राजनीति में जाति एक ऐसी सच्चाई है जिसको कभी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. हाल ही में हुए जेन-ज़ी आंदोलन का नतीजा ये हुआ कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपना पद छोड़ना पड़ गया. धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद यूपी में उनकी जाति को लेकर नई बहस छिड़ गई है. सोशल मीडिया में दावा किया जा रहा है कि धर्मेंद्र प्रधान को इसलिए टारगेट किया गया क्योंकि वो कुर्मी बिरादरी से आते हैं और उनका इस्तीफ़ा कुर्मियों के लिए अपमान है.
तमाम सोशल मीडिया अकाउंट से पोस्ट करके समाजवादी पार्टी और कांग्रेस को निशाने पर लेने की कोशिश हो रही है. कहा जा रहा है कि सपा और कांग्रेस ने जिस तरह कुर्मी समाज से आने वाले धर्मेंद्र प्रधान पर निशाना साधा, उससे कुर्मी समाज आहत है और इसका जवाब आने वाले विधानसभा चुनाव में कुर्मी विपक्षी दलों का बहिष्कार करके देने की तैयारी में हैं. वाट्स ऐप ग्रुप्स पर भी धर्मेंद्र प्रधान को कुर्मी बताकर उनके अपमान की बात फैलाई जा रही है.
प्रदर्शन पेपर लीक का, कुर्मी जाति कहां से आई?
बात सिर्फ धर्मेंद्र प्रधान के अपमान तक सीमित नहीं रही. सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के एक पोस्ट को लेकर दावा किया गया कि बिहार के सिवान में एके-47 चलाने वाला सिपाही भी कुर्मी समाज से आता है और इसी वजह से उसे भी टारगेट किया जा रहा है. दावा है कि एके-47 चलाने वाले सिपाही का नाम अभिषेक पटेल है और वो कुर्मी समाज से आता है. सिर्फ इसी वजह से अखिलेश यादव ने तस्वीर पोस्ट करके उस सिपाही पर कार्रवाई करने की मांग की है.
दरअसल यूपी में पिछड़ों की राजनीति में यादव के बाद कुर्मी वोट बैंक सियासत में सबसे बड़ी मानी जाती है. कुर्मी राजनीति का असर है कि सपा में सालों तक नरेश उत्तम पटेल प्रदेश अध्यक्ष बने रहे. बीजेपी के वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी भी कुर्मी हैं और कैबिनेट मंत्री और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह भी कुर्मी बिरादरी से आते हैं. केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल की अपना दल की पूरी राजनीति कुर्मी वोट बैंक के इर्द गिर्द केंद्रित रही है. किसी भी सरकार में कुर्मी बिरादरी का नेतृत्व अछूता नहीं रहा है.
आंकड़ों की बात करें तो उत्तर प्रदेश में कुर्मी आबादी 6-8 फ़ीसदी मानी जाती है. कुर्मी का असर इसलिए भी ज़्यादा दिखाई देता है क्योंकि कुर्मी आबादी जहां बसी है, आम तौर पर इकट्ठी रहती है. इस वजह से चुनावी जीत हार के नतीजों में कुर्मी बेहद असर डालने वाली बिरादरी साबित होती रही है. पूरे प्रदेश में इस जाति का असर लगभग 100 सीटों पर माना जाता है लेकिन लगभग 40-45 सीटों पर जीत हार तय करने में कर्मियों की बड़ी भूमिका रहती है.
कुर्मी-सैथवार समाज की बात करें तो इनके कई टाइटल्स से जाना पहचाना जाता रहा है. पटेल, गंगवार, सचान, वर्मा, कटियार और चौधरी जैसे टाइटल सामान्य तौर पर कुर्मी होने का प्रतीक हैं. कुछ लोग सिंह भी लिखते रहे हैं लेकिन इनकी संख्या बेहद कम है. माना जाता है कि कुर्मी समाज के प्रभाव में लगभग दस लोकसभा सीटें हैं. समाजवादी पार्टी ने 2024 के लोकसभा चुनाव के 10 कुर्मी प्रत्याशी उतारे थे, जिनमें 7 को जीत भी मिल गई. कहा गया कि कुर्मी वोट बैंक खिसकने की वजह से ही बीजेपी ने पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर कुर्कियों को एक संकेत देने की कोशिश की है.
बात करें धर्मेंद्र प्रधान की तो वो ओडिशा से आते हैं. यूपी में बीजेपी के चुनाव प्रभारी रह चुके हैं. उनका सीधा कनेक्शन तो यूपी की राजनीति से नहीं है लेकिन बतौर चुनाव प्रभारी उनकी पकड़ यूपी के सभी क्षेत्रों में मानी जाती है. ऐसे में धर्मेंद्र प्रधान के नाम पर यूपी में जिस तरह से कुर्मी कार्ड खेला जा रहा है, ये विपक्ष में बैठी सपा और कांग्रेस को परेशान ज़रूर कर सकता है.
