भारतीय समाज में सदियों से घर संभालने वाली स्त्री को अनेक नाम दिए गए हैं- गृहिणी, गृहलक्ष्मी, अन्नपूर्णा, परिवार की धुरी आदि. लेकिन विडंबना यह रही कि जिन शब्दों में सम्मान झलकता था, उनमें आर्थिक और सामाजिक मान्यता का अभाव भी छिपा रहता था. घर के भीतर दिन-रात किए जाने वाले श्रम को प्रेम, कर्तव्य और त्याग का नाम देकर उसे अदृश्य बना दिया गया. ऐसे समय में सुप्रीम कोर्ट का यह कहना कि गृहिणियां मात्र 'होममेकर' नहीं, बल्कि 'राष्ट्र-निर्माता' हैं, भारतीय न्यायिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है. न्यायालय ने यह भी कहा है कि गृहिणियों के घरेलू और देखभाल संबंधी कार्यों का न्यूनतम आर्थिक मूल्य 30,000 रुपये प्रतिमाह माना जाना चाहिए, विशेषकर मुआवजे के निर्धारण के मामलों में.
यह निर्णय केवल एक कानूनी आदेश नहीं है; यह उस दृष्टिकोण को चुनौती देता है जिसने लंबे समय तक महिलाओं के अवैतनिक श्रम को स्वाभाविक और महत्वहीन मान लिया था. यह निर्णय हमें यह सोचने के लिए बाध्य करता है कि आखिर राष्ट्र-निर्माण क्या है और उसमें घर के भीतर होने वाले श्रम का क्या स्थान है.
महिलाओं के अदृश्य श्रम की लंबी कहानी
जब हम 'काम' शब्द सुनते हैं, तो प्रायः हमारे मन में वे गतिविधियां आती हैं, जिनके बदले वेतन मिलता है. कार्यालय, कारखाना, विद्यालय, अस्पताल या खेत में किया गया श्रम आर्थिक गतिविधि माना जाता है. किंतु घर के भीतर भोजन बनाना, बच्चों की देखभाल करना, बुज़ुर्गों की सेवा करना, घर की साफ-सफाई, घरेलू बजट का प्रबंधन, भावनात्मक सहयोग और परिवार के प्रत्येक सदस्य की आवश्यकताओं का ध्यान रखना, इन सबको अक्सर 'काम' नहीं माना जाता.
वास्तव में यदि इन सभी कार्यों के लिए अलग-अलग लोगों को नियुक्त किया जाए, तो उसका आर्थिक मूल्य अत्यंत बड़ा होगा. एक गृहिणी एक साथ रसोइया, परिचारिका, शिक्षिका, मनोवैज्ञानिक, प्रबंधक और देखभालकर्ता की भूमिका निभाती है. फिर भी उसका श्रम राष्ट्रीय आय की गणना में शामिल नहीं होता.
सुप्रीम कोर्ट पहले भी यह कह चुका है कि गृहिणियों के श्रम और त्याग का आर्थिक मूल्य है और मुआवजे के निर्धारण में इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
'राष्ट्र-निर्माता' शब्द का महत्व क्या है
न्यायालय द्वारा 'राष्ट्र-निर्माता' शब्द का प्रयोग अत्यंत अर्थपूर्ण है. राष्ट्र केवल संसद, सेना, उद्योग या विश्वविद्यालयों से नहीं बनता. राष्ट्र उन परिवारों से बनता है जहां बच्चे संस्कार, शिक्षा, अनुशासन और संवेदनशीलता सीखते हैं. एक स्वस्थ समाज की नींव घरों में रखी जाती है.
यदि कोई मां अथवा गृहिणी बच्चों की देखभाल नहीं करे, बुज़ुर्गों को सहारा न दे, परिवार के भीतर भावनात्मक संतुलन न बनाए रखे, तो समाज की अनेक संस्थाएं अतिरिक्त बोझ से दब जाएंगी. इसलिए घर के भीतर किया गया श्रम निजी नहीं, बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय महत्व का कार्य है. न्यायालय ने स्पष्ट किया कि गृहिणियों द्वारा प्रदान की जाने वाली घरेलू और देखभाल सेवाएं समाज के लिए अत्यंत मूल्यवान हैं और उन्हें मात्र शून्य आय वाली व्यक्ति मानना अन्यायपूर्ण है.
आर्थिक मूल्य और सामाजिक न्याय
न्यायालय की ओर से 30,000 रुपये प्रतिमाह का न्यूनतम मूल्य निर्धारित करना प्रतीकात्मक होने के साथ-साथ व्यावहारिक भी है. यह राशि किसी गृहिणी के वास्तविक योगदान का पूर्ण मूल्यांकन नहीं हो सकती, लेकिन यह एक महत्वपूर्ण संदेश देती है कि घरेलू श्रम 'मुफ्त' नहीं है. यह निर्णय विशेष रूप से सड़क दुर्घटना और मुआवजे के मामलों में महत्वपूर्ण होगा. अतीत में कई बार अदालतें गृहिणियों की आय का निर्धारण अत्यंत कम स्तर पर करती थीं या उन्हें लगभग आय-विहीन मान लेती थीं. परिणामस्वरूप उनके परिवारों को पर्याप्त मुआवजा नहीं मिल पाता था. अब न्यायालय ने इस दृष्टिकोण को बदलने का प्रयास किया है.
