जिस 'पितृसत्ता' पर हमलावर रहते हैं राहुल, वह शब्द आया कहां से? क्या होता है इसका मतलब

जमुई की घटना को राहुल गांधी ने 'पितृसत्ता' से जोड़ दिया. लेकिन ये 'पितृसत्ता' शब्द आया कहां से और इसका मतलब क्या होता है? जानते हैं.

जिस 'पितृसत्ता' पर हमलावर रहते हैं राहुल, वह शब्द आया कहां से? क्या होता है इसका मतलब
राहुल गांधी पितृसत्ता को लेकर हमलावर रहते हैं.

बिहार के जमुई में एक छात्रा के साथ जो कुछ हुआ, वह बहुत परेशान करने वाला है. वह छात्रा अपने दोस्त के साथ पहाड़ी घूमने आई थी और जब दोनों वापस लौट रहे थे, तब भीड़ ने उन्हें घेर लिया. छात्र को पीटा गया तो छात्रा के साथ छेड़खानी की गई. इस पूरी घटना का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ और तब जाकर कोई कार्रवाई हुई.

जमुई की इस घटना के बाद हर तरफ गुस्सा है. दूसरी तरफ लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी ने इस घटना को 'पितृसत्तात्मक' बताया. राहुल ने कहा कि 'यह संस्कृति नहीं, यह पितृसत्ता है.'

Advertisement - Scroll to continue

'पितृसत्ता' या 'पितृसत्तात्मक सोच' पर राहुल गांधी का ये पहला हमला नहीं है. राहुल गांधी पिछले कुछ समय से इस पर हमला कर रहे हैं. उन्होंने पुणे में 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम में 'डिस्ट्रॉय पैट्रियार्की' का संदेश दिया था. 

पितृसत्ता माने क्या?

लेकिन इस पितृसत्ता का असली मतलब क्या है? क्या इसका मतलब सिर्फ इतना है कि 'घर पर पापा की चलती है.' 

अगर आप भी पितृसत्ता से सिर्फ 'पापा की चलती है' समझते हैं तो शायद गलत हैं. क्योंकि इसका मतलब सिर्फ इतना ही नहीं है. 

Advertisement - Scroll to continue
Latest and Breaking News on NDTV

पितृसत्ता में कई सारे सवाल आते हैं. मसलन- परिवार का मुखिया कौन है? संपत्ति किसके नाम पर है? बच्चे किसके नाम से पहचाने जाते हैं? शादी के बाद महिला किस परिवार में जाती है? बड़े फैसले कौन लेता है? घर के कामों को किस तरह बांटा जाता है? राजनीतिक सत्ता किसके हाथ में है? 

लेकिन यह शब्द आया कहां से? अंग्रेजी में पितृसत्ता को 'patriarchy' कहते हैं. इसका अर्थ है- पिता का शासन.

'Patriarchy' की जड़ ग्रीक शब्द 'Patriarkhia' में है. इसे दो हिस्सों में बांटते हैं. Patria, जिसका मतलब है परिवार, वंश या पिता से जुड़ा. और Arche, जिसका मतलब है शासन, सत्ता या शासक. ऑक्सफोर्ड के अनुसार, Patriarchy अंग्रेजी में 17वीं सदी के दौरान ग्रीक के Patriarkhia से आया.

क्या है इसका इतिहास?

कई लोग यह मान लेते हैं कि पुरुष-प्रधान व्यवस्था एक प्राकृतिक या जैविक सच्चाई है. हालांकि, मानवविज्ञानी और इतिहासकार इस दावे को पूरी तरह खारिज करते हैं.

इतिहासकारों के अनुसार, जब इंसान जंगलों में कंद-मूल इकट्ठा करता था और शिकार करता था, तब समाज काफी हद तक समतावादी था. उस दौर में जिंदा रहने के लिए महिला और पुरुष दोनों का योगदान बराबर था. किसी एक का दूसरे पर संस्थागत प्रभुत्व नहीं था.

