबई:

महाराष्ट्र की राजनीति में पिछले कई महीनों से जिस 'ऑपरेशन टाइगर' की चर्चा महज राजनीतिक अफवाह या मीडिया की अटकलें मानी जा रही थी, वह अब हकीकत का रूप लेती दिखाई दे रही है. शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के 6 सांसदों द्वारा अलग संसदीय समूह बनाने की कवायद और लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष पहुंची गतिविधियों ने संकेत दे दिया है कि 2022 में हुई शिवसेना की ऐतिहासिक टूट के बाद अब पार्टी को संसद में भी बड़ा झटका लग सकता है. राजनीतिक गलियारों में सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि 6 सांसद क्यों जा रहे हैं, बल्कि उससे बड़ा सवाल यह है कि यह सब अभी क्यों हो रहा है?

ऑपरेशन टाइगर... कई महीनों से चल रही थी तैयारी

सूत्रों के अनुसार यह घटनाक्रम अचानक नहीं है. पिछले डेढ़ वर्ष से उद्धव गुट के कुछ सांसदों और एकनाथ शिंदे खेमे के बीच संपर्क बना हुआ था. सही समय का इंतजार किया जा रहा था. कई बार मुंबई और दिल्ली में गुप्त बैठकों की चर्चा सामने आई. शिंदे और कुछ सांसदों की मुलाकातों की खबरें भी आईं, जिन्हें शिवसेना (UBT) लगातार खारिज करती रही. हालांकि, हाल के दिनों में इन चर्चाओं पर न तो शिंदे खेमे की ओर से जोरदार खंडन आया और न ही शिंदे की राजनीतिक गतिविधियों ने इन अटकलों को पूरी तरह नकारा. दिलचस्प बात यह है कि कुछ दिन पहले तक उद्धव ठाकरे खेमे के नेता संजय राउत सभी नौ सांसदों के एकजुट होने का दावा कर रहे थे, लेकिन उसके बाद घटनाक्रम तेजी से बदला और छह सांसदों के अलग समूह बनाने की खबरें सामने आ गईं.

19 जून का राजनीतिक संदेश... शिवसेना स्थापना दिवस पर दूसरा झटका?

परेशन टाइगर के लिए चुनी गई तारीख भी बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है. 19 जून को शिवसेना का 60वां स्थापना दिवस है. 2022 में एकनाथ शिंदे ने संगठनात्मक स्तर पर उद्धव ठाकरे को सबसे बड़ा झटका दिया था. अब यदि स्थापना दिवस के आसपास ही 6 सांसद शिंदे गुट के साथ औपचारिक रूप से जुड़ते हैं, तो यह सिर्फ संख्या बढ़ाने का मामला नहीं होगा, बल्कि बालासाहेब ठाकरे की विरासत पर राजनीतिक दावे की लड़ाई में एक प्रतीकात्मक संदेश भी होगा. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि स्थापना दिवस के मौके पर यह घटनाक्रम उद्धव ठाकरे की नेतृत्व क्षमता और संगठन पर पकड़ को लेकर नए सवाल खड़े कर सकता है.

ऑपरेशन टाइगर का सबसे महत्वपूर्ण पहलू दिल्ली की राजनीति से जुड़ा माना जा रहा है. जुलाई में संसद का मानसून सत्र शुरू होने वाला है. ऐसे समय में यदि 6 सांसद एनडीए खेमे के साथ आते हैं, तो लोकसभा में एनडीए की ताकत और बढ़ेगी. राजनीतिक सूत्रों का दावा है कि केंद्र सरकार भविष्य में महिला आरक्षण के पूर्ण क्रियान्वयन से जुड़े प्रावधानों तथा परिसीमन जैसे संवेदनशील संवैधानिक मुद्दों को आगे बढ़ाने की तैयारी में है, जिसके लिए व्यापक राजनीतिक समर्थन और संवैधानिक संशोधन स्तर पर मजबूत संख्या की जरूरत पड़ सकती है. हालांकि, सरकार की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है. लेकिन विपक्षी दल लंबे समय से आरोप लगाते रहे हैं कि केंद्र भविष्य की संसदीय रणनीति के लिए संख्या बल मजबूत करने में जुटा है.

