JRD Tata Success Story: फिल्म स्टार दिलीप कुमार ने अपनी बायोग्राफी में लिखा कि एक बार वो फ्लाइट में थे. बगल की सीट पर साधारण पैंट-शर्ट पहने एक बुजुर्ग बैठे थे. दिलीप साहब को लगा कि शायद ये उन्हें पहचानेंगे, लेकिन वो बुजुर्ग तो आराम से खिड़की से बाहर देखते रहे और अखबार पढ़ते रहे.
बातचीत शुरू हुई, तो दिलीप कुमार ने पूछा, "क्या आप फिल्में देखते हैं?" बुजुर्ग ने धीमे से मुस्कुराकर कहा, "बहुत साल पहले देखी थी." जब फ्लाइट लैंड हुई, तो दिलीप साहब ने गर्व से हाथ आगे बढ़ाया और कहा, "मेरा नाम दिलीप कुमार है." उन बुजुर्ग ने बड़े प्यार से हाथ मिलाया और बहुत ही सादगी से बोले, "मेरा नाम जेआरडी टाटा है." दिलीप साहब सन्न रह गए. जिस एयर इंडिया की फ्लाइट में वो बैठे थे, उसका कर्ता-धर्ता, उसका मालिक उनके बगल में इतनी खामोशी से बैठा था. उस दिन दिलीप साहब को समझ आया कि दुनिया में आप कितने भी ऊंचे मुकाम पर पहुंच जाएं, सिर हमेशा झुकाकर रखिए क्योंकि आपसे भी बड़ा कोई न कोई हमेशा मौजूद रहता है. आज जेआरडी टाटा के जन्मदिन पर उनकी जिंदगी के कुछ पन्ने उलटते हैं...
फ्रेंच मां और इंडियन पारसी पिता की संतान
29 जुलाई 1904 को पेरिस में जन्मे जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा यानी जेआरडी की मां फ्रेंच थीं, इसलिए वो बचपन में फ्रेंच बोलते थे. फ्रांस, इंग्लैंड और जापान में पढ़ाई करते हुए इस लड़के की आंखों में एक ही सपना तैरता रहता था- आसमान को नापने का, पायलट बनने का. लेकिन पिता की एक आवाज पर उन्होंने किताबों को समेटा और वतन वापस लौट आए.
1925 में उन्होंने जमशेदपुर में टाटा ग्रुप में एक मामूली इंटर्न के तौर पर कदम रखा. वहां के जनरल मैनेजर मिस्टर पीटरसन को अपना गुरु मानते थे और उनके पीए (PA) की तरह काम करते थे. पर किस्मत का पहिया इतनी तेजी से घूमा कि महज 22 साल की उम्र में, पिता के साए से उठ जाने के बाद, उन्हें टाटा सन्स के बोर्ड में शामिल होना पड़ा.

देश के पहले कमर्शियल पायलट बने जेआरडी
कहते हैं न कि अगर हौसलों में दम हो तो आसमान भी झुक जाता है. जेआरडी ने मुंबई में पायलट का कोर्स पूरा किया और बन गए देश के पहले कमर्शियल पायलट. लेकिन वो सिर्फ खुद नहीं उड़ना चाहते थे, वो पूरे देश को उड़ाना चाहते थे. साल 1932 में उन्होंने 'टाटा एयरलाइंस' (आज की एयर इंडिया) की नींव रखी. कराची से मुंबई तक की पहली फ्लाइट खुद उड़ाकर उन्होंने जो इतिहास लिखा, उसी ने उन्हें फादर ऑफ इंडियन एविएशन बना दिया. उनकी इसी सूझबूझ को देखकर महज 34 साल की उम्र में उन्हें टाटा सन्स की कमान सौंप दी गई.


