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VIDEO: 'अब वापस कभी नहीं आऊंगा...', टूटा भरोसा तो प्रवासी श्रमिक ने बयां किया दर्द; सूरत का ये सैलाब आपको हिला देगा

ड्रोन से सामने आई तस्वीरों में उधना स्टेशन का पूरा परिसर मानो जनसैलाब में तब्दील नजर आया. आमतौर पर दिवाली या छठ जैसे त्योहारों के दौरान दिखने वाली भीड़ इस बार बिना किसी बड़े त्योहार के त्यौहार से ज्यादा भीड़ देखने को मिली.

VIDEO: 'अब वापस कभी नहीं आऊंगा...', टूटा भरोसा तो प्रवासी श्रमिक ने बयां किया दर्द; सूरत का ये सैलाब आपको हिला देगा
  • उधना रेलवे स्टेशन पर हजारों प्रवासी श्रमिकों की भीड़ जमा हो गई, उन्हें कई घंटे लंबी कतारों में खड़े रहना पड़ा
  • भीड़ नियंत्रण को लेकर पुलिस ने कुछ लोगों पर बल प्रयोग किया, हालांकि लाठीचार्ज से साफ तौर पर इनकार किया है
  • महिलाओं और बच्चों समेत यात्रियों की स्थिति खराब हुई, कई जगहों पर धक्का-मुक्की और बैरिकेड तोड़ने की कोशिश हुई
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सूरत:

गुजरात के उधना रेलवे स्टेशन से एक बार फिर अव्यवस्था, भारी भीड़ और सिस्टम की नाकामी की तस्वीरें सामने आई हैं. हजारों की संख्या में प्रवासी श्रमिक घर जाने के लिए स्टेशन पर पहुंच गए, लेकिन यहां हालात इतने बिगड़ गए कि लोगों को 14 से 16 घंटे तक 2 किलोमीटर लंबी कतारों में खड़े रहना पड़ा. कई यात्री बिना खाना-पानी के लाइन में जमे रहे, जिससे उनकी हालत भी बिगड़ने लगी. भीड़ इतनी बेकाबू हो गई कि हालात संभालने के लिए पुलिस को लाठीचार्ज तक करना पड़ा. हालांकि पुलिस अधिकारी ने लाठीचार्ज से इनकार किया है. पुलिस के आलाधिकारी ने कहा कि, कुछ लोग जो व्यवस्था भंग कर रहे थे, उनको वहां से हटाया गया है.

अब वापस कभी नहीं आऊंगा- घर लौट रहे श्रमिक ने कहा

इसी अफरातफरी के बीच एक मार्मिक दृश्य भी सामने आया, जिसने पूरे घटनाक्रम को भावनात्मक बना दिया. एक यात्री दोनों हाथों में अपना सामान लेकर लोगों के बीच से भागता हुआ नजर आया, लेकिन जब उसने कैमरा देखा तो जाते-जाते अपना दर्द बयां कर गया और कहता गया कि, “अब वापस कभी नहीं आऊंगा.” उसकी आवाज में गुस्सा नहीं, बल्कि गहरी पीड़ा और बेबसी साफ झलक रही थी.

यह वही सूरत शहर है, जो लाखों प्रवासी श्रमिकों को रोजगार देता है, उनकी भूख मिटाता है, लेकिन जब वही लोग अपने घर लौटने की कोशिश करते हैं, तो उन्हें ऐसी बदहाल और अपमानजनक स्थिति का सामना करना पड़ता है. उस एक यात्री की आवाज मानो हजारों लोगों के दर्द और व्यवस्था के प्रति उनके टूटते भरोसे की गूंज बन गई.

