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वंचितों के प्रतिनिधित्व पर सियासी बहस तेज, लेकिन देश में फिलहाल एक भी दलित मुख्यमंत्री नहीं

आज देश के किसी भी राज्य में दलित समुदाय से आने वाला कोई मुख्यमंत्री नहीं है. इतना ही नहीं, स्वतंत्रता के बाद से अब तक देश में केवल 8 दलित नेता ही मुख्यमंत्री पद तक पहुंच पाए हैं.

वंचितों के प्रतिनिधित्व पर सियासी बहस तेज, लेकिन देश में फिलहाल एक भी दलित मुख्यमंत्री नहीं
स्वतंत्रता के बाद से अब तक देश में केवल 8 दलित नेता ही मुख्यमंत्री पद तक पहुंच पाए हैं.
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देश में इन दिनों दलितों और वंचित वर्गों के प्रतिनिधित्व को लेकर राजनीतिक बहस तेज है. कांग्रेस नेता राहुल गांधी लगातार यह सवाल उठा रहे हैं कि सत्ता, नौकरशाही और नीति निर्धारण की संस्थाओं में दलितों की भागीदारी उनकी आबादी के अनुपात में नहीं है. समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव भी सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व के मुद्दे को प्रमुखता से उठा रहे हैं. दूसरी ओर बीजेपी का कहना है कि उसकी सरकारों ने दलितों और पिछड़े वर्गों को पहले की तुलना में अधिक अवसर दिए हैं.

इस राजनीतिक बहस के बीच एक तथ्य बेहद दिलचस्प है. आज देश के किसी भी राज्य में दलित समुदाय से आने वाला कोई मुख्यमंत्री नहीं है. इतना ही नहीं, स्वतंत्रता के बाद से अब तक देश में केवल 8 दलित नेता ही मुख्यमंत्री पद तक पहुंच पाए हैं. यह आंकड़ा बताता है कि देश की राजनीति में दलित नेतृत्व की मौजूदगी अभी भी बेहद सीमित रही है.

देश के पहले दलित मुख्यमंत्री बने थे दामोदरम संजीवय्या

भारत के पहले दलित मुख्यमंत्री बनने का गौरव दामोदरम संजीवय्या को हासिल है. उन्होंने 1960 में अविभाजित आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी. उस दौर में किसी दलित नेता का किसी बड़े राज्य की सत्ता संभालना भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण घटना माना गया था. संजीवय्या बाद में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी बने.

बिहार ने दिए सबसे ज्यादा दलित मुख्यमंत्री

दलित मुख्यमंत्री देने के मामले में बिहार सबसे आगे रहा है. यहां अब तक तीन दलित नेता मुख्यमंत्री बने हैं.

सबसे पहले भोला पासवान शास्त्री मुख्यमंत्री पद तक पहुंचे. वे बिहार के मुख्यमंत्री पद पर तीन बार रहे. इसके बाद राम सुंदर दास राज्य के मुख्यमंत्री बने. कई दशक बाद जीतन राम मांझी ने भी राज्य की सत्ता संभाली और मुख्यमंत्री पद तक पहुंचे. इस तरह बिहार देश का अकेला राज्य है जहां तीन अलग-अलग दलित नेताओं को मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला.

मायावती सबसे सफल दलित मुख्यमंत्री

देश की राजनीति में जब भी दलित नेतृत्व की बात होती है तो सबसे बड़ा नाम मायावती का सामने आता है. बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती उत्तर प्रदेश की चार बार मुख्यमंत्री रहीं. वह न केवल देश की सबसे चर्चित दलित नेता हैं, बल्कि अब तक की सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाली दलित नेता भी मानी जाती हैं.

मायावती ने दलित राजनीति को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दी और उत्तर प्रदेश जैसे देश के सबसे बड़े राज्य में बहुजन राजनीति को सत्ता तक पहुंचाया.

पंजाब में चन्नी ने रचा था इतिहास

साल 2021 में चरणजीत सिंह चन्नी पंजाब के मुख्यमंत्री बने थे. उनके मुख्यमंत्री बनने के साथ ही पहली बार पंजाब को दलित समुदाय से आने वाला मुख्यमंत्री मिला. पंजाब उन राज्यों में शामिल है जहां दलित आबादी का प्रतिशत देश में सबसे अधिक है, इसलिए चन्नी का मुख्यमंत्री बनना राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना गया था.

महाराष्ट्र और राजस्थान को भी मिले दलित मुख्यमंत्री

महाराष्ट्र में कांग्रेस नेता सुशीलकुमार शिंदे मुख्यमंत्री बने थे. शिंदे बाद में केंद्रीय मंत्री और राज्यपाल जैसे महत्वपूर्ण पदों पर भी रहे.

वहीं राजस्थान में जगन्नाथ पहाड़िया मुख्यमंत्री बने. वे राज्य के पहले और अब तक के एकमात्र दलित मुख्यमंत्री रहे हैं. हालांकि उनका कार्यकाल अपेक्षाकृत छोटा रहा, लेकिन उनका मुख्यमंत्री बनना सामाजिक प्रतिनिधित्व के लिहाज से बड़ी घटना माना गया.

प्रतिनिधित्व की बहस के केंद्र में यही सवाल

देश में अनुसूचित जाति (एससी) समुदाय की आबादी करोड़ों में है और संसद, विधानसभा तथा स्थानीय निकायों में उनके लिए आरक्षण की व्यवस्था भी है. इसके बावजूद मुख्यमंत्री जैसे सर्वोच्च निर्वाचित पदों पर दलित नेताओं की संख्या बेहद कम रही है. यही कारण है कि प्रतिनिधित्व को लेकर चल रही बहस में मुख्यमंत्री पद का मुद्दा बार-बार उठाया जा रहा है.

राजनीतिक दल भले ही दलित सशक्तिकरण के अपने-अपने दावे करते हों, लेकिन स्वतंत्र भारत के इतिहास पर नजर डालें तो तस्वीर साफ दिखती है. लगभग आठ दशक में सिर्फ 8 दलित नेताओं का मुख्यमंत्री पद तक पहुंचना बताता है कि सत्ता के शीर्ष पदों पर दलित प्रतिनिधित्व अभी भी सीमित रहा है.

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