कैशकांड में फंसे में इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है. इसकी जानकारी उन्होंने संसद की जांच समिति को एक पत्र लिखकर दी. दरअसल जस्टिस वर्मा को उनके पद से हटाने के लिए महाभियोग की प्रक्रिया चल रही है.लोकसभा सचिवालय के सूत्रों के मुताबिक इस्तीफे के बाद से अब महाभियोग की प्रक्रिया खत्म हो जाएगी.
संसद की जांच कमेटी को भेजे अपने 13 पेज से इस्तीफे में जस्टिस वर्मा ने जांच पर ही सवाल उठाए हैं. उन्होंने जांच प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं.उन्होंने लिखा है कि वो इन कार्यवाहियों से हट रहे हैं, क्योंकि जांच निष्पक्ष नहीं है. उन्होंने लिखा है,''मैं गहरी पीड़ा के साथ ये फैसले ले रहा हूं. मैं अपने फैसले की गंभीरता से पूरी तरह अवगत हूं. इस आशा के साथ यह फैसला ले रहा हूं कि एक दिन इतिहास यह दर्ज करेगा कि हाईकोर्ट के एक वर्तमान जज के साथ जिस प्रकार का अन्याय हुआ, उसने इस पूरे प्रकरण को शुरुआत से ही प्रभावित किया है.''
कैसे हैं जस्टिस यशवंत वर्मा के आरोप
जस्टिस वर्मा ने लिखा है,''मैं इन कार्यवाहियों से हटता हूं क्योंकि निष्पक्ष जांच नहीं हो रही है. स्टोररूम की चाबी मेरे या मेरे परिवार के पास नहीं थी.मेरे घर के CCTV कैमरे और CRPF सुरक्षा मेरे नियंत्रण में नहीं थी. घटना उस समय हुई जब मैं राज्य में मौजूद नहीं था.यह मानना तर्कसंगत नहीं है कि मैंने 'कैश' स्टोररूम में रखा था. मुझे जानबूझकर बदनाम करने का अभियान चलाया गया.''
उन्होंने लिखा है कि उन्हें किसी भी गवाह से जिरह का मौका नहीं दिया गया. प्रारंभिक इन-हाउस कमेटी रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं होनी चाहिए थी, वह केवल भारत के मुख्य न्यायाधीश के लिए थी. जांच समिति उसी इन-हाउस रिपोर्ट और उसके गवाहों पर अत्यधिक निर्भर है.
उनका कहना है कि जजेज इंक्वायरी एक्ट के तहत नई स्वतंत्र जांच नहीं हुई.जस्टिस वर्मा ने अपने इस्तीफे में लिखा है कि जांच अनुमान, आरोप और धारणाओं पर आधारित है. मुझे अपना बचाव करने का उचित और निष्पक्ष अवसर नहीं मिला.उन्होंने लिखा है कि ऐसा लग रहा है कि सरकारी आवास के निवासी से हर चीज की जानकारी होने की अपेक्षा की जा रही है.
जस्टिस वर्मा ने गवाहों को लेकर क्या कहा है
जस्टिस वर्मा ने लिखा है, ''फायर रिपोर्ट में कहीं भी कैश का उल्लेख नहीं था, फिर भी उसे रिकॉर्ड पर नहीं लिया गया. गवाह के बयान के मुताबिक वरिष्ठ फायर और पुलिस अधिकारियों ने रिपोर्ट में कैश का जिक्र न करने का फैसला पहले ही कर लिया था. PSO के हलफनामे में झूठे दावे थे. GPS जांच की मांग उठाने पर उसे गवाह से हटा दिया गया. उन्होंने आरोप लगाया है कि जांच समिति ने मेरे पक्ष में गवाही देने वाले सभी गवाहों को हटा दिया. स्टोररूम में क्या मिला, इसका कोई कानूनी रूप से ठोस सबूत पेश नहीं किया गया.
गौरतलब है कि आग लगने की जिस घटना का जिक्र है, वह जस्टिस वर्मा के दिल्ली स्थित आवास पिछले साल 15 मार्च को हुई थी. घटना के समय वो दिल्ली हाईकोर्ट के जज थे.मामला बढ़ने पर उनका तबादला इलाहाबाद हाई कोर्ट में कर दिया गया था. आग लगने की घटना में जस्टिस वर्मा घर से बड़ी मात्रा में नोट जलने के आरोप लगे थे. घटनास्थल से जले हुए नोट बरामद किए गए थे. कैश का कुछ हिस्सा तो जला हुआ था. इसके बाद इस मामले में काफी तूल पकड़ा था.सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित तीन सदस्यीय पैनल ने उन्हें पद से हटाने की सिफारिश की. जस्टिस वर्मा ने किसी तरह के कदाचार में लिप्त होने से इनकार किया है.संसद में सत्ता पक्ष और विपक्ष के कुल 152 सांसदों ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव दिया था.
इस प्रस्ताव पर लोकसभा अध्यक्ष ने तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया था, हालांकि जस्टिस वर्मा ने समिति की वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी. अदालत ने 16 जनवरी को उनकी याचिका खारिज कर दी थी. इसके बाद जस्टिस वर्मा समिति के समक्ष पेश हुए और अपना पक्ष रखा था.
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