- पिछले 4 वर्षों में सरकार ने पेट्रोल-डीजल के एक्साइज ड्यूटी में 4 बार कटौती कर कीमतों में स्थिरता बनाए रखी है.
- मार्च 2026 में विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क में कमी कर कीमतों पर लगभग 30 हजार करोड़ रुपये का बोझ सरकार ने उठाया
- अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती कीमतों के बावजूद भारत ने उपभोक्ताओं पर सीधे अतिरिक्त बोझ डालने से बचाव किया है.
पिछले चार वर्षों में अंतरराष्ट्रीय बजार में कच्चे तेल बाजार में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है. रूस–यूक्रेन युद्ध (फरवरी 2022) और 2026 में होर्मुज में पैदा हुए संकट के दौरान ब्रेंट क्रूड की कीमतें कई बार 120 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चली गईं. ऐसे समय में जहां अधिकांश देशों ने बढ़ी हुई कीमतों का बोझ सीधे उपभोक्ताओं पर डाला, वहीं, भारत ने अलग नीति अपनाते हुए पेट्रोल और डीजल के खुदरा दामों में कटौती और स्थिरता बनाए रखने का प्रयास किया है.
4 वर्षों में चार बार कीमतों में कटौती
भारत सरकार ने 2021 से 2026 के बीच चार बार पेट्रोल और डीजल पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क (एक्साइज ड्यूटी) में कमी की. नवंबर 2021 में पेट्रोल पर ₹5 और डीजल पर ₹10 की कटौती की गई. इसके बाद मई 2022 में पेट्रोल ₹8 और डीजल ₹6 सस्ता हुआ. मार्च 2024 और अप्रैल 2025 में भी कीमतें घटाई गईं. सबसे बड़ी राहत 27 मार्च 2026 को दी गई, जब विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क (SAED) में ₹10 प्रति लीटर की कटौती की गई और डीजल पर एक्साइज लगभग शून्य कर दिया गया. हालांकि, 15 मई 2026 को लगभग चार वर्षों बाद पहली बार मामूली वृद्धि देखने को मिली, जब दोनों ईंधनों की कीमत में ₹0.91 प्रति लीटर का इजाफा हुआ.
तेल बांड बनाम मौजूदा नीति
सरकार का कहना है कि आज की कीमतों की तुलना 2014 से करना भ्रामक हो सकता है. उस समय की कम कीमतें वास्तव में तेल बांड के जरिए भविष्य पर डाली गई वित्तीय जिम्मेदारी का परिणाम थीं. 2005 से 2010 के बीच जारी किए गए करीब ₹1.34 लाख करोड़ के तेल बांड का भुगतान वर्तमान सरकार को करना पड़ा.
इसके विपरीत, मौजूदा सरकार ने मूल्य वृद्धि के समय सीधे टैक्स कम करके उपभोक्ताओं को राहत दी. इस प्रक्रिया में कोई बांड जारी नहीं किया गया, बल्कि राजस्व का नुकसान सरकार ने स्वयं वहन किया. सिर्फ मार्च 2026 की टैक्स कटौती से ही लगभग ₹30,000 करोड़ का बोझ सरकार ने उठाया.
सरकार और तेल कंपनियों का वित्तीय बोझ
ऊंचे कच्चे तेल के दामों के दौरान सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों ने भारी आर्थिक दबाव झेला. होर्मुज संकट के दौरान पेट्रोल पर करीब ₹24 प्रति लीटर और डीजल पर ₹30 प्रति लीटर तक का अंतर सरकार ने अप्रत्यक्ष रूप से वहन किया. 2021 से 2024 के बीच तेल कंपनियों ने लगभग ₹24,500 करोड़ का नुकसान सहा, जबकि एलपीजी उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए 2024-25 में करीब ₹40,000 करोड़ का बोझ उठाया गया.
अंतरराष्ट्रीय तुलना में भारत की स्थिति
फरवरी से मई 2026 के बीच, जब वैश्विक स्तर पर ईंधन कीमतों में भारी वृद्धि हुई, भारत में कीमतें लगभग स्थिर रहीं. जहां म्यांमार, मलेशिया, पाकिस्तान और अमेरिका जैसे देशों में पेट्रोल-डीजल के दाम 40% से 100% तक बढ़े, वहीं भारत में बढ़ोतरी लगभग 4% के आसपास सीमित रही. यह अंतर दर्शाता है कि भारत ने अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद उपभोक्ताओं पर सीधे बोझ डालने से बचने की कोशिश की.
राज्यों में वैट से कीमतों में अंतर
देश के अलग-अलग राज्यों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में अंतर का मुख्य कारण राज्य सरकारों द्वारा लगाया गया वैट (VAT) है. केंद्र सरकार का एक्साइज टैक्स पूरे देश में समान होता है, लेकिन राज्य अपने-अपने हिसाब से कर लगाते हैं. कुछ राज्यों में वैट 30% से अधिक है, जिससे कीमतें काफी बढ़ जाती हैं. उदाहरण के लिए आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और केरल जैसे राज्यों में पेट्रोल ₹107 प्रति लीटर से ऊपर है. वहीं, गुजरात, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, गोवा और असम जैसे राज्यों में कीमतें अपेक्षाकृत कम (₹97 या उससे नीचे) हैं, क्योंकि वहां वैट दर कम है.
सरकार का दावा है कि उसने उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए बहुस्तरीय रणनीति अपनाई है—
- एक्साइज ड्यूटी में कटौती
- तेल कंपनियों द्वारा नुकसान वहन
- निर्यात शुल्क लगाकर घरेलू आपूर्ति बनाए रखना
- पुराने तेल बांड का भुगतान
- इन कदमों के माध्यम से सरकार ने कीमतों को नियंत्रित रखने की कोशिश की, जिससे आम जनता पर महंगाई का असर कम हो सके
रूस–यूक्रेन युद्ध और होर्मुज संकट जैसे वैश्विक घटनाक्रमों के बावजूद भारत ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों को अपेक्षाकृत स्थिर बनाए रखा. जहां अन्य देशों में तेजी से कीमतें बढ़ीं, वहीं भारत में सीमित वृद्धि देखने को मिली. हालांकि, अलग-अलग राज्यों में कर नीति के कारण कीमतों में बड़ा अंतर बना हुआ है. कुल मिलाकर, ईंधन मूल्य निर्धारण में केंद्र और राज्य दोनों की नीतियों की महत्वपूर्ण भूमिका है और इसका सीधा प्रभाव उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ता है.
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