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पंजाब BJP अध्यक्ष पद के लिए कांग्रेस से आए केवल सिंह ढिल्लों कैसे बने सबकी पसंद?

केवल सिंह ढिल्लों बरनाला से दो बार विधायक रह चुके हैं. वह 2007 और 2012 में कांग्रेस के टिकट पर विधायक निर्वाचित हुए थे. हालांकि, 2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें टिकट नहीं दिया था. ढिल्लों 2022 में भाजपा में शामिल हुए और बाद में पार्टी की प्रदेश इकाई के उपाध्यक्ष नियुक्त किए गए.

पंजाब BJP अध्यक्ष पद के लिए कांग्रेस से आए केवल सिंह ढिल्लों कैसे बने सबकी पसंद?
  • भाजपा ने 2022 में कांग्रेस से आए केवल सिंह ढिल्लों को पंजाब प्रदेश भाजपा का नया अध्यक्ष नियुक्त किया है
  • ढिल्लों पंजाब में पहले जाट सिख अध्यक्ष हैं जो राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मालवा क्षेत्र से आते हैं
  • मालवा क्षेत्र पंजाब की सबसे बड़ी राजनीतिक क्षेत्र है जहां से 69 विधानसभा सीटें आती हैं
चंडीगढ़:

2022 में कांग्रेस से बीजेपी में शामिल हुए केवल सिंह ढिल्लों को पार्टी ने पंजाब प्रदेश का नया अध्यक्ष बनाया है. ढिल्लों इस पद पर नियुक्त होने वाले पहले जाट सिख हैं. वो 76 साल के सुनील जाखड़ की जगह लेंगे. जिनका तीन साल का कार्यकाल जुलाई में समाप्त हो रहा है. मुख्यमंत्री भगवंत मान की तरह, पंजाब के राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मालवा क्षेत्र में स्थित संगरूर इलाका ढिल्लों का भी गृह क्षेत्र है.

अपनी नियुक्ति के बाद ढिल्लों ने कहा, "पंजाब में सरकार बनने के बाद, हम इसे हर क्षेत्र में नंबर एक राज्य बनाएंगे. पश्चिम बंगाल के बाद, अब पंजाब में भी कमल खिलेगा."

दरअसल पंजाब में भाजपा को एक ऐसे सिख चेहरे की जरूरत थी, जो न केवल मालवा क्षेत्र से हो, बल्कि जमीनी स्तर से भी जुड़ा हो. दूसरे शब्दों में, ढिल्लों पार्टी के लिए एक "कॉम्बो पैकेज" हैं, क्योंकि वे एक साथ व्यवसायी और किसान दोनों हैं.

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भाजपा के भीतर, राज्य इकाई का नेतृत्व करने के लिए एक सिख चेहरे को नियुक्त करने की मांग हो रही थी. अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुघ ने ढिल्लों की उम्मीदवारी का जोरदार समर्थन किया, वहीं आरएसएस पंजाब के प्रभारी मंत्री श्रीनिवासलू और हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने भी कथित तौर पर इस कदम का समर्थन किया.

हालांकि दया सिंह सोढ़ी 1997 में सिख चेहरे के रूप में पार्टी अध्यक्ष रह चुके हैं, लेकिन यह पहली बार है जब पार्टी ने पंजाब का नेतृत्व किसी जाट सिख को सौंपा है.

1966 में पंजाब के पुनर्गठन के बाद से, राज्य की राजनीति पर कृषि प्रधान जाट सिख नेतृत्व का दबदबा रहा है, खासकर राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मालवा क्षेत्र में. राज्य के 13 मुख्यमंत्रियों में से केवल दो ही इस प्रभावशाली समुदाय से बाहर के रहे हैं- रामगढ़िया समुदाय के ओबीसी नेता ज्ञानी जैल सिंह (1972-1977) और दलित सिख चरणजीत सिंह चन्नी, जो केवल 111 दिनों तक पद पर रहे (2021-2022).

मालवा क्षेत्र - पटियाला और लुधियाना से लेकर बठिंडा और फिरोजपुर तक फैला हुआ है - पंजाब की 117 विधानसभा सीटों में से 69 सीटें हैं, जो इसे राज्य का सबसे बड़ा राजनीतिक रणक्षेत्र बनाती हैं. भाजपा के लिए, पंजाब की राजनीति में एक मजबूत दावेदार के रूप में उभरने के लिए मालवा में पैठ बनाना बेहद जरूरी है.

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ढिल्लों के संभावित प्रतिद्वंद्वी

पूर्व पंजाब बीजेपी प्रमुख और विधायक अश्वनी शर्मा, जिन्हें पंजाब में पार्टी का प्रमुख हिंदू चेहरा माना जाता है, इस दौड़ में सबसे आगे थे. राज्य इकाई का नेतृत्व काफी समय से हिंदू नेताओं द्वारा किया जाता रहा है. हालांकि, आगामी विधानसभा चुनावों से पहले, पार्टी सक्रिय रूप से एक जाट सिख चेहरे की तलाश में थी.

मालवा क्षेत्र के एक अन्य जाट सिख, केंद्रीय मंत्री रवनीत बिट्टू भी इस दौड़ में थे. हालांकि, सूत्रों का कहना है कि बिट्टू की लोगों से संपर्क की शैली राज्य प्रमुख की भूमिका के लिए पार्टी की संगठनात्मक जरूरतों के अनुरूप नहीं थी. इसके अलावा, चूंकि भाजपा केंद्र में सिखों की मजबूत उपस्थिति बनाए रखना चाहती है, इसलिए नेतृत्व संभवतः बिट्टू को उनके वर्तमान केंद्रीय मंत्री पद पर ही रखना चाहता है.
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पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह भी एक प्रमुख जाट सिख चेहरा हैं, लेकिन सूत्रों का कहना है कि उनकी बढ़ती उम्र के कारण वे इस समय सक्रिय संगठनात्मक भूमिका निभाने में कम सक्षम हैं.

मालवा से ताल्लुक रखने वाले एक अन्य नेता मनप्रीत सिंह बादल भी इस दौड़ में शामिल थे, हालांकि पार्टी की योजना उन्हें भविष्य में कोई और जिम्मेदारी सौंपने की है. राणा गुरमीत सिंह सोढ़ी का नाम भी विचाराधीन था, लेकिन पार्टी मुख्यमंत्री भगवंत मान के गढ़ से सीधे जुड़े सिख चेहरे को आगे बढ़ाना चाहती थी.

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गुरप्रीत सिंह छीना
Chief Sub Editor
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