- कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा कि संन्यास लेने के बाद साधु अपने जैविक परिवार से कानूनी संबंध पूरी तरह तोड़ देता है
- साधु के मृत्यु पर मुआवजे का दावा उसके मठ या धार्मिक संस्थान ही कानूनी प्रतिनिधि के रूप में कर सकते हैं
- मोटर दुर्घटना में मारे गए साधु के पिता ने मुआवजे की मांग की, लेकिन ट्रिब्यूनल ने इसे अस्वीकार कर दिया
क्या किसी हिंदू साधु-संत की सड़क हादसे में मौत होने पर उनके जैविक परिवार को मोटर दुर्घटना मुआवजे का दावा मिल सकता है? इस सवाल पर कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक बेहद अहम फैसला सुनाया है. अदालत ने साफ किया है कि संन्यास लेने और गृहस्थ जीवन का त्याग करने के बाद एक साधु अपने जैविक परिवार से सभी कानूनी संबंध तोड़ लेता है. इसलिए, हादसे में मौत की स्थिति में परिवार को उनका कानूनी प्रतिनिधि नहीं माना जाएगा और उन्हें मुआवजे का हकदार नहीं ठहराया जा सकता.
हाईकोर्ट के मुताबिक, ऐसी स्थिति में साधु का 'मठ' या धार्मिक संस्थान ही उनका असली कानूनी प्रतिनिधि होगा, क्योंकि संन्यासी का जीवन और उनका श्रम पूरी तरह से मठ को समर्पित होता है.
क्या था पूरा मामला?
बार एंड बेंच के अनुसार, यह मामला दिसंबर 2009 का है, जब पीरायोगी गुलशननाथ गुरुपीर हरिनाथजी महाराज नाम के एक हिंदू साधु की मोटरसाइकिल एक ट्रक से टकरा गई. इस भीषण सड़क हादसे में साधु की मौत हो गई. इसके बाद, मृतक साधु के जैविक पिता ने मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (MACT) का दरवाजा खटखटाया और मुआवजे की मांग की.
ट्रिब्यूनल और फिर हाईकोर्ट में गया मामला
मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (MACT) ने बीमा कंपनी के तर्कों को स्वीकार कर लिया. ट्रिब्यूनल ने साधु के पिता को 'निर्भरता के नुकसान' जैसी पारंपरिक श्रेणियों के तहत मुआवजा देने से साफ इनकार कर दिया. हालांकि, ट्रिब्यूनल ने 'संपत्ति के नुकसान' के तहत 50,000 रुपये की राशि मंजूर की थी.
पिता ने ट्रिब्यूनल के इस फैसले को चुनौती देते हुए मुआवजे की राशि बढ़ाने के लिए कर्नाटक हाईकोर्ट में अपील दायर की. न्यायमूर्ति गीता के.बी. की एकल पीठ ने इस अपील पर सुनवाई करते हुए ट्रिब्यूनल के फैसले को बरकरार रखा और पिता की याचिका को खारिज कर दिया.
अदालत ने अपने फैसले में क्या कहा?
कोर्ट ने कहा कि एक बार जब कोई व्यक्ति संसार का त्याग करके संत बन जाता है, तो वह अपने जैविक परिवार से अपने संबंध तोड़ लेता है. संन्यासी जीवन स्वीकार करने के बाद उसका अपने परिवार से हर मामले में पूरी तरह से अलगाव हो जाता है.
अदालत ने माना कि संन्यास लेने के बाद साधु अपनी सेवाएं और प्रबंधन कार्य मठ को समर्पित करता है. चूंकि धार्मिक संस्थान ही उनकी मेहनत और सेवा का लाभ प्राप्त करता है, इसलिए वही उनका कानूनी प्रतिनिधि माना जाएगा और मुआवजा पाने का हकदार भी वही होगा.
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि यह दावा याचिका मठ के प्रशासनिक अधिकारी या किसी जिम्मेदार पदाधिकारी द्वारा दायर की गई होती, तो यह निश्चित रूप से विचार किया जा सकता था. लेकिन चूंकि इसे जैविक पिता ने दायर किया है, इसलिए वे मुआवजे के हकदार नहीं हैं.
बीमा कंपनी की तरफ से ट्रिब्यूनल के 50,000 रुपये के आदेश को चुनौती न दिए जाने के कारण हाईकोर्ट ने 'संपत्ति के नुकसान' के तहत तय की गई उस राशि को बरकरार रखा, लेकिन पिता की ओर से मुआवजा बढ़ाने की मांग को पूरी तरह से खारिज कर दिया.
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