शिंदे के लिए डबल फायदा

यदि छह सांसद शिंदे गुट में शामिल होते हैं, तो संसद में शिंदे शिवसेना की संख्या सात से बढ़कर 13 तक पहुंच सकती है. यह संख्या सिर्फ सांकेतिक नहीं होगी, बल्कि सत्ता समीकरणों में भी उसका असर दिखाई देगा. राजनीतिक सूत्रों का मानना है कि 13 सांसदों के साथ शिंदे गुट केंद्र में अधिक प्रभावशाली भूमिका की मांग कर सकता है. वर्तमान में शिवसेना के हिस्से में केंद्रीय राज्यमंत्री का प्रतिनिधित्व है, लेकिन संख्या बढ़ने पर कैबिनेट मंत्री पद की मांग भी मजबूत हो सकती है. इससे एकनाथ शिंदे की राष्ट्रीय राजनीति में स्वीकार्यता और भूमिका दोनों बढ़ेंगी.

महाराष्ट्र में भी बदल सकता है शक्ति संतुलन

राज्य की राजनीति में भी इसका बड़ा प्रभाव पड़ सकता है. महाराष्ट्र में महायुति के भीतर भाजपा सबसे बड़ी पार्टी है, लेकिन लोकसभा सांसदों की संख्या के लिहाज से यदि शिंदे गुट 13 सांसदों तक पहुंचता है, तो वह भाजपा और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (अजित पवार) के मुकाबले खुद को अधिक प्रभावशाली सहयोगी के रूप में पेश कर सकेगा. यह स्थिति आगामी स्थानीय निकाय चुनावों, विधान परिषद की रणनीति और भविष्य के मंत्रिमंडलीय समीकरणों को भी प्रभावित कर सकती है.

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क्या यह सिर्फ शिवसेना तक सीमित है?

दिल्ली में पिछले कुछ समय से विभिन्न विपक्षी दलों के सांसदों में असंतोष की खबरें सामने आती रही हैं. तृणमूल कांग्रेस में भी अंदरूनी खींचतान और संभावित टूट की चर्चाएं रही हैं. इसी पृष्ठभूमि में ऑपरेशन टाइगर को देखा जा रहा है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा और एनडीए की दीर्घकालिक रणनीति क्षेत्रीय दलों के प्रभाव को सीमित करते हुए संसद में अपना समर्थन आधार मजबूत करना हो सकती है.

उद्धव ठाकरे की सबसे बड़ी चुनौती

2022 में विधायकों की बगावत के बाद उद्धव ठाकरे ने सहानुभूति और संघर्ष की राजनीति के सहारे अपने संगठन को बचाए रखा. लेकिन यदि संसद में भी दो-तिहाई सांसदों का समूह अलग होता है, तो यह उनके लिए सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक और संगठनात्मक झटका होगा. इसी खतरे को देखते हुए सांसद अरविंद सावंत ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर किसी भी अलग गुट को मान्यता न देने और किसी भी निर्णय से पहले शिवसेना (UBT) का पक्ष सुनने की मांग की है.

ऑपरेशन टाइगर का असली लक्ष्य क्या?

ऑपरेशन टाइगर को सिर्फ छह सांसदों की बगावत के रूप में देखना अधूरा विश्लेषण होगा. इसके पीछे महाराष्ट्र की सत्ता, शिवसेना की विरासत, एनडीए की संसदीय ताकत और भविष्य के संवैधानिक एजेंडे की राजनीति एक साथ जुड़ी दिखाई देती है. यदि 19 जून को यह राजनीतिक ऑपरेशन पूरी तरह सफल होता है, तो यह केवल उद्धव ठाकरे के लिए एक और झटका नहीं होगा, बल्कि 2026 की राष्ट्रीय राजनीति में शक्ति संतुलन बदलने वाली घटना भी साबित हो सकती है. फिलहाल इतना तय है कि "ऑपरेशन टाइगर" अब अफवाह नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित अभियानों में से एक बन चुका है.

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अभिषेक सुरेशकुमार अवस्थी
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