उत्तर प्रदेश में हिमालय की तलहटी में बसे सहारनपुर के एक गांव की एक लड़की आजकल खेती में झंडे गाड़ रही है. इस लड़की ने जैविक (ऑर्गेनिक) खेती को अपने जीवन की राह बनाया है. सहारनपुर के दूर-दराज के गांव कोठड़ी बहलोलपुर में रहकर यह लड़की खेती और बागवानी के साथ-साथ पशुपालन भी कर रही है. इसके साथ ही वह अपनी फसल, फल और दूसरे उत्पादों की मार्केटिंग भी कर रही है. इस काम के लिए उन्हें कई पुरस्कार भी मिल चुके हैं. हम बात कर रहे हैं शुभावरी चौहान की.
बुधवार को भारतीय किसान संघ ने उनके काम के लिए उन्हें सम्मानित किया. इसी सिलसिले में उनसे हमारी मुलाकात हुई. उन्होंने हमें अब तक की अपनी यात्रा के बारे में विस्तार से बताया.
कबसे जैविक खेती कर रही हैं शुभावरी चौहान
शुभावरी ने बताया कि वह अपने पिता संजय चौहान के साथ मिलकर 2015 से जैविक खेती कर रही हैं. उनके पास करीब 250 बीघे खेत हैं. इसमें वह जैविक खेती करती हैं, बागवानी करती हैं, पशुपालन करती हैं और बीजों के संरक्षण का काम करती हैं. वह बताती हैं कि जैविक खेती की शुरुआत में पैदावार बहुत कम होती थी. उससे घर का खर्च चलाना भी मुश्किल होता था. गांव वाले उन्हें पागल कहते थे. इसके बावजूद बाप-बेटी की इस जोड़ी ने हार नहीं मानी.
शुभावरी के पिता ने कृषि विज्ञान में एमएससी और मां ममता चौहान ने संस्कृत में एमए तक की पढ़ाई की है. वह बताती हैं कि पहले हम एक फसल की कमाई को दूसरी फसल में लगा देते थे और दूसरी फसल की कमाई को तीसरी फसल में. इस तरह यह चक्र चलता रहता था. लेकिन इससे किसान के हिस्से में कुछ नहीं आता था.
शुभावरी बताती हैं कि जब वह 11वीं में पढ़ रही थीं तो इस बात ने उन्हें बहुत परेशान किया. उन्हें समझ में आया कि किसान तब तक किसान बना रहेगा, जब तक वह अपनी फसलों को मंडी में ले जाकर बेचता रहेगा. मुझे लगा कि जब तक किसान अपनी फसल में वैल्यू एडिशन कर उसे प्रोडक्ट बनाकर मार्केट में नहीं बेचेगा, तब तक उसे फायदा नहीं होगा. जब तक वह गेहूं का आटा या दलिया बनाकर और सरसों का तेल निकालकर नहीं बेचेगा, तब तक वह घाटे में ही रहेगा. इस विचार ने शुभावरी को प्रेरित किया.
शुभावरी और उनके पिता 2015 तक अपने घर पर जैविक तरीके से सब्जियां उगाते थे. कुछ लोग उनके यहां आते थे और जब वे उनके घर का खाना खाते थे तो उन्हें उसका स्वाद बिल्कुल अलग लगता था. उन्होंने पूछा कि आपकी सब्जियों का स्वाद अलग क्यों है? हमने उन्हें बताया कि हम ऑर्गेनिक तरीके से सब्जियां उगाते हैं. इस पर लोगों ने कहा कि आप हमारे लिए भी सब्जियां उगाइए, हम आपसे सब्जियां लेंगे. इस तरह शुभावरी और उनके पिता ने ऑर्गेनिक खेती की शुरुआत की.

अपनी गौशाल में अपनी गायों के साथ शुभावरी चौहान. देसी नस्ल की इन गायों के दूध से वो घी निकालकर बेचती हैं.
Photo Credit: shubhavari chauhan
जैविक खेती शुरू की तो लोगों ने बनाया मजाक
जैविक खेती की शुरुआत के सवाल पर वह कहती हैं कि पहले तो लोग हमारा मजाक बनाते थे, लेकिन अब हमारी सफलता देखकर लोग हमारी तारीफ करते हैं. सबसे पहले उन्होंने गन्ने की खेती शुरू की. आज वह 18 एकड़ में गन्ने की खेती करती हैं. लेकिन गन्ने को मिलों में भेजने की जगह घर पर ही कोल्हू से उसका रस निकालकर उससे गुड़ और शक्कर बनाया जाता है. वह घर पर तैयार गुड़ और शक्कर को ऑनलाइन बेचती हैं.
