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पंजाब चुनाव से पहले राम रहीम को फिर फरलो, बंदी सिखों की रिहाई की मांग के बीच समझिए इसके सियासी मायने

डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम को 21 दिन की फरलो मिलने के बाद पंजाब में राजनीतिक बहस तेज हो गई है. एक ओर डेरा के चुनावी प्रभाव पर चर्चा हो रही है, वहीं दूसरी ओर बंदी सिखों के साथ कथित अलग व्यवहार को लेकर नए सवाल उठ रहे हैं.

पंजाब चुनाव से पहले राम रहीम को फिर फरलो, बंदी सिखों की रिहाई की मांग के बीच समझिए इसके सियासी मायने
राम रहीम को फिर मिली 21 दिन की फरलो
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डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह एक बार फिर रोहतक की सुनारिया जेल से बाहर आए हैं. इस बार उन्हें 21 दिन की फरलो मिली है. उनकी इस रिहाई ने पंजाब में डेरा सच्चा सौदा के असर, चुनावी प्रभाव और सबसे अहम बात राम रहीम और सालों से जेल में बंद सिख कैदियों के साथ अलग-अलग बर्ताव को लेकर राजनीतिक बहस फिर से छेड़ दी है.

राम रहीम की फरलो की चर्चा क्यों?

राम रहीम की यह फरलो राजनीतिक रूप से इसलिए अहम है क्योंकि पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनावों की तैयारी शुरू हो चुकी है. हालांकि, इस बात का कोई आधिकारिक संकेत नहीं है कि यह फरलो चुनावी वजहों से दी गई है, लेकिन इसके समय को लेकर राजनीतिक सवाल उठना तय है, खासकर इसलिए क्योंकि उनकी पिछली अस्थायी रिहाई भी अहम राजनीतिक मौकों पर ही हुई थी.

राम रहीम को रेप के दो मामलों में दोषी ठहराया गया है और डेरा के पूर्व मैनेजर रंजीत सिंह की हत्या के मामले में वह उम्रकैद की सजा काट रहे हैं. जेल में होने के बावजूद, उन्हें बार-बार पैरोल और फरलो दी गई है, जिससे उन्हें जेल के बाहर काफी समय बिताने का मौका मिला है. उनकी बार-बार होने वाली रिहाई पंजाब और हरियाणा में एक संवेदनशील राजनीतिक मुद्दा बन गई है.

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पंजाब में डेरा सच्चा सौदा का बड़ा नेटवर्क

डेरा सच्चा सौदा का पंजाब में, खासकर मालवा इलाके में, समर्थकों का एक बड़ा नेटवर्क है. ऐतिहासिक रूप से इस डेरे को कई विधानसभा क्षेत्रों में वोटरों को प्रभावित करने में सक्षम माना जाता रहा है. इसलिए राजनीतिक पार्टियां डेरा के समर्थकों को नाराज करने से बचती रही हैं.

2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव में यह साफ हो गया था कि राम रहीम की रिहाई कितनी संवेदनशील राजनीतिक मुद्दा बन सकती है. चुनाव से ठीक पहले उन्हें 21 दिन की फरलो दी गई थी, जिससे यह आरोप लगे कि उनकी रिहाई वोटिंग पैटर्न को प्रभावित कर सकती है. शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने इस फैसले का कड़ा विरोध किया था और उनकी रिहाई के समय पर सवाल उठाए थे. ताजा फरलो से राजनीतिक पार्टियों पर एक बार फिर दबाव बढ़ सकता है.