इस निर्णय का एक व्यापक सामाजिक संदेश भी है कि आर्थिक मूल्य केवल बाजार में बिकने वाली वस्तुओं और सेवाओं का ही नहीं होता. देखभाल, प्रेम और पोषण भी समाज के लिए मूल्यवान हैं.

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सुप्रीम कोर्ट का फैसला और स्त्रीवादी विमर्श
दुनिया भर में स्त्रीवादी चिंतकों ने लंबे समय से यह प्रश्न उठाया है कि घरेलू श्रम को आर्थिक मान्यता क्यों नहीं मिलती. उनका तर्क रहा है कि पूंजीवादी अर्थव्यवस्था उस श्रम को महत्व देती है जो बाजार में दिखाई देता है, जबकि घर के भीतर होने वाला श्रम अदृश्य बना रहता है. भारतीय संदर्भ में यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बड़ी संख्या में महिलाएं पूर्णकालिक गृहिणी हैं. उनका योगदान परिवार और समाज की स्थिरता के लिए अनिवार्य है, फिर भी उन्हें आर्थिक रूप से आश्रित माना जाता है.
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय स्त्रीवादी चिंतन के कई मूलभूत प्रश्नों को न्यायिक मान्यता देता है. यह कहता है कि गृहकार्य कोई निष्क्रिय गतिविधि नहीं, बल्कि उत्पादक और मूल्यवान श्रम है.
केवल महिलाओं का नहीं, पूरे समाज का प्रश्न
इस प्रकार न्यायपालिका का संदेश स्पष्ट है कि घर की जिम्मेदारी केवल महिला की नहीं, बल्कि परिवार के सभी सदस्यों की साझा जिम्मेदारी है. गृहिणियों के योगदान को सम्मान देना पुरुषों और महिलाओं के बीच अधिक न्यायपूर्ण संबंधों की दिशा में भी एक कदम है.
भारतीय सांस्कृतिक परंपरा और गृहिणी
भारतीय संस्कृति में स्त्री को परिवार की आत्मा माना गया है. किंतु कई बार यह सम्मान केवल प्रतीकात्मक रह गया. आदर्शों और वास्तविकता के बीच एक बड़ा अंतर दिखाई देता है. स्त्री को 'देवी' कहने वाला समाज अक्सर उसके श्रम को आर्थिक मूल्य देने में संकोच करता रहा है. इसलिए आज आवश्यकता है कि सांस्कृतिक सम्मान के साथ-साथ वास्तविक सामाजिक और आर्थिक सम्मान भी सुनिश्चित किया जाए. न्यायालय का निर्णय इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप है. यह हमें याद दिलाता है कि सम्मान केवल शब्दों से नहीं, बल्कि संस्थागत मान्यता से भी आता है.
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय केवल गृहकार्य के आर्थिक मूल्यांकन का प्रश्न नहीं है, बल्कि उस गहरे सामाजिक अन्याय की ओर भी संकेत करता है जिसे लाखों महिलाएं अपने जीवन में झेलती हैं. एक स्त्री प्रायः अपना संपूर्ण यौवन, ऊर्जा, समय और प्रतिभा एक परिवार के निर्माण में लगा देती है. वह बच्चों के पालन-पोषण, पति के करियर, बुज़ुर्गों की सेवा और घर की व्यवस्था में अपना सर्वस्व अर्पित कर देती है. लेकिन विडंबना यह है कि इस लंबे जीवन-संघर्ष के बाद भी उसके नाम पर अक्सर कोई आर्थिक पूंजी, संपत्ति या सामाजिक सुरक्षा नहीं होती.
घर के भीतर उसका श्रम परिवार की समृद्धि में निरंतर योगदान देता है, किंतु उस योगदान का स्वामित्व प्रायः उसे नहीं मिलता. परिवार की आर्थिक उन्नति में उसकी भूमिका निर्णायक होती हैं, फिर भी संपत्ति, बचत और निर्णय लेने के अधिकार से वह कई बार दूर रहती है. परिणामस्वरूप यदि विवाह टूट जाए, पति त्याग दे या पति की मृत्यु हो जाए तो वह स्वयं को एक अत्यंत असुरक्षित स्थिति में पाती है. और भी दुखद यह है कि अक्सर ऐसे संकट के समय हर स्त्री को अपने मायके का सहारा भी उपलब्ध नहीं होता. विवाह के बाद जिस बेटी को सालों तक यह समझाया जाता है कि अब उसका घर ससुराल है, वही बेटी जब किसी कारणवश उस घर से बाहर कर दी जाती है, तो कई बार मायका भी उसे स्थायी रूप से स्वीकार करने में हिचकिचाता है. इस प्रकार वह दो परिवारों के बीच खड़ी एक ऐसी व्यक्ति बन जाती है जिसने दोनों के लिए जीवन भर दिया, लेकिन अंततः जिसके पास अपना कुछ भी नहीं बचता.
