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सिंधु जल समझौता: सबसे बड़ा 'बलिदान' देकर भी उदारता की भारी कीमत चुका रहा भारत

सिंधु जल समझौते के तहत पाकिस्तान को लगभग 80 फीसदी पानी पर अधिकार दे दिया गया, जबकि भारत को उदारता दिखाने और अपना हक छोड़ने के बावजूद केवल 20 प्रतिशत पानी ही दिया गया.

सिंधु जल समझौता: सबसे बड़ा 'बलिदान' देकर भी उदारता की भारी कीमत चुका रहा भारत

भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु नदी जल प्रणाली में छह मुख्य नदियां शामिल हैं- सिंधु, चिनाब, झेलम, रावी, ब्यास और सतलुज. दोनों ही पड़ोसी देशों में इन नदियों का पानी पेयजल, कृषि और बिजली उत्पादन में इस्तेमाल होता रहा है. सीमा के दोनों तरफ के लाखों लोगों की जिंदगी इस पानी पर निर्भर है. लेकिन असलियत ये है कि इन नदियों के जल बंटवारे में दशकों से भारी असमानता रही है और पाकिस्तान इसका बेजा फायदा उठाता आया है. 

1947 में जब भारत और पाकिस्तान का विभाजन हुआ था, उस समय सिंधु नदी सिस्टम का भी बंटवारा किया गया था. भौगोलिक स्थिति यह है कि ऊपर की तरफ स्थित होने के कारण इन नदियों का पानी भारत से होकर पाकिस्तान जाता है. पाकिस्तान में खेती का बड़ा हिस्सा इन्हीं नदियों के बहाव पर निर्भर रहा है. 

भारत को अपनी जरूरतों और पंजाब व राजस्थान जैसे राज्यों में डेवलपमेंट प्रोजेक्टों के लिए इस पानी की जरूरत होती है. इसके बावजूद भारत ने पड़ोसी देश से स्थिर संबंध रखने के लिए अपनी जरूरतों की कुर्बानी देते हुए 19 सितंबर 1960 को विश्व बैंक की मध्यस्थता में एक बेहद उदार समझौता किया.

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भारत ने चुकाई बड़ी कीमत

भारत और पाकिस्तान के बीच इस समझौते को लेकर बातचीत की शुरुआत से ही असमानता रही. भारत का नजरिया रचनात्मक और तर्कसंगत था, वहीं पाकिस्तान ज्यादा से ज्यादा हासिल करना चाहता था और कई बार उसकी मांगें बेतुकी थीं. इसी का परिणाम रहा कि समझौता जहां बराबरी का होना चाहिए था, लेकिन वह पाकिस्तान के पाले में ज्यादा झुक गया. 

सिंधु नदी सिस्टम के जल बंटवारे को लेकर विश्व बैंक ने 5 फरवरी 1954 को  पहला ठोस प्रस्ताव तैयार किया. इस शुरुआती प्रस्ताव में ही भारत पर एकतरफा शर्तें थोप दी गईं-

  • सिंधु और चिनाब नदियों के ऊपरी हिस्सों में भारत को अपनी सभी प्रस्तावित विकास परियोजनाओं को छोड़ना होगा. इसका सीधा फायदा पाकिस्तान को होना था.
  • भारत को चिनाब नदी से लगभग 6 MAF (60 लाख एकड़ फुट) पानी मोड़ने का दावा छोड़ना होगा.
  • मराला (अब पाकिस्तान) में चिनाब नदी के पानी पर भारत को इस्तेमाल का हक नहीं होगा. 
  • सिंधु नदी जल प्रणाली से कच्छ में किसी भी जल संबंधी योजना की अनुमति नहीं दी होगी.

इस प्रस्ताव में भारत के हितों को चोट पहुंचाने वाली कई शर्तें थीं, लेकिन भारत सरकार ने सद्भावना दिखाते हुए इसे तुरंत स्वीकार कर लिया. वहीं पाकिस्तान ने इसे औपचारिक रूप से मंजूरी देने में करीब 5 साल यानी 22 दिसंबर 1958 तक का समय लगा दिया. 

