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स्‍टुपिड और यूजलेस कहने पर पति नहीं होगा गिरफ्तार, पत्‍नी की आत्‍महत्‍या केस में सुप्रीम कोर्ट आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पत्नी को 'स्टुपिड' (बेवकूफ) और 'यूजलेस' (बेकार) कहना अपने आप में न तो आपराधिक धमकी का अपराध है और न ही इसे कानूनी रूप से क्रूरता का पर्याप्त आधार माना जा सकता है.

स्‍टुपिड और यूजलेस कहने पर पति नहीं होगा गिरफ्तार, पत्‍नी की आत्‍महत्‍या केस में सुप्रीम कोर्ट आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि पत्नी को 'बेवकूफ' या 'निक्कमी' कहना क्रूरता या आपराधिक धमकी नहीं
  • सुप्रीम कोर्ट ने कनाडा में पत्नी की आत्महत्या मामले में पति और परिवार के खिलाफ दर्ज आपराधिक केस रद्द किया
  • पत्नी को बेवकूफ और बेकार कहना आपराधिक क्रूरता या धमकी का अपराध नहीं माना जाएगा
  • पति के गुस्सैल स्वभाव और छोटी बातों पर डांटने को आपराधिक अपराध नहीं माना जा सकता

पति-पत्नी के बीच होने वाले झगड़े, कड़वी बातें और आपसी मतभेद कब आपराधिक मामले का रूप ले सकते हैं? इस सवाल पर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है. सुप्रीम कोर्ट ने कनाडा के टोरंटो में पत्नी की आत्महत्या से जुड़े मामले में पति और उसके परिवार को बड़ी राहत देते हुए उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक केस रद्द कर दिया. अदालत ने साफ कहा कि पत्नी को 'स्टुपिड' (बेवकूफ) और 'यूजलेस' (बेकार) कहना अपने आप में आपराधिक क्रूरता या धमकी का अपराध नहीं बन जाता. पति का गुस्सैल स्वभाव या छोटी-छोटी बातों पर पत्नी को डांटने पर उसे आपराधी नहीं माना जा सकता है. 

जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने कहा कि वैवाहिक रिश्तों में स्वभाव संबंधी मतभेदों को आपराधिक धमकी के बराबर नहीं माना जा सकता. किसी व्यक्ति को उसकी पत्नी की आत्महत्या के लिए जिम्मेदार ठहराने से पहले यह साबित करना जरूरी है कि उसके किसी ठोस कदम या व्यवहार ने महिला को इस हद तक प्रताड़ित किया कि उसने आत्महत्या जैसा कदम उठाया.

पत्‍नी ने 22वीं मंजिल से कूदकर दी थी जान

शादी के करीब एक साल बाद फरवरी 2022 में पति-पत्‍नी कनाडा के टोरंटो चले गए थे. वहां वे एक अपार्टमेंट में साथ रह रहे थे. 11 जून 2023 को पत्नी ने अपने अपार्टमेंट की 22वीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली. घटना के बाद पुलिस को दंपति के अपार्टमेंट से महिला का हाथ से लिखा सुसाइड नोट मिला. इस नोट में महिला ने अपनी जिंदगी में असफल महसूस करने की बात कही थी. उसने लिखा था कि एक साल से ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद उसे नौकरी नहीं मिल पाई थी और इस वजह से वह खुद को असफल मान रही थी.

पिता ने लगाई थी दहेज हत्या और प्रताड़ना की धाराएं

महिला की मौत के बाद उसके पिता ने पति और ससुराल वालों के खिलाफ गंभीर आरोप लगाते हुए एफआईआर दर्ज कराई. शिकायत में दहेज की मांग, मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना, मारपीट तथा अपमानित करने जैसे आरोप लगाए गए थे. महिला के पिता ने 30 जून 2023 को औरंगाबाद के सातारा पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई थी. पुलिस ने पति और उसके परिवार के खिलाफ IPC की धारा 304B (दहेज मृत्यु), 323 (जानबूझकर चोट पहुंचाना), 498A (महिला के साथ क्रूरता) और 504 (जानबूझकर अपमान करना) के तहत मामला दर्ज किया था. इसके अलावा दहेज निषेध अधिनियम की धाराएं 3 और 4 भी लगाई गई थीं.

मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो अदालत ने शिकायत में लगाए गए आरोपों और मौजूद सबूतों की जांच की. पीठ ने पाया कि पति और उसके परिवार पर लगाए गए मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना के आरोपों की पर्याप्त पुष्टि नहीं होती. दहेज की मांग से संबंधित कोई ऐसा ठोस सबूत भी पेश नहीं किया गया, जिससे आरोपों को साबित किया जा सके.

सुप्रीम कोर्ट ने पूछा- दहेज मांगने का सबूत कहां है?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि IPC की धारा 304B के तहत दहेज मृत्यु का मामला तभी बनता है, जब यह साबित हो कि महिला की मौत से ठीक पहले उसे दहेज की मांग को लेकर पति या उसके रिश्तेदारों की ओर से प्रताड़ित किया गया था. अदालत के मुताबिक, इस मामले में महिला पक्ष ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं दे सका, जिससे यह साबित हो कि पति ने दहेज की अवैध मांग की थी और उस मांग का महिला की आत्महत्या से कोई उचित संबंध था. ऐसे में दहेज मृत्यु का अपराध नहीं बनता.

'गुस्सैल स्वभाव ,अपराध नहीं'

अदालत की सबसे अहम टिप्पणी पति द्वारा पत्नी को 'स्टुपिड' और 'यूजलेस' कहने के आरोप पर आई. पीठ ने कहा कि यदि इस आरोप को पहली नजर में सही भी मान लिया जाए, तब भी इसे आपराधिक क्रूरता या आपराधिक धमकी का अपराध नहीं माना जा सकता. अदालत ने कहा कि यह अधिक से अधिक पति के स्वभाव को दर्शाता है. लेकिन केवल इस आधार पर उसके व्यवहार को इतना गंभीर आपराधिक कृत्य नहीं बनाया जा सकता कि पत्नी की आत्महत्या का जिम्मेदार उसे ठहरा दिया जाए. पति का छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करना या पत्नी को डांटना अपने आप में आपराधिक धमकी या गंभीर चोट पहुंचाने का अपराध नहीं है. इसके लिए ठोस सबूत जरूरी हैं.

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बेटी खोने का दर्द समझते हैं, लेकिन...

सुप्रीम कोर्ट ने महिला के परिवार की पीड़ा को भी महसूस किया. अदालत ने कहा कि माता-पिता के लिए अपनी बेटी को खोने से बड़ा दुख कुछ नहीं हो सकता. अदालत परिवार के दर्द और त्रासदी को समझती है, लेकिन केवल इस दुख के आधार पर पति और ससुराल वालों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. अदालत ने कहा कि यह दिखाना जरूरी है कि आरोपी ने ऐसा कौन-सा काम किया या चूक की, जिसने महिला को आत्महत्या के लिए मजबूर किया. पीठ ने वैवाहिक विवादों से जुड़े मामलों में अदालतों को बेहद सतर्क रहने की सलाह दी. उसने कहा कि सामान्य और अस्पष्ट आरोपों के आधार पर किसी को आपराधिक मुकदमे में फंसाए रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग हो सकता है.

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