सुधा मूर्ति ने गुस्से में लिखी चिट्ठी, महिलाओं को मिला सम्मान
यह किस्सा उस दौर का है जब महिलाओं के लिए बंदिशें आम थीं. एक दिन टाटा की टेल्को में जॉब वैकेंसी निकली, जिस पर लिखा था- "केवल पुरुष इंजीनियरों की आवश्यकता है." इसे पढ़कर एक इंजीनियरिंग पासआउट लड़की गुस्से में भर गई. उसने सीधे जेआरडी टाटा को पोस्टकार्ड लिखकर इसका विरोध दर्ज जातते हुए इसे कंपनी का का पुरुष-महिला वाला भेदभाव बताया.
जेआरडी ने उस चिट्ठी को कचरे के डिब्बे में नहीं फेंका, बल्कि तुरंत उस लड़की को इंटरव्यू के लिए बुलाया और नौकरी दी. जानते हैं वो लड़की कौन थीं? वो थीं देश की पहली महिला ऑटोमोबाइल इंजीनियर और इंफोसिस फाउंडेशन की चेयरपर्सन सुधा मूर्ति. जेआरडी ने एक झटके में रूढ़ियों को तोड़कर महिला सशक्तिकरण की ऐसी मिसाल कायम की जो आज भी कायम है. सबसे बड़ा उदाहरण है टाटा की लैक्मे कंपनी.

नेहरू को सलाह और 'प्राइम मिनिस्टर रिलीफ फंड' का जन्म
बंटवारे का वो दर्दनाक दौर, जब देश दंगों की आग में झुलस रहा था. जेआरडी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू को एक नेक सलाह दी कि क्यों न पीड़ितों की मदद के लिए एक सार्वजनिक दान कोष बनाया जाए, जिसमें सबसे पहला योगदान टाटा खुद देगा. नेहरू को यह बात जंच गई और इसी तरह जन्म हुआ 'प्राइम मिनिस्टर नेशनल रिलीफ फंड' का, जो आज भी हर बड़ी प्राकृतिक आपदा या संकट में देशवासियों के काम आता है.
साल 1953 में जब सरकार ने उनकी प्यारी टाटा एयरलाइंस का राष्ट्रीयकरण कर दिया, तो जेआरडी का दिल टूट गया. लेकिन देश के प्रति उनका प्यार इतना निस्वार्थ था कि उन्होंने बिना किसी कड़वाहट के एयर इंडिया का चेयरमैन बने रहना स्वीकार किया, क्योंकि उनके लिए रूतबा नहीं, देश का विकास मायने रखता था.

उनके 50 साल के सफर में टाटा ग्रुप की संपत्ति 50 गुना बढ़ गई. उन्होंने 14 कंपनियों के छोटे से कुनबे को 95 बड़ी कंपनियों के साम्राज्य में तब्दील कर दिया. उन्होंने देश में पहली बार एचआर विभाग की शुरुआत की. इतना ही नहीं, देश में 8 घंटे की शिफ्ट और पैड लीव, मेडिकल इंश्योरेंस जैसे क्रांतिकारी नियम भी देश में टाटा कंपनी में लाने वाले जेआरडी ही थे. उनके इस बदलावों को भारत की आज सारी कंपनियां लागू करती हैं.
मुझे भारत रत्न क्यों दिया जा रहा है?
वायुसेना ने उन्हें 'एयर वाइस मार्शल' के मानद पद से नवाजा. फ्रांस का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान 'लीजन ऑफ ऑनर' भी मिला था. लेकिन उनकी सादगी का आलम यह था कि जब उन्हें 'भारत रत्न' देने का ऐलान हुआ, तो उन्होंने रतन टाटा से बेहद संकोच से कहा था, "रतन, मैंने ऐसा क्या खास कर दिया? ये तो भारत का कोई भी नागरिक होता तो अपने देश के लिए करता."

जेआरडी अक्सर कहते थे... दौलत खाद की तरह है
1992 में जब उन्हें देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' दिया गया, तो मानो इस सम्मान का खुद का गौरव बढ़ गया. जेआरडी हमेशा एक बात कहते थे- "पैसा खाद (मैन्योर) की तरह है. जब आप इसे एक जगह ढेर कर देते हैं, तो इससे बदबू आने लगती है. लेकिन जब आप इसे फैला देते हैं, तो यह फसल उगाता है, खुशहाली लाता है."
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