स्थिति उस वक्त और भयावह हो गई जब महिलाओं और छोटे बच्चों को इस अफरातफरी का सामना करना पड़ा. घंटों लाइन में खड़ी महिलाएं अपने बच्चों के साथ परेशान नजर आईं, धक्का-मुक्की के बीच बच्चे रोने लगे और कई महिलाएं घबरा गईं. कुछ जगहों पर तो हालात इतने बिगड़े कि यात्रियों ने बैरिकेड्स तक तोड़ने की कोशिश की. बताया जा रहा है कि करीब 8000 से ज्यादा यात्रियों के मुकाबले शुरुआत में सिर्फ दो ट्रेनों की व्यवस्था थी, जिससे भीड़ का दबाव अचानक बढ़ गया. तेज गर्मी और उमस के कारण लाइन में खड़े दो यात्री बेहोश भी हो गए.

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ड्रोन से सामने आई तस्वीरों में उधना स्टेशन का पूरा परिसर मानो जनसैलाब में तब्दील नजर आया. आमतौर पर दिवाली या छठ जैसे त्योहारों के दौरान दिखने वाली भीड़ इस बार बिना किसी बड़े त्योहार के त्यौहार से ज्यादा भीड़ देखने को मिली. रविवार को अकेले उधना स्टेशन से करीब 21,000 यात्रियों ने उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड जैसे राज्यों के लिए प्रस्थान किया. ट्रेन के कोच में पहले चढ़ने की होड़ में यात्रियों के बीच धक्का-मुक्की बढ़ी और कतारें टूट गईं, जिससे भगदड़ जैसे हालात बन गए. स्थिति को नियंत्रित करने के लिए रेलवे पुलिस और स्थानीय पुलिस को मोर्चा संभालना पड़ा और भीड़ को काबू में करने के लिए हल्का बल प्रयोग भी करना पड़ा.

अधिकारियों के दावों पर सवाल खड़े कर रहे हैं जमीनी हालात

रेलवे प्रशासन अपनी ओर से व्यवस्थाओं का दावा जरूर कर रहा है. पश्चिम रेलवे के अधिकारियों के मुताबिक, दिनभर में 6 विशेष ट्रेनों के जरिए करीब 21,000 यात्रियों को भेजा गया है. इसके अलावा रात में उधना से जयनगर के लिए एक अतिरिक्त स्पेशल ट्रेन चलाई जा रही है, जबकि बांद्रा-गोरखपुर और वलसाड-मऊ जैसी ट्रेनों को उधना में अतिरिक्त ठहराव दिया गया है. अधिकारियों का कहना है कि भीड़ को देखते हुए पहले से प्री-प्लानिंग की गई थी, लेकिन जमीनी हालात इन दावों पर सवाल खड़े कर रहे हैं.

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असल समस्या यह है कि सूरत में काम करने वाले लाखों प्रवासी मजदूर हर साल छुट्टियों के दौरान उधना स्टेशन पर निर्भर रहते हैं, लेकिन यहां बुनियादी सुविधाएं आज भी नाकाफी हैं. स्टेशन के बाहर सिर्फ करीब 1500 लोगों की क्षमता वाला एक छोटा शेड है, जबकि यात्रियों की संख्या कई हजार में पहुंच जाती है. ऐसे में लोगों को सड़क पर बैठकर या खुले आसमान के नीचे घंटों इंतजार करना पड़ता है.

40 डिग्री की झुलसाने वाली गर्मी में भी यात्री बेबस

सबसे गंभीर पहलू यह है कि करीब 40 डिग्री की झुलसाने वाली गर्मी में यात्री बिना किसी पर्याप्त व्यवस्था के लाइन में खड़े रहने को मजबूर हैं. न पीने के पानी की सही सुविधा, न शौचालय की व्यवस्था और अगर कोई लाइन छोड़कर बाहर जाता है, तो उसका नंबर छूट जाता है. यही वजह है कि लोग भूखे-प्यासे और थके होने के बावजूद अपनी जगह छोड़ने की हिम्मत नहीं कर पाते.

हर साल दोहराई जाने वाली यह तस्वीर एक बड़ा सवाल खड़ा करती है, क्या रेलवे प्रशासन के पास इस समस्या का कोई स्थायी समाधान है, या फिर हर बार की तरह यात्रियों को ही इस अव्यवस्था की कीमत चुकानी पड़ेगी?

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