BBC पर 30 मई 2023 को ब्रिटिश साइंस जर्नलिस्ट एंजैला सैनी ने लिखा, 'सदियों से लोग पुरुष प्रधान समाजों की उत्पत्ति के बारे में गलत धारणाएं रखते आए हैं.'

एंजेला सैनी 9 हजार साल पुराने कैटलहोयुक शहर के पुरातात्विक आंकड़ों का हवाला देती हुए लिखती हैं, 'कैटलहोयुक आज के तुर्की के दक्षिणी अनातोलिया में स्थित है. ये 9 हजार साल पुराना शहर था, जो सबसे बड़ा भी था. ये एक ऐसा शहर था जहां लोगों के रहन-सहन पर लोगों के लिंग का कोई खास फर्क नहीं पड़ता था.'

वह लिखती हैं कि एक समय महिला और पुरुष में कोई फर्क नहीं था और दोनों मिल-जुलकर काम करते थे. लेकिन फिर ऐसा क्या हुआ कि अचानक व्यवस्था बदल गई? 

इस बारे में एंजेला सैनी लिखती हैं, 'खेती-बाड़ी पुरुषों और महिलाओं के बीच शक्ति संतुलन में निर्णायक मोड़ साबित हो सकती है. खेती के साथ ही इंसानों ने जानवरों को पालना शुरू कर दिया था. जैसे-जैसे कुछ लोगों ने दूसरों की तुलना में ज्यादा संपत्ति कमाई, वैसे-वैसे समाज में एक अभिजात वर्ग बना. इस कारण पुरुषों में इच्छा पैदा हुई कि उनकी संपत्ति उनके बच्चों को ही मिले. इसलिए उन्होंने महिलाओं और उनकी यौन स्वतंत्रता को नियंत्रित करना शुरू कर दिया.'

Latest and Breaking News on NDTV

कैसे तय हुए मर्द और औरत के काम?

एंजेला लिखती हैं, 'जैसे-जैसे अभिजात वर्ग बढ़ा, वैसे-वैसे राज्य की रक्षा करने के लिए लोगों की जरूरत बढ़ी. युद्ध के समय जरूरत पड़ने अपनी जान देने वाले लोगों की भी जरूरत थी. ऐसे में आबादी का स्तर बनाए रखने के लिए महिलाओं से ज्यादा से ज्यादा, खासकर बेटों को जन्म देने की अपेक्षा की जाती थी, जो बड़े होकर युद्ध में भाग लेंगे.'

वह लिखती हैं, 'एक राज्य के लिए सबसे जरूरी बात यह थी कि हर कोई अपने लिंग के अनुसार काम करे. व्यक्तिगत प्रतिभा, जरूरतें या इच्छाएं मायने नहीं रखती थीं. जो पुरुष युद्ध में नहीं जाना चाहते थे, उनका मजाक उड़ाया जाता था. जो औरत बच्चे नहीं चाहती थी, उसे अपमानित किया जाता था.'

अमेरिकी इतिहासकार गेर्डा लर्नर ने पितृसत्ता पर एक किताब लिखी है, जिसका नाम है- 'द क्रिएशन ऑफ पैट्रियार्की'. कहा जाता है कि पितृसत्ता की गहराई को समझना है तो ये किताब पढ़नी चाहिए. वह लिखती हैं कि 'औरतों की अधीनता कोई प्राकृतिक या भगवान की बनाई चीज नहीं है. बल्कि इतिहास में बनाई गई है.'

वह लिखती हैं कि 'पितृसत्ता की शुरुआत 2500 साल की लंबी प्रक्रिया थी. खेती और संपत्ति आने से मर्दों को अपना वारिस चुनने के लिए औरतों की सेक्शुअलिटी पर कंट्रोल करना पड़ा. औरतों को पहले मां और फिर सेक्स ऑब्जेक्ट के रूप में देखा जाना लगा. राज्य, कानून, धर्म और परिवार ने मिलकर इस सिस्टम को पक्का कर दिया.'

हाशिए पर जाती रहीं औरतें...

