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मिडिल ईस्ट संकट की मार: भारत आने वाले विदेशी पर्यटकों में 20% की गिरावट, एविएशन सेक्टर को 18,000 करोड़ का नुकसान

मिडिल ईस्ट संघर्ष ने भारत पर भी बड़ा असर किया है. हवाई मार्ग बदलने और ईंधन की बढ़ती कीमतों ने एयरलाइंस की कमर तोड़ दी है.

मिडिल ईस्ट संकट की मार: भारत आने वाले विदेशी पर्यटकों में 20% की गिरावट, एविएशन सेक्टर को 18,000 करोड़ का नुकसान
  • मिडिल ईस्ट युद्ध के कारण भारत में आने वाले पर्यटकों की संख्या में पंद्रह से बीस प्रतिशत की गिरावट आई है
  • एविएशन सेक्टर को उड़ानों के रद्द होने और रूट में बदलाव के कारण लगभग 18000 करोड़ का नुकसान होने का खतरा है
  • एयरलाइंस की परिचालन लागत में ईंधन की बढ़ी हुई खपत मुनाफे पर दबाव डाल रही है और हवाई किराया भी बढ़ा है
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मिडिल ईस्ट युद्ध का असर पूरी दुनिया पर पड़ा है. भारत भी इससे अछूता नहीं रहा. जब से संकट शुरू हुआ है, भारत में आने वाले पर्यटकों की संख्या में 15-20 प्रतिशत की गिरावट आई है. वहीं इस संघर्ष के कारण पैदा हुई बाधाओं के चलते एविएशन इंडस्ट्री को करीब तौर पर 18,000 करोड़ का शुद्ध घाटा होने का खतरा मंडरा रहा है.

एविएशन सेक्टर पर सबसे ज्यादा असर

'पश्चिम एशिया संघर्ष का भारत के टूरिज़्म, एविएशन और हॉस्पिटैलिटी सेक्टर पर असर' शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में बताया गया है कि एविएशन सेक्टर पर सबसे ज्यादा असर पड़ा है. एयरलाइंस को उड़ानों के रद्द होने, हवाई क्षेत्र में पाबंदियों और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के रूट में बड़े बदलावों जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. इन बाधाओं के कारण मुख्य रूटों पर उड़ान का समय 2-4 घंटे बढ़ गया है, जिसके परिणामस्वरूप ईंधन की खपत और परिचालन लागत में भारी बढ़ोतरी हुई है.

इंडस्ट्री के अनुमानों के मुताबिक, एयरलाइन की परिचालन लागत में ईंधन का हिस्सा 35-40 प्रतिशत होता है और मौजूदा हालात ने एयरलाइंस के मुनाफे पर और भी ज्यादा दबाव डाल दिया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि मिडिल ईस्ट के हवाई रूट्स में आई बाधाओं के की वजह से कनेक्टिविटी की दक्षता कम हुई है और हवाई किराया भी बढ़ गया है.

18,000 करोड़ रुपये का घाटा

PHDCCI ने बताया कि रेटिंग एजेंसी Icra ने इंडस्ट्री पर पड़े कुल असर का आकलन किया है. इसमें अनुमानित 18,000 करोड़ रुपये के शुद्ध घाटे को भी शामिल किया गया है. रिपोर्ट के अनुसार, भारत में आने वाले पर्यटकों की संख्या में 15-20 प्रतिशत की गिरावट आई है, खासकर घूमने-फिरने के मकसद से आने वाले पर्यटकों की संख्या में. ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि युद्ध की वजह से दुनिया भर के यात्री अब ज्यादा सावधानी बरत रहे हैं.

रेस्टोरेंट और फूड सर्विस सेक्टर पर भी इस स्थिति का मिला-जुला असर देखने को मिल रहा है. नेशनल रेस्टोरेंट एसोसिएशन ऑफ इंडिया (NRAI) से मिली जानकारियों और इंडस्ट्री के अनुमानों के अनुसार, इस सेक्टर को इनपुट लागत में 10-15 प्रतिशत की बढ़ोतरी का सामना करना पड़ रहा है. इसकी मुख्य वजह आयातित सामग्री, लॉजिस्टिक्स और ऊर्जा की कीमतों में हुई बढ़ोतरी है. 

NRAI के प्रेसिडेंट सागर दरयानी ने कहा कि इस रुकावट का असर अब पूरे देश के लिए एक ऑपरेशनल चुनौती बन गया है. दरयानी ने कहा, 'LPG सप्लाई में चल रही रुकावट ने रेस्टोरेंट इंडस्ट्री के लिए एक गंभीर ऑपरेशनल संकट खड़ा कर दिया है. लगभग 10 प्रतिशत रेस्टोरेंट अस्थायी तौर पर बंद हो गए हैं, जबकि 60-70 प्रतिशत जगहों ने सीमित सप्लाई को मैनेज करने के लिए इंडक्शन कुकिंग, दूसरे फ्यूल, कम मेन्यू या काम करने के घंटे कम करने जैसे तरीके अपनाए हैं.'

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फूड सर्विसेज मार्केट को बड़ा नुकसान

इंडस्ट्री के अनुमानों का हवाला देते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय फूड सर्विसेज मार्केट, जिसकी कीमत 2024 में 5.69 लाख करोड़ रुपये थी और जिसके 2028 तक 7.76 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है, 2026 में लगभग 6.46 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने की उम्मीद है. इसका मतलब है कि इस सेक्टर में रोजाना लगभग 17,700 करोड़ रुपये की आर्थिक गतिविधि होती है. काम में 15-20 प्रतिशत की कमी का मतलब है कि रोजाना की आर्थिक गतिविधि में लगभग 2,650 करोड़ रुपये की कमी, या हर महीने लगभग 79,000 करोड़ रुपये का नुकसान. यह फूड सर्विसेज़ इकोसिस्टम के लिए एक बड़ा आर्थिक झटका है.

ऑपरेशनल और आर्थिक चुनौतियों के अलावा, यह रुकावट इस सेक्टर में रोजगार की स्थिरता को लेकर भी चिंताएं पैदा करती है. रेस्टोरेंट इंडस्ट्री सीधे तौर पर 85 लाख से ज़्यादा लोगों को रोज़गार देती है, जिससे यह भारत की सर्विस इकॉनमी में सबसे ज़्यादा रोजगार पैदा करने वाले सेक्टरों में से एक बन गई है. रिपोर्ट में आगे कहा गया है, 'इसलिए, सप्लाई में लंबे समय तक रुकावट रहने से 5-7 लाख संभावित नौकरियां जा सकती हैं. इसके साथ ही, नई भर्तियां रुक सकती हैं और विस्तार की योजनाएं भी टल सकती हैं. इसका सबसे ज़्यादा असर SME ऑपरेटरों पर पड़ेगा, जो लागत और सप्लाई में उतार-चढ़ाव के प्रति ज़्यादा संवेदनशील होते हैं.'

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