शुभावरी और उनका परिवार गौशाला और बागवानी करने के अलावा गेहूं, धान, सब्जियों के साथ-साथ श्रीअन्न (मोटे अनाज) की भी खेती करता है. वह कहती हैं कि हम पूरा फसल चक्र अपनाते हैं.
शुभावरी बताती हैं कि इसके बाद उन्होंने अपने प्रोडक्ट बाजार में उतारे. आज उनके मुख्य प्रोडक्ट गुड़, शक्कर और घी हैं. वह बताती हैं कि अभी उनकी उम्र 21 साल है और वह ‘शुभावरी ऑर्गेनिक प्राइवेट लिमिटेड' नाम से अपनी खुद की कंपनी चला रही हैं. उनका कहना है कि यह सब सुनने में बहुत अच्छा लगता है, लेकिन यहां तक का सफर आसान नहीं था.
इस सफर में आई मुश्किलों के सवाल पर वह कहती हैं कि पहली दिक्कत फसल की पैदावार को लेकर थी. शुरू में यह काफी कम होती थी. दूसरी दिक्कत अपने प्रोडक्ट के लिए बाजार ढूंढने की थी. हमारा उत्पादन भले कम था, लेकिन उसकी गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं किया. हमारी कोशिश थी कि कम उत्पादन के बावजूद हमें मुनाफा कमाना है और अपना सामान सस्ता नहीं बेचना है.
18 साल की उम्र में पहली बार लगाई थी दुकान
शुभावरी बताती हैं कि जब उनकी उम्र 18 साल थी, तब उन्होंने सहारनपुर के कंपनी गार्डन में लगने वाले ट्रेड फेयर में अपना पहला स्टॉल लगाया. वह बताती हैं कि जब मीडिया को पता चला कि 18 साल की एक लड़की खेती कर रही है तो कुछ लोग उनका इंटरव्यू करने आए. इनमें से एक वीडियो देखते ही देखते वायरल हो गया. इसके बाद उनके पास जगह-जगह से फोन आने लगे. फोन करने वालों में मार्केटिंग कंपनियां भी थीं.
इसी में से एक कंपनी के साथ उन्होंने करार किया. वह कंपनी उन्हें देसी बीज उपलब्ध कराती है और बदले में वह कंपनी को अपनी फसल देती हैं. कंपनी उनके खेतों में उगी सब्जियों को दिल्ली में डोर-टू-डोर सप्लाई करती है. वह बताती हैं कि इस प्रक्रिया में अपनी फसल की कीमत वह खुद तय करती हैं.

शुभावरी चौहान और उनका परिवार बागवानी भी करता है. इस साल उनके आम की अंतिम खेप चार सौ रुपये किलो के भाव से बिकी है.
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शुभावरी के मुताबिक, इस समय उनके पास 21 किस्म के टमाटर, आठ तरह की गोभी और तीन-चार तरह की मूली और शलजम के बीज हैं. इन सब्जियों की खेती वह जैविक तरीके से करती हैं. कंपनी उनके उत्पादों की ऑनलाइन मार्केटिंग भी करती है.
शुभावरी बताती हैं कि 24 सितंबर को उनके आम की अंतिम खेप गई थी, जिसकी कीमत 400 रुपये प्रति किलो थी. वह बताती हैं कि उनकी गौशाला में साहिवाल, थारपारकर, गिर और रेड सिंधी नस्ल के 36 गोवंश हैं. इसके जरिए वह देसी घी का उत्पादन करती हैं और उसे ऑनलाइन बेचती हैं.
जलवायु और जमीन का कमाल
वह बताती हैं कि उनके खेत में पैदा हुई स्ट्रॉबेरी दूसरे खेतों की स्ट्रॉबेरी की तुलना में अधिक मीठी होती है. इसकी वजह वह हिमालय की तलहटी में बसे अपने इलाके की जलवायु और वहां की जमीन को बताती हैं.
शुभावरी बताती हैं कि वह इन सब्जियों के बीज और पौध अपने और आसपास के गांवों के लोगों को मुफ्त में उपलब्ध कराती हैं, जिससे दूसरे लोग भी जैविक खेती की दिशा में आगे बढ़ें.
शुभावरी बताती हैं कि पिछले साल उन्होंने करीब 80 लाख रुपये का कारोबार किया था. इससे उन्हें करीब 50 लाख रुपये का मुनाफा हुआ था. शुभावरी ने अपने इस मुनाफे को केवल बैंक में नहीं रखा, बल्कि उसका इस्तेमाल समाज की सेवा के लिए भी किया.