गेर्डा लर्नर के मुताबिक, 'उस समय के लिखित रिकॉर्ड बताते हैं कि महिलाएं धीरे-धीरे मातृत्व और घरों के कामों तक सीमित हो गईं. बेटियां अपना घर छोड़कर शादी के बाद पति के घर चली गईं, जिसने उन्हें और हाशिए में धकेल दिया. समय के साथ शादी एक कठोर कानूनी संस्था में तब्दील हो गई, जिसमें महिलाओं को उनके पति की संपत्ति के रूप में माना जाता था. यह ठीक वैसा ही था, जैसे दासों को माना जाता था.'

जर्मन दार्शनिक फ्रेडरिक एंगेल्स 1884 में अपनी किताब 'ओरिजिन ऑफ द फैमिली, प्राइवेट प्रॉपर्टी एंड द स्टेट' में लिखते हैं, 'जब आदमी के पास संपत्ति बढ़ी तो उसने सोचा कि उसकी संपत्ति उसके बेटे को ही मिले, इसलिए उसने पुराना सिस्टम बदल दिया.'

Latest and Breaking News on NDTV

वह लिखते हैं कि मातृसत्ता में बच्चे मां के गोत्र से जाने जाते थे, लेकिन पितृसत्ता में पिता के गोत्र से उनकी पहचान होने लगी. वह लिखते हैं, 'ये दुनिया की सबसे निर्णायत क्रांतियों में से एक थी, पर इसमें एक भी आदमी को मारना नहीं पड़ा.'

इसी किताब में कार्ल मार्क्स पितृसत्ता पर तंज कसते हुए लिखते हैं, 'इंसान की जन्मजात चालाकी. चीजों के नाम बदलकर उन्हें बदल देना और परंपरा को बनाए रखते हुए भी उसे तोड़ने के रास्ते निकालना, जब अपना सीधा फायदा दिख रहा हो.'

एंजेला सैनी BBC में लिखती हैं, 'पितृसत्तात्मक व्यवस्था का मनोवैज्ञानिक नुकसान यह था कि इसने लैंगिक व्यवस्था को सामान्य बना दिया. यह धारणा बन गई कि औरतें सिर्फ देखभाल करने वालीं और बच्चों को पालने-पोसने के लिए हैं, जबकि मर्द स्वाभाविक रूप से हिंसक और युद्ध के लिए हैं.'

क्या पितृसत्ता कभी खत्म होगी?

इसका जवाब गेर्डा लर्नर अपनी किताब में देती हैं. वह लिखती हैं कि पितृसत्ता कोई प्राकृतिक या जैविक व्यवस्था नहीं है. वह लिखती हैं कि इसकी एक शुरुआत थी, इसलिए इसका अंत भी हो सकता है.

गेर्डा लर्रन लिखती हैं, 'जब तक पुरुष और महिलाएं पितृसत्तात्मक व्यवस्था और औरतों की अधीनता को प्राकृतिक मानते रहेंगे, तब तक ऐसे समाज की कल्पना करना नामुमकिन है, जहां वर्चस्व या अधीनता न हो. इसलिए सबसे पहले इस सोच को बदलना होगा कि पितृसत्ता को बदला नहीं जा सकता.'

उनका मानना है कि महिलाओं को उनके संघर्षों और उपलब्धियों के इतिहास से वंचित रखना ही उन्हें अधीन रखने का एक जरिया रहा है. पितृसत्ता को खत्म करने के लिए औरतों को अपने इतिहास को जानना होगा.

गेर्डा लर्नर इस पर भी सवाल उठाती हैं कि सिर्फ कानूनी सुधार या औरतों की स्थिति में छोटे-मोटे बदलाव पितृसत्ता को नहीं बदल सकते. ऐसे सुधार औरतों को थोड़ी राहत तो दे सकते हैं, लेकिन इसे पूरी तरह खत्म नहीं कर सकते.

वह लिखती हैं कि 'जब औरत और मर्द पितृसत्तात्मक सोच और प्रथा को अपने दिमाग से खत्म कर लेंगे, तभी एक ऐसे समाज को बनाया जा सकेगा जो असल में मानवीय होगा.'