- केदारनाथ के पैदल मार्ग पर लगभग चार से पांच किलोमीटर क्षेत्र में हिमस्खलन का खतरा सबसे अधिक सक्रिय रहता है.
- वैज्ञानिकों ने सुझाव दिया कि रोपवे परियोजना को प्राथमिकता देकर पुराने पैदल मार्ग को पुनः शुरू किया जाना चाहिए.
- हर मिनट लगभग एक सौ से दो सौ तीर्थ यात्री हिमस्खलन प्रभावित क्षेत्र से गुजरते हैं.
Kedarnath Yatra News :केदारनाथ के पैदल मार्ग पर लिंचोली से रुद्र पॉइंट तक का इलाका एवलांच की दृष्टि से बेहद खतरनाक माना जा रहा है. इस पूरे क्षेत्र में लगभग 4 से 5 किलोमीटर के दायरे में एवलांच सबसे अधिक सक्रिय रहते हैं और यहीं सबसे ज्यादा खतरा बना रहता है. लिंचोली के पास लगभग 4 किलोमीटर लंबे मार्ग में करीब 11 एवलांच सूट सक्रिय हैं. वाडिया इंस्टिट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों ने हाल ही में इस विषय पर एक रिसर्च पेपर जारी किया है, जिसमें बताया गया है कि केदारनाथ के पैदल मार्ग पर खासकर लिंचोली से आगे के 4 किलोमीटर के हिस्से में सबसे ज्यादा खतरा है. वैज्ञानिकों ने अपनी रिपोर्ट में सुझाव दिया है कि केदारनाथ के लिए रोपवे परियोजना पर तेजी से काम होना चाहिए और साथ ही पुराने पैदल मार्ग से यात्रा को दोबारा शुरू किया जाना चाहिए.

Kedarnath Yatra: हिमालयी क्षेत्र पर भारी दबाव पड़ रहा है
वैज्ञानिकों के अनुसार, केदारनाथ पैदल मार्ग पर लिंचोली से लगभग 4 किलोमीटर आगे के हिस्से में 11 एवलांच सूट मौजूद हैं, जो बेहद खतरनाक हैं. इन क्षेत्रों में लगातार ऊपर से नीचे की ओर एवलांच आते रहते हैं, जिनके साथ बड़े-बड़े बोल्डर भी गिरते हैं. हर साल केदारनाथ आने वाले तीर्थ यात्रियों की संख्या बढ़ रही है, जिससे हिमालयी क्षेत्र पर भारी दबाव पड़ रहा है और वहां का इकोसिस्टम भी बदल रहा है.

एवलांच प्रभावित क्षेत्रों से गुजरते हैं तीर्थ यात्री
रिसर्च में बताया गया है कि अप्रैल से जून के बीच ऊपरी इलाकों में हल्की बर्फ जमा रहती है, जिससे एवलांच का खतरा बना रहता है. इसके बावजूद कई बार तीर्थ यात्रियों को एवलांच वाले क्षेत्रों में तस्वीरें खींचते और मौज-मस्ती करते देखा गया है. ऐसे कई वीडियो भी सामने आए हैं जिनमें पुलिसकर्मी तीर्थ यात्रियों को एवलांच जोन में जाने से रोकते नजर आते हैं, लेकिन इसके बावजूद कई यात्री वहां रुकते दिखाई देते हैं. वैज्ञानिकों के अनुसार, एवलांच की लंबाई करीब डेढ़ किलोमीटर तक होती है, जबकि उनकी चौड़ाई कहीं 100 मीटर तो कहीं 200 मीटर तक होती है. अनुमान है कि हर मिनट करीब 100 से 200 तीर्थ यात्री इन एवलांच प्रभावित क्षेत्रों से गुजरते हैं, जो भविष्य के लिए एक बड़ा खतरा बनता जा रहा है. बढ़ता तापमान, ग्लेशियर पर बढ़ता दबाव और बदलता इकोसिस्टम इस जोखिम को और गंभीर बना रहे हैं.

कभी भी भारी नुकसान हो सकता है!
रिसर्च पेपर में यह भी कहा गया है कि हिमस्खलन के दो रास्ते आसपास की धाराओं से आकर मिलते हैं, जिससे एक बड़ा और ज्यादा विनाशकारी प्रवाह बनता है. वैज्ञानिकों के मुताबिक, इंसानों की बढ़ती दखलअंदाजी, पर्यटन, तीर्थयात्रा और इंफ्रास्ट्रक्चर विकास ने हिमस्खलन की बारंबारता और तीव्रता को बढ़ा दिया है. रिपोर्ट में इस इलाके में सतत विकास, स्थान-विशेष के अनुसार खतरों की मैपिंग और हिमस्खलन के जोखिम के सक्रिय प्रबंधन की तत्काल जरूरत पर जोर दिया गया है. वैज्ञानिकों का कहना है कि लिंचोली से रुद्र पॉइंट तक का पैदल मार्ग कभी भी भारी नुकसान पहुंचा सकता है, इसलिए रोपवे परियोजना को प्राथमिकता दी जानी चाहिए और पुराने पैदल मार्ग को फिर से इस्तेमाल में लाने पर विचार होना चाहिए.

पुराना पैदल मार्ग रामबाड़ा तक पूरी तरह तबाह
दरअसल, साल 2013 में आई केदारनाथ त्रासदी के बाद पुराना पैदल मार्ग रामबाड़ा तक पूरी तरह तबाह हो गया था. इसके बाद यात्रा को दोबारा शुरू करने के लिए वर्तमान पैदल मार्ग का निर्माण किया गया. नया मार्ग दक्षिण दिशा की ओर है, जबकि आपदा से पहले का पुराना मार्ग पूर्व दिशा में था, जहां पर्याप्त धूप मिलती थी और वहां ग्लेशियर नहीं थे. इसके उलट, वर्तमान दक्षिणी मार्ग में धूप कम पड़ती है और ग्लेशियर की मौजूदगी खतरे को बढ़ाती है.

उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में एवलांच आना एक सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन कई बार ये बेहद घातक साबित हुए हैं. बीते कुछ दशकों में हिमस्खलनों के कारण भारी जान-माल की हानि हुई है. पिछले एक दशक में ही 2019 में नंदा देवी, 2021 में त्रिशूल और अन्य कई जगहों पर हुए हिमस्खलनों में 100 से अधिक लोगों की जान गई है. 23 अप्रैल 2021 को भारत-तिब्बत सीमा के पास गिरथी गंगा घाटी में हुए एवलांच ने सीमा सड़क संगठन (BRO) के शिविर को तबाह कर दिया था, जिसमें 16 लोगों की मौत हो गई थी. वहीं, 2 अक्टूबर 2021 को माउंट त्रिशूल के पास हुए एवलांच में सात लोगों ने जान गंवाई. अक्टूबर 1998 में हेमकुंड साहिब मार्ग पर अतालाकोटी के पास एवलांच से 27 तीर्थ यात्रियों की मौत हुई थी, जबकि 23 जून 2008 को इसी इलाके में हुए एक अन्य एवलांच में आठ लोगों की जान चली गई थी. 4 अक्टूबर 2022 को डोकरियानी ग्लेशियर क्षेत्र में हुए बड़े एवलांच में द्रौपदी का डांडा चोटी पर नेहरू पर्वतारोहण संस्थान के 27 सदस्य मारे गए थे.
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