आजादी के साथ आई देश विभाजन की त्रासदी ने लाखों लोगों की जिंदगी बदल दी. 1947 के बंटवारे के दौरान अनगिनत परिवारों को अपनी जन्मभूमि छोड़कर नए भारत में बसना पड़ा. इन्हीं लोगों में एक ऐसा शख्स भी था, जिसने विभाजन का दर्द करीब से देखा और आगे चलकर भारतीय राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई. शरणार्थी के रूप में जीवन शुरू करने वाले इस नेता ने न सिर्फ एक बड़े राजनीतिक आंदोलन को दिशा दी, बल्कि देश की राजनीति को भी लंबे समय तक प्रभावित किया. हालांकि, वह प्रधानमंत्री पद तक नहीं पहुंच सके. लेकिन उनकी राजनीतिक भूमिका और योगदान आज भी भारतीय राजनीति में अहम माना जाता है. यह कहानी भारत के पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी की है, जिन्होंने सत्ता की दौड़ में खुद से पहले अपने सहयोगी अटल बिहारी वाजपेयी को आगे बढ़ाया.
सिंध से भारत तक: एक नई शुरुआत
लालकृष्ण C का जन्म 8 नवंबर 1927 को कराची में हुआ था. बचपन में ही मां का साया सिर से उठ गया. उनके व्यक्तित्व में पिता की झलक अधिक दिखाई देती थी. आडवाणी के दादा संस्कृत के विद्वान थे. उस परिवेश का प्रभाव उनके व्यक्तित्व पर भी पड़ा. 20 साल की उम्र में आडवाणी भारत आ गए. पहले राजस्थान और फिर दिल्ली में रहे. आडवाणी को याद कीजिए तो एक काले फ्रेम का चश्मा, खादी का कुर्ता और सादगी भरा व्यक्तित्व सामने आता है. लेकिन इस सादगी के पीछे एक ऐसा राजनीतिक मस्तिष्क था, जिसने दशकों तक भारतीय राजनीति को प्रभावित किया.

टेनिस कोर्ट से संघ कार्यालय तक
अपनी आत्मकथा ‘मेरा देश, मेरा जीवन' में आडवाणी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ने का एक दिलचस्प प्रसंग साझा किया है. साल 1942 में हैदराबाद में स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद वे छुट्टियों में टेनिस सीख रहे थे. एक दिन उनका दोस्त खेल बीच में छोड़कर जाने लगा. आडवाणी ने पूछा कि खेल अधूरा छोड़कर कहां जा रहे हो? तो उनके दोस्त ने जवाब दिया कि वह संघ की शाखा में जा रहा है. मित्र का शाखा जाना लगातार जारी रहा और इसी सिलसिले में एक दिन आडवाणी भी संघ कार्यालय पहुंच गए. आडवाणी संघ के प्रचारकों से काफी प्रभावित हुए. बता दे कि संघ के मुताबिक़ प्रचारक उसे कहा जाता है, जो अपना संपूर्ण जीवन संगठन के कार्य के लिए समर्पित कर देता है और घर-परिवार से दूर रहकर समाज एवं राष्ट्र सेवा में जुटा रहता है. आडवाणी भी इसी विचारधारा से प्रभावित होकर प्रचारक बने.
1944 में आडवाणी ने कराची के मॉडल हाई स्कूल में शिक्षक के रूप में काम किया. 1947 में बंटवारे के बाद उन्हें अपनी जन्मभूमि छोड़नी पड़ी. 12 सितंबर 1947 को वे कराची से दिल्ली आए. अपनी मिट्टी की सौंधी महक को छोड़ने की पीड़ा वही समझ सकता है, जिसने अपनी जन्मभूमि से पलायन किया हो. आडवाणी भी इस त्रासदी के शिकार हुए. 1947 से 1951 के बीच उन्होंने राजस्थान के अलवर, भरतपुर, कोटा, बूंदी और झालावाड़ में संघ के संगठनात्मक कार्यों की जिम्मेदारी संभाली.

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लालजी और वाजपेयी
1951-52 में देश का पहला आम चुनाव हो रहा था. जनसंघ के नेता चुनावी तैयारियों में जुटे थे. उस समय आडवाणी राजस्थान में संगठन का काम संभाल रहे थे. वहीं अटल बिहारी वाजपेयी, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ चुनाव प्रचार में जुटे थे. इसी दौरान राजस्थान में आडवाणी और वाजपेयी की मुलाकात हुई. दोनों संघ के प्रचारक थे और अब जनसंघ के संगठन को मजबूत करने में जुट गए थे.
