India News: देश के स्पेस इतिहास में पहली बार कोई प्राइवेट कंपनी पृथ्वी की कक्षा (Orbit) में अपना रॉकेट भेजने जा रही है. स्काईरूट एयरोस्पेस ने अपनी इस पहली टेस्ट फ्लाइट को 'मिशन आगमन' नाम दिया गया है. गुरुवार को बताया गया कि कंपनी का यह पहला ऑर्बिटल रॉकेट 'विक्रम-1' अब पूरी तरह से असेंबल होकर श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर (SDSC) के ऐतिहासिक 'फर्स्ट लॉन्च पैड' पर उड़ान के लिए तैयार खड़ा है, जिसकी लॉन्चिंग 12 जुलाई से 4 अगस्त 2026 के बीच होगी.
450 KM ऊपर जाकर पेलोड करेगा सेट
लॉन्च पैड से उड़ान भरने के बाद यह रॉकेट सीधे 450 किलोमीटर ऊपर अंतरिक्ष में जाएगा. वहां इसका काम भारत और विदेशों के ग्राहकों के सैटेलाइट्स को उनकी सही जगह पर सुरक्षित छोड़ना है. कंपनी के मुताबिक, यह उनका फाइनल मिशन नहीं, बल्कि एक सिर्फ एक टेस्ट उड़ान है. जमीन पर सारे टेस्ट करने के बाद, कंपनी अब यह देखना चाहती है कि जब रॉकेट सचमुच आसमान चीरकर ऊपर जाता है, तो उसकी तकनीक और इंजन असलियत में कैसा काम करते हैं. जैसे ही यह टेस्ट फ्लाइट कामयाब होगी, स्काईरूट कंपनी का असली बिजनेस शुरू हो जाएगा. इसके बाद कंपनी दुनिया भर के देशों और बड़ी-बड़ी कंपनियों के सैटेलाइट्स को पैसे लेकर अंतरिक्ष में भेजने की रेगुलर सर्विस शुरू कर देगी.
📸 Vikram-1 Stage 4 stacking completed. pic.twitter.com/1W9h6JqpI1
— Skyroot Aerospace (@SkyrootA) July 2, 2026
विक्रम-S से विक्रम-1: क्यों खास है यह छलांग?
यहां यह जानना जरूरी है कि नवंबर 2022 में स्काईरूट ने 'विक्रम-S' रॉकेट लॉन्च करके इतिहास रचा था, लेकिन वह सिर्फ अंतरिक्ष की सीमा को छूकर वापस आ गया था. मगर इस बार, 'विक्रम-1' सीधे पृथ्वी की कक्षा में सैटेलाइट स्थापित करने जा रहा है. कंपनी के 1000 से ज्यादा कर्मचारियों की मेहनत से तैयार यह रॉकेट भारत के कमर्शियल स्पेस मार्केट की पूरी तस्वीर बदल देगा.
भटकने पर खुद अपना रास्ता सुधारने में माहिर
इस सफर को पूरी तरह सुरक्षित बनाने के लिए रॉकेट को बेहद स्मार्ट तकनीक से लैस किया गया है. इसमें एक एडवांस नेविगेशन (GNC) सिस्टम लगा है. इसके कारण, अगर उड़ान के दौरान तेज हवा या किसी दबाव से रॉकेट अपने तय रास्ते से जरा भी भटकता है, तो इसका सॉफ्टवेयर बिना किसी बाहरी कमांड के खुद अपनी गलती सुधार लेगा और वापस सही रास्ते पर आ जाएगा.
रॉकेट का मास्टरमाइंड है 'रामानुजन' कंप्यूटर
इस खुद-ब-खुद काम करने वाले सिस्टम को कंट्रोल करने के लिए रॉकेट के अंदर सेंसर्स का एक जाल बिछाया गया है, जो बिल्कुल इंसानी नर्वस सिस्टम की तरह काम करता है. इस पूरे सिस्टम का मुख्य दिमाग इसका 'मिशन कंप्यूटर' है, जिसे महान भारतीय गणितज्ञ के सम्मान में 'रामानुजन' नाम दिया गया है. उड़ान के दौरान स्काईरूट के इंजीनियर्स 'रामानुजन' की मदद से रॉकेट के प्रोपल्शन सिस्टम और स्टेज सेपरेशन पर पैनी नजर रखेंगे. उड़ान के पहले सेकंड से लेकर मंजिल तक, यही मास्टरमाइंड कंप्यूटर विक्रम-1 के हर हिस्से को कमांड देगा.
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