- 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 33 सीटें मिलीं जबकि सपा ने 37 सीटें जीतीं, जो भाजपा के लिए झटका था
- विधानसभा स्तर पर भाजपा को 162 सीटों पर बढ़त मिली जबकि सपा गठबंधन को 223 सीटों पर बढ़त हासिल हुई थी
- योगी आदित्यनाथ के दस वर्षों के शासन में कानून व्यवस्था और बुलडोजर कार्रवाई ने चुनावी माहौल पर प्रभाव डाला है
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव कुछ महीनों में होने वाले हैं. उससे पहले भाजपा, सपा समेत सभी दल समीकरण साधने में व्यस्त में हैं. 2014 के बाद से भाजपा की स्थिति सूबे में लगातार मजबूत हुई है, लेकिन इस पर ब्रेक 2024 में लगा. लोकसभा चुनाव में यूपी में भाजपा को 33 सीटों पर ही जीत मिल पाई, जबकि सपा को 37 सीटों पर विजय मिली थी. कांग्रेस ने 6 सीटें हासिल की थीं. यह चुनाव भाजपा के लिए झटके वाला था, जबकि 2014 और 2019 में उसने बड़ी विजय हासिल की थी. इस लिहाज से यह नतीजा भाजपा और विश्लेषकों को चौंकाने वाला था. अब यदि इसे विधानसभा वार देखें तो भाजपा के लिए यह और बड़ा झटका था.
यदि लोकसभा चुनाव के नतीजों को विधानसभा वार देखें तो भाजपा को 162 सीटों पर ही बढ़त मिल पाई थी. इस तरह वह विधानसभा में बहुमत के आंकड़े 202 से 40 सीटें पीछे रह गई थी. वहीं 2017 में 54 सीटें ही जीतने वाले सपा गठबंधन को को 2024 में 223 सीटों पर बढ़त हासिल हुई थी. इस तरह उसने बड़ी बढ़त पाई है, जिसे बनाए रखना उसके लिए भी एक चुनौती है. फिलहाल दिल्ली में बीते कुछ महीनों से नीट पेपर लीक से लेकर चुनाव आयोग तक के खिलाफ आंदोलन चले हैं. दिल्ली में इन प्रदर्शनों का यूपी तक क्या असर होगा, यह भी मायने रखता है. यही नहीं उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ अपने आप में एक फैक्टर हैं.
यूपी चुनाव में उनके नाम पर भी वोट पड़ेगा. उनके 10 सालों के शासन में कैसे बुलडोजर एक्शन हुआ और कानून व्यवस्था में बदलाव आया, यह अहम है. ऐसे में देखना होगा कि योगी फैक्टर कितना प्रभावी रहता है. लोकसभा चुनाव भाजपा की केंद्र सरकार के लिए जनादेश था. इसके अलावा तब संविधान में छेड़छाड़ और आरक्षण जैसे मुद्दे विपक्ष उठाकर वोट हासिल करने में सफल हुआ था. अब हालात दूसरे हैं और सामने योगी का चेहरा है. यह चुनाव भाजपा की आंतरिक राजनीति के लिहाज से भी अहम होगा. ऐसा इसलिए क्योंकि योगी यदि लगातार तीसरी बार जीते तो उनका कद काफी बढ़ जाएगा.
इसके अलावा सपा के अखिलेश यादव के लिए तो यह अस्तित्व वाला चुनाव है. बीते 10 सालों से सपा सत्ता से बाहर है, लेकिन अब उसे अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखने के लिए जीत हासिल करनी ही होगी. यही वजह है कि यूपी का यह चुनाव सपा और भाजपा दोनों के लिए करो या मरो वाली स्थिति का है. खैर, 2024 के बाद से अब तक चीजें काफी बदलती भी दिखी हैं. भाजपा फिर से बूथ-बूथ घूमकर संगठन मजबूत कर रही है. वहीं सपा की कोशिश है कि पीडीए के भरोसे फिर से 2024 वाले चुनाव को दोहरा दिया जाए.
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