भारत के इस सद्भावनापूर्ण बर्ताव के बावजूद, उसके ऊपर कई प्रतिबंध लगा दिए गए, जबकि पाकिस्तान बिना किसी रोक-टोक के पश्चिमी नदियों के पानी का नए-नए तरीके से उपयोग करता रहा. पाकिस्तान जान चुका था कि किस तरह मुश्किलें पैदा करने का फायदा उठाया जाए, जबकि भारत को सहयोग की बड़ी कीमत चुकानी पड़ी. इस सबक को पाकिस्तान तब से लेकर अब तक इस्तेमाल करता आया है. 

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भारत ने कितना बलिदान दिया?

पानी का बंटवारा

  • संधि फॉर्मूले के तहत भारत को तीन पूर्वी नदियों- सतलुज, ब्यास, रावी का विशेष अधिकार मिला, जबकि पाकिस्तान को तीन पश्चिमी नदियों-सिंधु, चिनाब, झेलम के पानी में हक दिया गया.
  • भारत के अपने खुद के इलाके में पश्चिमी नदियों के सीमित इस्तेमाल की अनुमति मिली, जो मुख्य रूप से जल विद्युत उत्पादन के लिए थी लेकिन इस पर भी डिजाइन और ऑपरेशन संबंधी व्यापक शर्तें थोपी गईं. 
  • भारत को जिन पूर्वी नदियों पर अधिकार मिला, उनसे साल में लगभग 33 मिलियन एकड़ फीट (MAF) पानी बहता है. वहीं पाकिस्तान को पश्चिमी नदियों के सालाना 135 MAF पानी पर हक दे दिया गया. 

इस तरह पाकिस्तान को सिंधु जल प्रणाली के लगभग 80 फीसदी पानी पर अधिकार मिल गया, जबकि भारत को तमाम दावे छोड़ने के बावजूद केवल 20 प्रतिशत पानी मिला. 

भारत को विशाल पश्चिमी नदी प्रणाली पर अपने सभी दावों को छोड़ने के बदले में केवल उस पानी की मंजूरी मिली, जिसका वह पहले से इस्तेमाल कर रहा था.

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पानी दिया, हर्जाना भी भरा

इस संधि की सबसे अजीब शर्त इसके वित्तीय नियम थे. भारत पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में जल संबंधी इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करने के नाम पर लगभग 62 मिलियन पाउंड (मौजूदा कीमत लगभग 2.5 अरब डॉलर) का मुआवजा देने पर सहमत हो गया. 

यह इस मायने में दुनिया का अनोखा उदाहरण है, जहां ऊपरी तटवर्ती देश को एक तरफ अपने पानी पर विशेषाधिकार छोड़ना पड़ा, तो दूसरी तरफ निचले देश (पाकिस्तान) को मुआवजा भी देना पड़ रहा था. इस तरह भारत ने पाकिस्तान के जबर्दस्त फेवर वाली इस संधि को स्वीकार किया. 

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भारत के साथ कितना अन्याय?

सिंधु जल संधि के तहत केवल भारत पर पश्चिमी नदियों को लेकर डिजाइन और परिचालन संबंधी कई प्रतिबंध लगा दिए गए, जबकि पाकिस्तान पर ऐसी कोई जिम्मेदारी नहीं डाली गई-

  • भारत अपने इलाके में केवल सीमित सिंचित फसल क्षेत्र (ICA) ही विकसित कर सकता है.
  • पश्चिमी नदियों के जल भंडारण सुविधाओं में पानी की मात्रा पर सख्त सीमाएं रख दी गईं.
  • पनबिजली परियोजनाओं के डिजाइन और भंडारण क्षमता पर भी भारत को कठिन नियमों का पालन करना पड़ता है.

जाहिर है, ये प्रतिबंध एकतरफा हैं जो भारत के ऊपर अपने क्षेत्र में संसाधनों के वैध इस्तेमाल पर रोक लगाते हैं. वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान पर पारदर्शिता या प्रतिबंध की ऐसी शर्त नहीं लगाई गई है. नतीजा ये कि पाकिस्तान इस संधि के तहत नदियों के गारंटीशुदा पानी का फायदा उठाता है, वहीं भारत को कठघरे में खड़ा कर दिया गया है. 

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