- UN मानवाधिकार परिषद में भारतीय राजनयिक क्षितिज त्यागी ने पाकिस्तान को कश्मीर मुद्दे पर कड़ा जवाब दिया
- त्यागी ने कहा कि जम्मू-कश्मीर भारत का अविभाज्य हिस्सा है और पाकिस्तान को कब्जा खाली करने की मांग की
- पाकिस्तान द्वारा कश्मीर में जातीय सफाई और आतंकवाद का समर्थन करने का आरोप लगाया गया है, जो विडंबना पूर्ण है
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में पाकिस्तान ने एक बार फिर कश्मीर का राग अलापा तो भारत ने उसे आईना दिखा दिया. भारतीय राजनयिक क्षितिज त्यागी ने कहा कि पाकिस्तान के लिए बेहतर होगा कि वह दूसरों की जमीन पर कब्जा करने या आतंकवाद फैलाने के बजाय विकास पर ध्यान दे, क्योंकि न तो इन चीजों से और न ही काउंसिल में किए जाने वाले ड्रामे से उसे उन कर्जों को चुकाने में मदद मिलेगी.
'जम्मू-कश्मीर का हिस्सा खाली करो'
UN मानवाधिकार परिषद में पाकिस्तान को जवाब देते हुए भारतीय राजनयिक क्षितिज त्यागी ने कहा, "पाकिस्तान इतिहास को गलत तरीके से पेश करने, मनगढ़ंत आंकड़े देने और सांप्रदायिक आरोप लगाने का जो अजीब काम कर रहा है, उसके जवाब में भारत अपना पक्ष रख रहा है. ऐसा लगता है कि पाकिस्तान को हर एजेंडा आइटम पर यह याद दिलाने की जरूरत है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा था, है और हमेशा रहेगा. जम्मू-कश्मीर का एकमात्र हिस्सा जो विदेशी कब्जे में है, वह पाकिस्तान के पास है, और हम उससे इसे खाली करने की मांग करते हैं."
भारत के अल्पसंख्यकों की बात की
क्षितिज त्यागी ने आगे कहा, "पाकिस्तान ने जो शिकायतें गिनाईं, उनमें शराब की दुकानों के साथ-साथ मंदिरों का भी जिक्र किया. हम इस दावे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देंगे. लेकिन परिषद को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि इससे क्या पता चलता है: एक ऐसा देश जो पूजा-स्थल को अपराध का सबूत मानता है. पाकिस्तान दूसरों की आस्था को इसी नजरिए से देखता है, और उसके अपने अल्पसंख्यक इसके नतीजे भुगतते हैं. भारत में दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी में से एक रहती है, और हमारे अल्पसंख्यक वोट देते हैं, कानून बनाते हैं, हमारी सर्वोच्च अदालत में बैठते हैं और हमारे संस्थानों का नेतृत्व करते हैं."
फिर पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों का हाल बताया
भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए क्षितिज त्यागी ने कहा, "पाकिस्तान में आजादी के बाद से हिंदू, सिख और ईसाई समुदायों की संख्या में भारी कमी आई है. उनकी बेटियों का अपहरण किया जाता है, जबरदस्ती धर्म परिवर्तन कराया जाता है और शादी करा दी जाती है. ईशनिंदा कानून हर अल्पसंख्यक परिवार पर लटके रहते हैं. उसके अपने मुस्लिम अल्पसंख्यक - शिया, अहमदी, इस्माइली और हजारा - व्यवस्थित उत्पीड़न का सामना करते हैं, और उनके पूजा-स्थलों पर हमले होते हैं और उन्हें अपवित्र किया जाता है. ऐसा रिकॉर्ड रखने वाला देश किसी को भी अल्पसंख्यकों के बारे में उपदेश देने की स्थिति में नहीं है. पाकिस्तान कश्मीर घाटी में जातीय सफाए की बात करता है. परिषद को इसे समझने के लिए पाकिस्तान की जरूरत नहीं है. यह 1990 में कश्मीरी पंडितों के साथ हुआ था, जिन्हें उन आतंकवादियों ने उनके घरों से खदेड़ दिया था, जिन्हें पाकिस्तान ने हथियार दिए, ट्रेनिंग दी और सीमा पार भेजा. उन्हीं आतंकवादियों ने तब से हर धर्म के कश्मीरियों को मारा है, जिनमें से कई मुस्लिम थे. जिस देश ने उन्हें प्रायोजित किया, वही अब इस परिषद से जांच की मांग कर रहा है. परिषद इस विडंबना को जरूर समझेगी."
पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर का हाल भी बताया
क्षितिज त्यागी ने इसके बाद कहा, "पाकिस्तान का कहना है कि वह जिस स्थिति का वर्णन कर रहा है, वह इस परिषद का ध्यान आकर्षित करने के लिए सभी वस्तुनिष्ठ मानदंडों को पूरा करती है. हम सहमत हैं कि ऐसी स्थिति मौजूद है. पिछले शुक्रवार को इस परिषद को बताया गया था कि जून के बाद से पाकिस्तान के कब्जे वाले इलाके में कई नागरिक मारे गए, इस्लामाबाद और रावलपिंडी में छात्रों को गिरफ्तार किया गया, और भोजन और दवाइयां रोकी गईं. जब ये बातें बताई गईं, तो पाकिस्तान का जवाब 'पॉइंट ऑफ ऑर्डर' था. अगर इस कमरे में कोई प्रतिनिधिमंडल सभी वस्तुनिष्ठ मानदंडों को पूरा करता है... अगर इस काउंसिल की नजर किसी पर है, तो वह पाकिस्तान है. पाकिस्तान के लिए बेहतर होगा कि वह दूसरों की जमीन पर कब्जा करने या आतंकवाद फैलाने के बजाय विकास पर ध्यान दे, क्योंकि न तो इन चीजों से और न ही काउंसिल में किए जाने वाले ड्रामे से उसे उन कर्जों को चुकाने में मदद मिलेगी, जिन पर उसकी अर्थव्यवस्था टिकी है."
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