भारतीय समाज में ऐसी असंख्य महिलाएं हैं जो पति के परित्याग, तलाक, घरेलू हिंसा या वैधव्य के बाद आर्थिक संकट का सामना करती हैं. उनके पास न पर्याप्त बचत होती है, न नियमित आय, न ही सामाजिक सुरक्षा का कोई मजबूत तंत्र. कई बार तो सम्मानजनक जीवन जीने के लिए उन्हें दूसरों पर निर्भर होना पड़ता है. यह स्थिति इसलिए और भी पीड़ादायक है क्योंकि जिस परिवार की नींव को मजबूत बनाने में उन्होंने दशकों लगाए होते हैं, उसी परिवार की संपत्ति और संसाधनों पर उनका अधिकार अत्यंत सीमित रह जाता है.
महिलाओं का घरेल श्रम उपकार नहीं है
इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट द्वारा गृहिणियों को 'राष्ट्र-निर्माता' कहना केवल सम्मानसूचक शब्द नहीं है, बल्कि एक नैतिक और सामाजिक घोषणा है. यह घोषणा हमें याद दिलाती है कि घरेलू श्रम कोई निजी उपकार नहीं, बल्कि एक ऐसा निवेश है जो परिवार, समाज और राष्ट्र तीनों को समृद्ध बनाता है. इसलिए उस श्रम को केवल भावनात्मक सम्मान ही नहीं, बल्कि आर्थिक सुरक्षा और कानूनी संरक्षण भी मिलना चाहिए. समय आ गया है कि हम यह स्वीकार करें कि जिस स्त्री ने अपना पूरा जीवन एक परिवार के निर्माण में लगाया है, उसे वृद्धावस्था, वैधव्य या वैवाहिक विघटन की स्थिति में असुरक्षा और बेघरपन का सामना न करना पड़े. यदि हम सचमुच गृहिणी को 'राष्ट्र-निर्माता' मानते हैं, तो उसके श्रम के सम्मान के साथ-साथ उसके आर्थिक अधिकारों, संपत्ति में हिस्सेदारी और सामाजिक सुरक्षा की भी सुनिश्चित व्यवस्था करनी होगी. तभी यह सम्मान शब्दों से आगे बढ़कर वास्तविक न्याय का रूप ले सकेगा.
आगे की चुनौतियां क्या हैं
- हालांकि यह निर्णय ऐतिहासिक है, लेकिन केवल न्यायिक घोषणाएं पर्याप्त नहीं होंगी. हमें कुछ बड़े प्रश्नों पर भी विचार करना होगा-
- क्या घरेलू श्रम को राष्ट्रीय आय की गणना में किसी रूप में शामिल किया जा सकता है?
- क्या नीतिगत स्तर पर गृहिणियों के लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाएं विकसित की जानी चाहिए?
- क्या परिवारों में घरेलू कार्यों का अधिक न्यायपूर्ण बंटवारा संभव है?
- क्या बच्चों को बचपन से ही यह शिक्षा दी जानी चाहिए कि घर का काम सभी की साझा जिम्मेदारी है?
- इन प्रश्नों के उत्तर खोजे बिना वास्तविक परिवर्तन अधूरा रहेगा.
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भारतीय समाज में एक महत्वपूर्ण वैचारिक परिवर्तन का संकेत है. यह पहली बार नहीं है कि न्यायपालिका ने गृहिणियों के श्रम का मूल्य स्वीकार किया हो, लेकिन 'राष्ट्र-निर्माता' की संज्ञा देकर उसने इस चर्चा को एक नए स्तर पर पहुंचा दिया है. यह निर्णय हमें याद दिलाता है कि राष्ट्र केवल उन लोगों के श्रम पर नहीं खड़ा है जो कार्यालयों, कारखानों और संस्थानों में कार्य करते हैं, बल्कि उन करोड़ों महिलाओं के मौन परिश्रम पर भी टिका है जो घरों के भीतर जीवन को संभव बनाती हैं. उनके हाथों में केवल रसोई की करछी नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी होता है.
जब समाज गृहिणी को 'आश्रित' नहीं बल्कि 'राष्ट्र-निर्माता' के रूप में देखना शुरू करेगा, तभी समानता, सम्मान और न्याय की दिशा में हमारी यात्रा वास्तव में सार्थक होगी. यह निर्णय उसी यात्रा का एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है. एक गृहिणी केवल घर नहीं संभालती, वह मनुष्यों का निर्माण करती है. वह पीढ़ियों को संस्कार देती है, रिश्तों को सींचती है और समाज की नैतिक नींव को मजबूत करती है. यदि राष्ट्र का भविष्य उसके नागरिकों से बनता है, तो उन नागरिकों को गढ़ने वाली स्त्री निस्संदेह राष्ट्र-निर्माता है.
(डिस्क्लेमर: लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय के सत्यवती कॉलेज में पढ़ाती हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखिका के निजी हैं और उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)