1953 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी के निधन के बाद जनसंघ को एक बड़े नेतृत्व की जरूरत थी. दीनदयाल उपाध्याय ने आडवाणी की संगठन क्षमता और अंग्रेजी भाषा पर उनकी पकड़ को देखते हुए 1957 के चुनाव के बाद उन्हें दिल्ली बुला लिया. धीरे-धीरे वाजपेयी और आडवाणी की जोड़ी मजबूत होती गई. दोनों पार्टी के काम के अलावा साथ फिल्में भी देखा करते थे. समय के साथ यह रिश्ता भारतीय राजनीति की सबसे चर्चित राजनीतिक जोड़ियों में शामिल हो गया.

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राजनीति के साथ निजी जीवन का सफर
संघ के प्रचारक के रूप में लंबे समय तक काम करने के बाद आडवाणी ने विवाह किया. कमला उनकी जीवनसंगिनी बनीं. दोनों के दो बच्चे जयंत और प्रतिभा हैं. विनय सीतापति की किताब में भाजपा नेता हरिन पाठक से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा मिलता है. हरिन बताते है कि आडवाणी की खाने की मेज पर एक तस्वीर रखी थी, जिसमें कमला उन्हें घूरकर देख रही थी. मेहमानों के आने पर आडवाणी मजाक में कहते कि इस तस्वीर से अंदाजा लगाया जा सकता है कि घर में किसकी चलती है. यह साथ 52 साल तक चला. 2016 में कमला आडवाणी का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया.
दिल्ली महानगर परिषद से राज्यसभा तक
आडवाणी के औपचारिक राजनीतिक करियर की शुरुआत 1967 में दिल्ली महानगर परिषद के अध्यक्ष बनने के साथ हुई. 1970 में जनसंघ ने उन्हें राज्यसभा भेजा. यह वह दौर था, जब जनसंघ के भीतर बलराज मधोक और अटल बिहारी वाजपेयी के बीच मतभेद चल रहे थे. इंदिरा गांधी सरकार के बैंक राष्ट्रीयकरण जैसे फैसलों पर भी जनसंघ के नेताओं के बीच अलग-अलग विचार थे. आडवाणी ने राज्यसभा में इंदिरा सरकार के इस कदम का समर्थन किया. 1989 तक वे राज्यसभा के सदस्य रहे. इसके बाद 1989 के लोकसभा चुनाव में नई दिल्ली से जीतकर पहली बार लोकसभा पहुंचे.
आपातकाल: जेल में भी जारी रही राजनीति
25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू कर दिया. विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियां शुरू हो गई. उस समय आडवाणी और वाजपेयी बेंगलुरु में थे. 26 जून की सुबह उन्हें जानकारी मिली कि जयप्रकाश नारायण समेत कई नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया है. कुछ ही घंटों बाद पुलिस ने वाजपेयी और आडवाणी को भी गिरफ्तार कर लिया. दोनों को बेंगलुरु सेंट्रल जेल में रखा गया. जेल में वाजपेयी खाना बनाते थे. आडवाणी अपनी आत्मकथा में याद करते हैं कि वाजपेयी के हाथ का खाना बेहद स्वादिष्ट होता था. 1976 का राज्यसभा चुनाव भी आडवाणी ने जेल में रहते हुए लड़ा और गुजरात से निर्वाचित हुए.

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मीडिया की आजादी और भाजपा की स्थापना
1977 में आपातकाल के बाद हुए चुनाव में कांग्रेस की हार हुई और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनी. आडवाणी सूचना एवं प्रसारण मंत्री बने. उन्होंने प्रेस पर लगे प्रतिबंध हटाने और आपातकाल के दौरान प्रतिबंधित पत्रकारों को मुख्यधारा में वापस लाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए. 1980 में जनता पार्टी के विघटन के बाद अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी ने भारतीय जनता पार्टी की स्थापना की. 1986 में आडवाणी पार्टी अध्यक्ष बने. उनके नेतृत्व में भाजपा ने धारा 370, समान नागरिक संहिता और राम मंदिर जैसे मुद्दों पर अपनी राजनीतिक पहचान मजबूत की. 1989 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 85 सीटें जीतकर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई.