शुभावरी चौहान बताती हैं कि उनके खेती में जैविक तरीके से पैदा की गई स्ट्राबेरी दूसरी स्ट्राबेरी की तुलना में बहुत अधिक मिठी होती है.
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उन्होंने बताया कि उनके गांव में 350 घर हैं. पूरे गांव में पीने का साफ पानी पहुंचाने के लिए उन्होंने पाइपलाइन डलवाई है और पूरे गांव में पानी की सप्लाई करती हैं. वह बताती हैं कि शादी-ब्याह के मौके पर वह लोगों के घर मुफ्त में पानी के टैंकर भी पहुंचाती हैं. इस काम के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था.
शुभावरी का दिन सुबह चार बजे शुरू हो जाता है. सबसे पहले वह अपनी गौशाला में पशुओं की देखभाल करती हैं. इसके बाद घर के काम भी निपटाती हैं और फिर खेतों का रुख करती हैं. यह सिलसिला देर रात तक चलता है.
खेती-बाड़ी करने वाली लड़की कैनवास पर ब्रश भी चलाती है
कृषि की पढ़ाई करने वाले पिता और संस्कृत की पढ़ाई करने वाली मां की बेटी ने पढ़ाई के लिए पेंटिंग को चुना है. कृषि और पेंटिंग रचनात्मकता के दो छोर हैं. इतनी व्यस्त दिनचर्या के बीच पढ़ाई के लिए कैसे समय निकाल लेती हैं शुभावरी? इस सवाल के जवाब में वह कहती हैं कि भले ही कितना भी व्यस्त रहूं, दिन में 10 मिनट के लिए ही सही, ब्रश जरूर उठाती हूं और पेंटिंग जरूर करती हूं.
वह बताती हैं कि खेती-किसानी की ओर उनका रुझान अपने दादाजी को देखकर बढ़ा. वह जब दो-तीन साल की थीं, तब से अपने दादा के साथ खेतों में जाती रही हैं. यह सिलसिला आज भी जारी है.
वह बताती हैं कि बचपन में स्कूल में जब दोस्तों को पढ़ने-लिखने पर पुरस्कार मिलता था तो लगता था कि कभी मुझे भी ऐसा पुरस्कार मिल पाएगा या नहीं. लेकिन आज खेती-बाड़ी के इन्हीं कामों की बदौलत उन्हें 100 से अधिक पुरस्कार मिल चुके हैं. उन्होंने बताया कि उनका कमरा इन ट्रॉफियों और पुरस्कारों से भरा पड़ा है. वह बताती हैं कि इन पुरस्कारों से सबसे ज्यादा खुश उनके दादाजी होते हैं.

शुभावरी चौहान ने अपने जैविक खेती के अभियान की शुरुआत गन्ने की खेती से की थी. वो अपने क्रेशर में गन्ने का जूस निकालकर उससे गुड़ और शक्कर बनाती हैं.
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वह बताती हैं कि जब वह सातवीं क्लास में थीं तो उन्होंने अपने ममेरे भाई की बुलेट चलाई थी. उसके बाद पापा से बोला कि मुझे बुलेट चाहिए. इस पर उनके पिता ने उनसे कहा कि खुद कमाओ और खुद खरीदो.
शुभावरी बताती हैं कि यह बात उनके मन में घर कर गई और उन्होंने तय किया कि उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होना है. उन्होंने बताया कि उन्होंने अब अपनी बुलेट भी खरीद ली है और टाटा नेक्सॉन ईवी कार भी. कार खरीदने में भी शुभावरी ने पर्यावरण का ख्याल रखते हुए इलेक्ट्रिक वर्जन ही खरीदा.
इसी उद्देश्य से उन्होंने अपने गांव की मुख्य सड़क पर नीम और कनेर के 300 पौधे भी लगवाए हैं.वह बताती हैं कि ऑर्गेनिक खेती की ओर लोगों का रुझान बढ़ाने के लिए सरकार ने उन्हें 15 गांव आवंटित किए हैं. उनके प्रयास से इनमें से हर गांव में कम से कम 100 लोग उनसे जुड़ चुके हैं.
शुभावरी ने देश के किसानों से अपील की कि वे अपने खेतों में रासायनिक खाद डालना बंद करें. उनका कहना था कि रसायनों के इस तरह अंधाधुंध इस्तेमाल से हमारा भविष्य तबाह हो जाएगा.
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