Petrol Diesel CNG Prices Hike: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में सोमवार को हल्की नरमी देखी गई थी. वहीं दूसरी ओर यहां भारत में पेट्रोल-डीजल महंगा हो गया. तेल मार्केटिंग कंपनियों ने 11 दिन के भीतर चौथी बार पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ा दिए. मंगलवार को CNG भी 2 रुपये/किलो महंगी हो गई. क्रूड ऑयल की कीमतों में गिरावट की खबरों के बीच भारतीय उपभोक्ताओं की जेब पर पेट्रोल, डीजल और सीएनजी (CNG) की बढ़ती मार एक बड़ी पहेली बनी हुई है. वैश्विक बाजार में जब नरमी का रुख होता है, तब भी घरेलू स्तर पर ईंधन के दाम क्यों बढ़ते हैं? इस विरोधाभास को बहुत सारे लोग नहीं समझ पाते. इसके लिए इंटरनेशनल ट्रेड की कॉम्प्लेक्सिटी यानी जटिलताओं, भारतीय रिफाइनरियों के क्रूड ऑयल खरीद पैटर्न और तेल कंपनियों के वित्तीय गणित को समझना बेहद जरूरी है.
सबसे पहले 11 दिनों का गणित समझ लीजिए
सरकारी तेल कंपनियों ने मध्यपूर्व एशिया में पिछले करीब तीन महीनों से जारी संकट और अंतरराष्ट्रीय तेल व गैस बाजार में हो रही उथल-पुथल को देखते हुए भारत में चरणबद्ध तरीके (Incremental Increase) से कीमतें बढ़ाने की रणनीति अपनाई है. इसी के तहत महज 11 दिनों के भीतर चौथी बार पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ाई गईं. ठीक इसी तरह, इंद्रप्रस्थ गैस लिमिटेड (IGL) ने महज 12 दिनों के अंदर चौथी बार CNG के दाम बढ़ा दिए, जिससे दिल्ली में CNG की कीमत 6 रुपये/किलो तक महंगी हो चुकी है.
चौंकाने वाली बात यह है कि जब सोमवार को पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाए गए, ठीक उसी वक्त अंतरराष्ट्रीय बाजार से एक सकारात्मक खबर आई. अमेरिका और ईरान के बीच टकराव रोकने के लिए प्रस्तावित 'पीस डील' पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयान का असर यह हुआ कि बाजार खुलते ही 'ब्रेंट क्रूड ऑयल फ्यूचर्स' (Brent Crude Oil Futures) की कीमत करीब 5% गिरकर 92 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई. ऐसे में सवाल उठता है कि जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चा तेल 92 डॉलर पर आ गया, तो भारत में दाम क्यों बढ़े?

फ्यूचर ट्रेडिंग और डिलीवरी का पेच
पहली बुनियादी बात यह है कि अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में कारोबार 'फ्यूचर्स' (भविष्य के अनुबंधों) में होता है. आज स्क्रीन पर जो दरें दिख रही हैं, उसकी डिलीवरी आज ही नहीं होती. आज आप अपनी गाड़ी में जो पेट्रोल या डीजल डलवा रहे हैं, वह काफी पहले विदेशों से खरीदा गया होगा, जहाजों के जरिए भारत पहुंचा होगा और रिफाइनरियों में प्रोसेस हुआ होगा. यानी आज की खुदरा कीमतें आज के कच्चे तेल के भाव से तय नहीं होतीं, बल्कि हफ्तों या महीनों पहले के खरीद भाव पर निर्भर करती हैं.
भारतीय तेल कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजार से 15 दिन से लेकर 3 से 6 महीने तक के अग्रिम अनुबंधों (Contracts) के तहत कच्चे तेल का आयात करती हैं. इन अनुबंधों की दरें दैनिक 'ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स' की कीमतों से काफी अलग होती हैं.
क्या है इंडियन बास्केट का गणित?
भारत अपनी जरूरत का कच्चा तेल किसी एक देश या एक ही ग्रेड से नहीं खरीदता. पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार, 'इंडियन बास्केट ऑफ क्रूड ऑयल' (ICB) एक मिश्रित बास्केट है, जिसमें दो तरह के कच्चे तेल शामिल होते हैं:
- स्वीट ग्रेड (Sweet Grade): इसमें कम सल्फर वाला ब्रेंट क्रूड शामिल होता है.
- सोर ग्रेड (Sour Grade): इसमें ओमान और दुबई का औसत क्रूड शामिल होता है.
भारत अपनी इस बास्केट के तहत रूस के बाद दुबई/यूएई (UAE), वेनेजुएला और अमेरिका समेत कई अन्य देशों से तेल खरीदता है. पेट्रोलियम मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, इस बास्केट का अनुपात बदलता रहता है. अप्रैल 2026 में ये अनुपात (स्वीट बनाम सोर) करीब 61: 39 था, जो मई 2026 में बदलकर 70:30 हो गया.
यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय ब्रेंट क्रूड और भारतीय बास्केट के भाव में बड़ा अंतर आ जाता है. पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) की 26 मई 2026 को जारी ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, जब 22 मई को अंतरराष्ट्रीय ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स की कीमत 100.21 डॉलर/बैरल थी, उस समय भारतीय रिफाइनरियों के लिए कच्चे तेल (भारतीय बास्केट) की कीमत 106.26 डॉलर/बैरल के ऊंचे स्तर पर चल रही थी.

तेल कंपनियों का घाटा और 'अंडर-रिकवरी'
मध्यपूर्व एशिया में पिछले तीन महीनों से जारी भू-राजनीतिक संकट ने भारत के तेल और गैस आयात के खर्च को भारी स्तर पर बढ़ा दिया है. लगातार चार बार खुदरा कीमतों में बढ़ोतरी करने के बावजूद, सरकारी तेल कंपनियों की 'अंडर-रिकवरी' (लागत के मुकाबले कम वसूली) बढ़ती जा रही है और वे भारी घाटा सह रही हैं.
पेट्रोलियम मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा के अनुसार, खुदरा कीमतों में इस चरणबद्ध बढ़ोतरी से पहले तेल कंपनियों को हर दिन लगभग 1,000 करोड़ रुपये का भारी नुकसान हो रहा था. अब कीमतें बढ़ाए जाने के बाद यह दैनिक घाटा घटकर 600 करोड़ रुपये से कुछ कम हुआ है, जिसमें पेट्रोल, डीजल और एलपीजी (LPG) का आयात खर्च शामिल है. साफ है कि जब तक तेल कंपनियों का यह घाटा पूरी तरह खत्म नहीं होता, तब तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में आई तात्कालिक गिरावट का सीधा फायदा भारतीय उपभोक्ताओं को मिलना मुश्किल है.
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