यूपी में कुर्मी जाति का क्यों महत्वपूर्ण
उत्तर प्रदेश की सियासत में कुर्मी, यादवों के बाद OBC की दूसरी सबसे बड़ी जाति है. यही कुर्मी समाज भाजपा की नई रणनीति का केंद्र बनी है. जब केंद्रीय मंत्री पंकज चौधरी को यूपी भाजपा अध्यक्ष बनाया था तो उसे जानकार 2027 विधानसभा चुनाव से पहले बड़ा संदेश मान रहे थे.
इससे पहले भी भाजपा का कुर्मी कार्ड वर्ष 2022 में सफल हुआ था, उस समय स्वतंत्र देव सिंह प्रदेश अध्यक्ष थे और भाजपा की पांच वर्ष सरकार रहने के बावजूद 403 में से 255 सीटें मिली थीं. प्रदेश की राजनीति में कुर्मी समाज की आबादी भले ही आठ प्रतिशत हो, लेकिन 70 से 80 विधान सभा सीटों पर इनका सीधा प्रभाव माना जाता है. खासकर पूर्वांचल, अवध, बुंदेलखंड और तराई क्षेत्रों में कुर्मी मतदाता कई सीटों पर जीत-हार का रुख तय करते हैं.
यूपी की राजनीति में कुर्मियों का इतना महत्व क्यों
2001 में यूपी सरकार की बनाई हुकुम सिंह कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार, कुर्मी (और पटेल) की आबादी राज्य की कुल जनसंख्या का लगभग 7.4% है. यह रिपोर्ट ग्रामीण परिवार रजिस्टरों पर आधारित थी. इसमें OBC की कुल आबादी 50% से अधिक बताई गई थी. 2011 जनगणना में यूपी की कुल आबादी करीब 20 करोड़ थी. 2025 की अनुमानित आबादी करीब 25 करोड़ है. इस हिसाब से प्रदेश में कुर्मी की आबादी करीब 1.75 से 2 करोड़ के बीच मानी जाती है.
किस दल में कितने कुर्मी विधायक और सांसद
अगर मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य की बात करें, तो प्रदेश के 403 विधायकों में कुर्मी/पटेल की संख्या 40 है. इसमें भाजपा से 27, सपा से 12 और कांग्रेस से 1 विधायक हैं. 100 एमएलसी में 5 कुर्मी समाज से हैं. यूपी की 80 लोकसभा सीटों में भी 11 सांसद कुर्मी समाज से हैं. इसमें सपा से 7, भाजपा के 3 और अपना दल (एस) की अनुप्रिया पटेल सांसद हैं.
विधायकों में ब्राह्मण के बाद सबसे अधिक कुर्मी विधायक हैं. जबकि सांसदों में ब्राह्मणों के बराबर इनकी संख्या है. उत्तरप्रदेश में पूर्वांचल, अवध, मध्य यूपी और बुंदेलखंड में 128 सीटों पर कुर्मी वोटर प्रभावी भूमिका रखते हैं. जबकि, 48-50 सीटों पर वे निर्णायक असर रखते हैं. इसी तरह लोकसभा की 27 सीटों पर उनका प्रभाव है. लेकिन, 11 सीटों पर जीत-हार तय करते हैं.
यूपी की राजनीति में कुर्मी 'किंग मेकर' की भूमिका निभाते हैं. लेकिन यादवों (सपा) या जाटवों (BSP) की तरह किसी एक पार्टी से बंधे नहीं हैं. 90 के दशक में कांशीराम (राम लखन सिंह पटेल, लालजी वर्मा) और मुलायम सिंह यादव (बेनीप्रसाद वर्मा, नरेश उत्तम पटेल) ने कुर्मी नेताओं को आगे बढ़ाकर इस वोटबैंक को साधा. भाजपा ने विनय कटियार, ओमप्रकाश सिंह और महज 26 की उम्र में पंकज चौधरी को सांसद बनाकर कोशिश की, पर 2014 से पहले यह वोटबैंक ज्यादा सपा-बसपा के पास रहा.
2014 में अमित शाह के नेतृत्व में 'अपना दल' से गठबंधन और स्वतंत्र देव सिंह व पंकज चौधरी जैसे नेताओं को आगे बढ़ाने से भाजपा को बड़ा राजनीतिक फायदा मिला. 2022 में भाजपा के सबसे अधिक 27 कुर्मी विधायक चुने गए; अब 2024 के झटके के बाद 2027 चुनाव से पहले कुर्मी समाज को फिर साधने के लिए पंकज चौधरी को कमान सौंपी गई है.
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