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1881 से 2026 तक... क्या है 145 साल पुराना कावेरी विवाद? तमिलनाडु और कर्नाटक के दावों की पूरी कहानी

कावेरी नदी के पानी को लेकर तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच 1881 में विवाद शुरू हुआ था. अंग्रेजों ने भी एक समझौता करवाया था. ट्रिब्यूनल का फैसला भी आ चुका है. सुप्रीम कोर्ट भी इस पर 2018 में फैसला सुना चुका है.

1881 से 2026 तक... क्या है 145 साल पुराना कावेरी विवाद? तमिलनाडु और कर्नाटक के दावों की पूरी कहानी
कावेरी नदी के पानी को लेकर तमिलनाडु और कर्नाटक में रार.
IANS/NDTV
नई दिल्ली:

दक्षिण की 'गंगा' कही जाने वाली कावेरी नदी के पानी को लेकर दशकों से तमिलनाडु और कर्नाटक लड़ रहे हैं. दोनों की लड़ाई अब एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई है. तमिलनाडु की जोसेफ विजय सरकार ने कावेरी जल विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख करते हुए मांग की है कि कर्नाटक को उसके हिस्से का पानी छोड़ने के लिए आदेश दिया जाए. 

तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया है कि कावेरी वॉटर रेगुलेशन कमेटी (CWRC) की ओर से तमिलनाडु के लिए आवंटित पानी की मात्रा और कर्नाटक से छोड़े गए पानी की मात्रा, दोनों ही बहुत कम है.

दोनों के बीच कावेरी नदी के पानी को लेकर 145 सालों से विवाद चला आ रहा है. दोनों का विवाद सुलझाने के लिए कई बार कोशिशें की गईं. 2018 में सुप्रीम कोर्ट का भी एक फैसला आया था. लेकिन इतने साल बीत जाने और कई फैसले आ जाने के बावजूद तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच कावेरी नदी के पानी को लेकर लड़ाई चल रही है.

मौजूदा झगड़े की वजह क्या?

28 जुलाई को CWRC ने कर्नाटक को आदेश दिया कि वह 29 जुलाई से 15 दिन के लिए 3,500 क्यूसेक पानी तमिलनाडु को दे. बाद में कावेरी वॉटर मैनेजमेंट अथॉरिटी (CWMA) ने भी इस आदेश को बरकरार रखा.

हालांकि, तमिलनाडु सरकार ने दावा किया कि 29 जुलाई से 2 अगस्त के बीच बिलिगुंडलू में छोड़े गए पानी की मात्रा 158 से 550 क्यूसेक के बीच रही.

तमिलनाडु सरकार की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है कि 3 अगस्त तक कर्नाटक के कृष्णराज सागर (केआरएस), काबिनी, हारंगी और हेमावती जलाशयों में कुल 77.537 टीएमसी पानी था और कर्नाटक को तमिलनाडु के हिस्से का पानी छोड़ने में कोई परेशानी नहीं होगी. टीएमसी यानी हजार मिलियन क्यूबिक फीट.

बयान के अनुसार, हाल में कर्नाटक के कृष्णराज सागर और काबिनी बांधों में हुई बारिश के बाद बिलिगुंडलू (कृष्णागिरि जिला, तमिलनाडु) में छोड़े जाने वाला पानी 26.954 टीएमसी होना चाहिए. इसमें कहा गया है, 'इस लिहाज से 4.536 टीएमसी पानी आवंटित करने का CWMA का आदेश उपयुक्त मात्रा से बहुत कम है.'

बयान में दावा किया गया है कि कर्नाटक सरकार तमिलनाडु को पानी का उसका वाजिब हिस्सा यानी 26.954 टीएमसी देने में 'नाकाम' रही है.

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ये कावेरी नदी है कहां?

कावेरी नदी 4 राज्यों- कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी से गुजरती है. कर्नाटक के कोडागू जिले से निकलते हुए यह तमिलनाडु से होती हुई बंगाल की खाड़ी में गिरती है. इसका कुछ हिस्सा केरल में पड़ता है और समंदर में गिरने से पहले यह नदी पुडुचेरी के कराइकाल से होकर गुजरती है.

