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नेपाल की तबाही के बाद उत्तराखंड अलर्ट मोड में, सरस्वती ताल और केदारताल का वैज्ञानिक सर्वे शुरू

उत्तराखंड में चमोली के सरस्वती ताल और उत्तरकाशी के केदारताल का वैज्ञानिक सर्वे शुरू किया गया है. विशेषज्ञ झीलों के जलस्तर, जोखिम और खतरे का आकलन करेंगे.

उत्तराखंड में 13 संवेदनशील ग्लेशियर झीलों का सर्वे शुरू हो गया है.

नेपाल में हाल ही में आई विनाशकारी जलप्रलय के बाद उत्तराखंड सरकार ने हिमालयी क्षेत्रों में मौजूद ग्लेशियर झीलों की निगरानी तेज कर दी है. संभावित आपदा के खतरे को देखते हुए चमोली जिले के सरस्वती ताल और उत्तरकाशी जिले के केदारताल का वैज्ञानिक सर्वेक्षण शुरू किया गया है. मंगलवार को विशेषज्ञों का दल इस अभियान के लिए रवाना हुआ.

उत्तराखंड आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विभाग के सचिव विनोद कुमार सुमन ने उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (USDMA) से टीम को रवाना किया. इस सर्वेक्षण का उद्देश्य ग्लेशियर झीलों की वर्तमान स्थिति का अध्ययन करना और भविष्य में किसी भी संभावित खतरे का समय रहते आकलन करना है.

13 ग्लेशियर झीलों को माना गया संवेदनशील

नेपाल में आई आपदा के बाद राज्य सरकार ने हिमालयी क्षेत्र की ग्लेशियर झीलों की निगरानी के निर्देश दिए थे. राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने उत्तराखंड की 13 ग्लेशियर झीलों को संवेदनशील श्रेणी में रखा है. इनमें से 5 झीलों को अति संवेदनशील माना गया है. अब तक 13 में से 4 झीलों का सर्वेक्षण पूरा किया जा चुका है. बाकी झीलों का भी चरणबद्ध तरीके से अध्ययन किया जा रहा है. इसी कड़ी में सरस्वती ताल और केदारताल का बैथीमेट्री सर्वे कराया जा रहा है.

ऊंचाई पर स्थित झीलों की होगी गहन जांच

अधिकारियों के अनुसार सरस्वती ताल करीब 5700 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है, जबकि केदारताल लगभग 4750 मीटर की ऊंचाई पर है. कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में स्थित होने के कारण इन झीलों का अध्ययन बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

सर्वेक्षण के दौरान झीलों के जलस्तर, आकार, संभावित खतरे के कारणों और नीचे बसे क्षेत्रों पर पड़ने वाले प्रभाव का वैज्ञानिक आकलन किया जाएगा. इससे भविष्य में किसी भी आपदा की स्थिति से निपटने की बेहतर तैयारी की जा सकेगी.

कई संस्थानों के विशेषज्ञ जुटे

इस अभियान में यूएसडीएमए, यूएलएमएमसी, वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान, एनआईएच रुड़की, बाबा साहनी पुराविज्ञान संस्थान, एसडीआरएफ, एनडीआरएफ और नेहरू पर्वतारोहण संस्थान के विशेषज्ञ शामिल हैं. सभी मिलकर झीलों की स्थिति और उससे जुड़े जोखिमों का विस्तृत अध्ययन करेंगे.

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि संवेदनशील ग्लेशियर झीलों का व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन कराया जा रहा है. उन्होंने बताया कि संभावित खतरे की स्थिति में समय पर चेतावनी देने के लिए आधुनिक सेंसर, जलस्तर मापक यंत्र और संचार प्रणाली को भी मजबूत किया जाएगा ताकि किसी भी आपदा से होने वाले नुकसान को कम किया जा सके.

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