राम रथ यात्रा और भाजपा का विस्तार
1990 में आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक राम रथ यात्रा शुरू की. इस यात्रा ने भाजपा के जनाधार को व्यापक रूप से बढ़ाया. बिहार के समस्तीपुर में उनकी गिरफ्तारी ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर एक प्रमुख हिंदुत्व नेता के रूप में स्थापित किया. इस यात्रा के बाद भाजपा ने उत्तर भारत में अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत की. भारतीय राजनीति में राम मंदिर आंदोलन एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ और भाजपा राष्ट्रीय राजनीति की बड़ी ताकत बनकर उभरी.
प्रधानमंत्री पद के लिए वाजपेयी का नाम
1995 में मुंबई की एक रैली में आडवाणी ने घोषणा की कि आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार अटल बिहारी वाजपेयी होंगे. यह फैसला भाजपा की राजनीति में एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ. वाजपेयी की स्वीकार्यता बढ़ी और गठबंधन राजनीति के लिए भाजपा का रास्ता आसान हुआ. आडवाणी ने अपने राजनीतिक सहयोगी को आगे बढ़ाने का फैसला किया. यह भारतीय राजनीति में नेतृत्व और संगठन के बीच तालमेल का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बना.
गृह मंत्री और उपप्रधानमंत्री
1998 में NDA सरकार बनने के बाद आडवाणी गृह मंत्री बने. बाद में उन्हें उपप्रधानमंत्री की जिम्मेदारी भी सौंपी गई. इस दौरान उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा और आंतरिक सुरक्षा से जुड़े कई महत्वपूर्ण फैसलों में भूमिका निभाई.
प्रधानमंत्री पद की अधूरी कहानी
2004 में भाजपा की सत्ता से विदाई के बाद आडवाणी पार्टी के प्रमुख नेताओं में शामिल रहे. 2009 का लोकसभा चुनाव उनके नेतृत्व में लड़ा गया, लेकिन भाजपा सत्ता में वापसी नहीं कर सकी. 2013 में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार को लेकर पार्टी में खींचतान हुई. आडवाणी और नरेंद्र मोदी के बीच नेतृत्व को लेकर मतभेद सामने आए. अंततः भाजपा ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया. आडवाणी मार्गदर्शक मंडल में चले गए. यह एक ऐसा मोड़ था, जहां आडवाणी प्रधानमंत्री बनने की अपनी राजनीतिक आकांक्षा से दूर हो गए. लेकिन उनका राजनीतिक कद आज भी भाजपा के इतिहास में महत्वपूर्ण बना हुआ है.
100वें साल में प्रवेश
यह एक संयोग ही है कि आडवाणी अपने जीवन के 100वें साल में प्रवेश कर रहे हैं, पूरा देश दीपावली मना रहा है और 1927 में दीपावली के दिन ही उनका जन्म हुआ. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा की यात्रा को समझने के लिए आडवाणी के राजनीतिक जीवन को समझना जरूरी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आडवाणी को 100वें साल में प्रवेश पर बधाई देते हुए उन्हें आधुनिक भारत की राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक बताय. उन्होंने जनसंघ और भाजपा को मजबूत आधार देने, आपातकाल के खिलाफ लोकतंत्र की रक्षा करने और राम रथ यात्रा के जरिए पार्टी का जनाधार बढ़ाने में आडवाणी की भूमिका की सराहना की.
लालकृष्ण आडवाणी की राजनीतिक यात्रा केवल एक व्यक्ति के प्रधानमंत्री बनने या न बनने की कहानी नहीं है. यह उस नेता की कहानी है, जिसने संगठन को खड़ा किया, विचारधारा को विस्तार दिया और अपने राजनीतिक सहयोगी को आगे बढ़ाने का फैसला किया. आडवाणी ने अपनी राजनीति में किसी की लकीर मिटाने की कोशिश नहीं की, बल्कि अपनी लकीर को लंबा खींचा. प्रधानमंत्री पद की दौड़ में पीछे रह जाने के बावजूद उनका राजनीतिक कद छोटा नहीं हुआ. राजनीति के विद्यार्थियों के लिए आडवाणी का जीवन एक महत्वपूर्ण पाठ है, राजनीति में पद महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन संगठन, विचारधारा और विरासत उससे कहीं अधिक व्यापक होती है.
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