कावेरी नदी करीब 800 किलोमीटर लंबी है. यह नदी कुशालनगर, मैसूर, श्रीरंगापटना, त्रिरुचिरापल्ली, तंजावुर और मइलादुथुरई जैसे शहरों से गुजरती हुई बंगाल की खाड़ी में गिरती है. कावेरी के बेसिन में कर्नाटक का 32,000 और तमिलनाडु का 44,000 वर्ग किलोमीटर इलाका आता है. 

लेकिन कावेरी के पानी को लेकर विवाद क्या है?

कावेरी नदी के पानी को लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच 145 साल पुराना विवाद है. इस विवाद की शुरुआत 1881 में तब शुरू हुई, जब तत्कालीन मैसूर राज्य (अब कर्नाटक) ने कावेरी नदी पर बांध बनाने का फैसला किया, लेकिन मद्रास (तमिलनाडु) ने इस पर आपत्ति जताई.

इसके बाद अगले 40 साल से ज्यादा लंबे समय तक दोनों के बीच विवाद चलता ही रहा. आखिरकार 1924 में ब्रिटिश सरकार ने एक समझौता करवाया. समझौते के तहत कर्नाटक को कावेरी नदी का 177 टीएमसी और तमिलनाडु को 556 टीएमसी पानी मिला. 

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आजादी के बाद क्या कुछ हुआ?

आजादी के बाद 1956 में राज्यों का पुनर्गठन हुआ और मैसूर कर्नाटक बना तो मद्रास तमिलनाडु. आजादी के बाद 1972 में केंद्र सरकार ने एक कमेटी बनाई. तब इसके चार दावेदार थे- कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी. कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर चारों के बीच 1976 में एक समझौता हुआ.

लेकिन समझौते के बाद भी विवाद खत्म होने की बजाय बढ़ता ही चला गया. फिर 1990 में में केंद्र सरकार ने 2 जून 1990 को कावेरी वॉटर डिस्प्यूट ट्रिब्यूनल (CWDT) बनाया. कर्नाटक को 465 टीएमसी पानी चाहिए था और तमिलनाडु 562 टीएमसी मांग रहा था.

17 साल तक विवाद ट्रिब्यूनल में चलता रहा और आखिरकार 2007 में फैसला आया. ट्रिब्यूनल ने फैसले में कहा कि कर्नाटक को सालाना 270 टीएमसी और तमिलनाडु को 419 टीएमसी पानी मिलेगा. केरल को 30 टीएमसी और पुडुचेरी को 7 टीएमसी पानी मिला.

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लेकिन... विवाद और बढ़ गया

17 साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद आए फैसले ने विवाद को और बढ़ा दिया. कोई भी पक्ष इससे खुश नहीं था. पहले तमिलनाडु और फिर कर्नाटक ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी.

16 फरवरी 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने इस पर फैसला सुनाया. सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक का कोटा थोड़ा बढ़ाया तो तमिलनाडु का कम कर दिया. 

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कर्नाटक को हर साल 284.75 टीएमसी और तमिलनाडु को 404.25 टीएमसी पानी मिलेगा. केरल और पुडुचेरी को उतना ही पानी मिला, जितना ट्रिब्यूनल ने कहा था. इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक को आदेश दिया कि वह तमिलनाडु को हर साल 177.25 टीएमसी पानी और देगा. ये पानी बिलिगुंडलु डैम में छोड़ा जाएगा.

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को CWMA और CWRC बनाने का आदेश दिया, ताकि पानी के बंटवारे को लेकर निगरानी रखी जा सके.

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फैसले के बाद भी विवाद खत्म नहीं

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच कावेरी के पानी को लेकर विवाद खत्म नहीं हुआ है. 

साल 2023 में कमजोर मॉनसून के कारण दोनों राज्यों में जमकर तनाव बढ़ा. तमिलनाडु ने पानी की मांग को लेकर फिर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया. 

जब तक बारिश सामान्य रहती है तब तक दोनों के बीच विवाद नहीं होता है लेकिन कमजोर बारिश के कारण पानी की समस्या को लेकर दोनों लड़ने लगते हैं. 

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