सिख कैदियों का मुद्दा AAP सरकार के लिए बड़ी चुनौती

पंजाब में आम आदमी पार्टी सरकार के लिए सिख कैदियों का मुद्दा एक बड़ी चुनौती है. सरकार पर सिख संगठनों और कैदियों के परिवारों का दबाव है जो मानवीय आधार पर पैरोल और रिहाई की मांग कर रहे हैं. राजनीतिक बहस में जो बात फिर से उठ सकती है, वह सीधी-सी है- अगर डेरा प्रमुख, जो दोषी ठहराया जा चुका है, उसे बार-बार कुछ समय के लिए रिहाई मिल सकती है, तो उन सिख कैदियों को पैरोल, सजा में छूट या रिहाई पाने में मुश्किलें क्यों आ रही हैं, जिन्होंने जेल में लंबा समय बिताया है? यह तुलना उन मामलों में और भी तीखी हो सकती है जहां बुजुर्ग माता-पिता और परिवार मानवीय आधार पर अस्थायी रिहाई की मांग कर रहे हैं. 

यह मुद्दा शिरोमणि अकाली दल और अन्य पंथिक संगठनों को भी एक हथियार देता है. वे राम रहीम की बार-बार मिलने वाली फरलो को भेदभावपूर्ण व्यवहार के उदाहरण के तौर पर पेश कर सकते हैं और साथ ही 'बंदी सिखों' की लंबी कैद का मुद्दा भी उठा सकते हैं. कांग्रेस के लिए, यह मुद्दा पंजाब में AAP सरकार और हरियाणा में BJP के नेतृत्व वाली सरकार, दोनों पर हमला करने का एक और मौका देता है. पार्टी यह सवाल उठा सकती है कि क्या हाई-प्रोफाइल कैदियों से जुड़े फैसलों पर राजनीतिक कारणों का असर पड़ रहा है.

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बीजेपी के सामने क्या समीकरण?

वहीं, BJP के सामने एक अलग राजनीतिक समीकरण है. पार्टी पंजाब में अपना चुनावी आधार बढ़ाने की कोशिश कर रही है, जबकि डेरा का मतदाताओं के कुछ वर्गों के बीच काफी प्रभाव है. इसलिए, अगर ऐसी कोई धारणा बनती है कि राम रहीम की अस्थायी रिहाई से डेरा की राजनीतिक पसंद पर असर पड़ सकता है, तो इस पर कड़ी नजर रखी जा सकती है. इस विवाद से अंततः सबसे बड़ा फायदा पंजाब के धार्मिक और सामाजिक वोट बैंक से जुड़ी व्यापक राजनीतिक बहस को हो सकता है.

उम्मीद है कि 2027 का चुनाव AAP, कांग्रेस, BJP और शिरोमणि अकाली दल के बीच बहुकोणीय मुकाबला होगा. ऐसे मुकाबले में, कड़े मुकाबले वाली सीटों पर एक छोटा लेकिन संगठित वोट बैंक भी अहम हो सकता है. इसलिए मालवा के कुछ हिस्सों में डेरा का प्रभाव चुनावी चर्चा का विषय बन सकता है.

साथ ही, सिख कैदियों का मुद्दा एक जवाबी नैरेटिव भी बन सकता है. राजनीतिक पार्टियों को शायद इस सवाल का जवाब देना पड़े कि क्या पैरोल और फरलो का सिस्टम कैदी की धार्मिक, राजनीतिक या सामाजिक पहचान से परे हटकर समान रूप से लागू किया जा रहा है. इस तरह, राम रहीम की 21 दिन की फरलो ने पंजाब में दो समानांतर राजनीतिक मोर्चे खोल दिए हैं. डेरा के वोट को एकजुट करने की संभावना और सिख कैदियों के लिए न्याय की नई मांग.

2027 के विधानसभा चुनाव करीब आ रहे हैं, ऐसे में सवाल अब सिर्फ राम रहीम की अस्थायी आजादी तक सीमित नहीं रह गया है. बड़ा राजनीतिक सवाल यह है कि क्या उनकी बार-बार मिलने वाली फरलो एक ऐसा मुद्दा बन जाएगी जिसके इर्द-गिर्द पंजाब की 'डेरा बनाम पंथिक' राजनीति फिर से लामबंद हो सकती है.

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