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भारतीय सेना की मारक क्षमता और बढ़ाने की तैयारी, मॉर्टार स्पेशलिस्ट व्हीकल बना देगी 'बाहुबली'

नए मॉर्टार स्पेशलिस्ट व्हीकल की सबसे बड़ी खूबी 'शूट एंड स्कूट' क्षमता होगी. यानी वाहन गोलाबारी करने के तुरंत बाद अपनी जगह बदल सकेगा.

भारतीय सेना की मारक क्षमता और बढ़ाने की तैयारी, मॉर्टार स्पेशलिस्ट व्हीकल बना देगी 'बाहुबली'
सेना ने वाहन के लिए कड़े मानक तय किए हैं. यह हाईवे पर कम से कम 80 किलोमीटर प्रति घंटे और सामान्य सड़कों पर 40 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चल सके. (सांकेतिक तस्वीर)

भारतीय सेना अपनी फायर सपोर्ट क्षमता को और आधुनिक बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठा रही है. सेना ने देश की रक्षा कंपनियों से एक नए मॉर्टार स्पेशलिस्ट व्हीकल (MSV) के लिए जानकारी मांगी है. यह वाहन पहियों पर आधारित होगा और मॉर्टार सिस्टम को अधिक सटीक, तेज और प्रभावी बनाने में मदद करेगा. इसका मकसद युद्धक्षेत्र में सैनिकों की गतिशीलता बढ़ाने के साथ-साथ निशाने की सटीकता में सुधार करना है.

मॉर्टार सेना के सबसे अहम अप्रत्यक्ष हथियारों में से एक है. इसका इस्तेमाल दुश्मन के ठिकानों पर दूर से गोलाबारी करने के लिए किया जाता है.
अभी अधिकांश मॉर्टार सिस्टम मैन्युअल तरीके से संचालित होते हैं. इसमें फायरिंग के लिए आवश्यक गणनाएं सैनिकों को खुद करनी पड़ती हैं. इससे समय लगता है और गलती की संभावना भी बनी रहती है. सेना का मानना है कि नई तकनीक से लैस वाहन इन कमियों को दूर कर सकता है.

कंप्यूटर करेगा पूरी गणना

प्रस्तावित वाहन में एक बैलिस्टिक कंप्यूटर लगाया जाएगा. अग्रिम मोर्चे पर तैनात पर्यवेक्षक और फायर कंट्रोलर लक्ष्य की जानकारी वाहन तक पहुंचाएंगे. इसके बाद कंप्यूटर स्वतः ही फायरिंग के लिए जरूरी कोण और दिशा की गणना करेगा. इससे निशाने पर पहले ही गोले में सटीक वार करने की संभावना बढ़ जाएगी. सेना का कहना है कि इससे गोला-बारूद की बचत भी होगी और प्रतिक्रिया समय भी कम होगा. इससे मानवीय गलतियां भी कम होगी .

'शूट एंड स्कूट' क्षमता मिलेगी

नए वाहन की सबसे बड़ी खासियतों में से एक "शूट एंड स्कूट" क्षमता होगी. इसका मतलब है कि वाहन गोलाबारी करने के तुरंत बाद अपनी जगह बदल सकेगा. इससे दुश्मन की जवाबी कार्रवाई से बचने में मदद मिलेगी. वाहन को केवल दो सैनिक संचालित करेंगे. यह लगभग 54 मॉर्टार गोले साथ लेकर चल सकेगा.

सेना ने वाहन के लिए कड़े मानक तय किए हैं. यह हाईवे पर कम से कम 80 किलोमीटर प्रति घंटे और सामान्य सड़कों पर 40 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चल सके. एक बार ईंधन भरने पर इसकी सड़क पर परिचालन सीमा 400 किलोमीटर और दुर्गम इलाकों में 250 किलोमीटर होनी चाहिए. वाहन को 17 हजार फीट तक की ऊंचाई पर भी काम करने में सक्षम होना होगा. यह शर्त चीन सीमा से लगे हिमालयी क्षेत्रों में तैनाती को ध्यान में रखकर रखी गई है. साथ ही यह माइनस 25 डिग्री सेल्सियस से लेकर 50 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में काम कर सकेगा. यानी यह पहाड़ से लेकर रेगिस्तान तक आसानी से काम कर सकेगा.

युद्ध के बदलते स्वरूप को देखते हुए सेना ने वाहन में ड्रोन से सुरक्षा की भी मांग की है. इसके लिए वाहन पर विशेष एंटी-ड्रोन सुरक्षा ढांचा लगाया जाएगा. वाहन में छोटे हथियारों की गोलीबारी और तोपखाने के छर्रों से सुरक्षा देने वाली बैलिस्टिक सुरक्षा भी होगी. इसके अलावा इसमें सैन्य मानकों के टचस्क्रीन डिस्प्ले और आधुनिक संचार प्रणाली भी होगी.

सेना के आधुनिकीकरण का हिस्सा

यह परियोजना सेना के व्यापक आधुनिकीकरण अभियान का हिस्सा मानी जा रही है. पिछले कुछ वर्षों में सेना ने एम-777 अल्ट्रा-लाइट होवित्जर, स्वदेशी एटीएजीएस तोप और पिनाका मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर जैसे आधुनिक हथियार शामिल किए हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि स्वचालित मॉर्टार सिस्टम इसी दिशा में अगला कदम है. 

दक्षिण कोरिया, तुर्की और इज़राइल जैसे कई देश पहले से ऐसे सिस्टम का इस्तेमाल कर रहे हैं. खासतौर पर इज़राइल का कार्डोम 120 मिमी मॉर्टार सिस्टम इस क्षेत्र में एक सफल मॉडल माना जाता है. अब भारतीय सेना भी ऐसी ही स्वदेशी और आधुनिक क्षमता हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ रही है, जिससे युद्धक्षेत्र में उसकी मारक शक्ति और सटीकता दोनों बढ़ सकेंगी.

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