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Success story: जिस कंपनी ने नौकरी नहीं दी, उसे ही खरीद लिया, उधार के ₹10 हजार से खड़ी कर दी सन फार्मा

Success story of Sun Pharma's Dilip Shanghvi: सन फार्मा और दिलीप सांघवी की कहानी किसी फिल्म से कम नहीं. पिता से दस हजार रुपए और पक्के इरादे लेकर निकला नौजवान 4 लाख करोड़ की कंपनी खड़ी कर देता है. इतना ही नहीं, जिस कंपनी ने उसे नौकरी देने से मना किया, उसे भी खरीद लेता है.

Success story: जिस कंपनी ने नौकरी नहीं दी, उसे ही खरीद लिया, उधार के ₹10 हजार से खड़ी कर दी सन फार्मा
Success story of Sun Pharma's Dilip Shanghvi

Success story of Dilip Shanghvi: क्या महज ₹10,000 की मामूली सी रकम से ₹4 लाख करोड़ का साम्राज्य खड़ा किया जा सकता है? अब आप कहेंगे कि ये तो किसी बॉलीवुड फिल्म की स्क्रिप्ट लग रही है." लेकिन ये हकीकत कभी-कभी फिक्शन से भी ज्यादा दमदार होती है. आपके घर के फर्स्ट-एड बॉक्स में रखी वोलिनी (Volini), थकान मिटाने वाली रिवाइटल (Revital), या पेट की गैस भगाने वाली पेपफिज (Pepfiz). क्या आपने कभी सोचा है कि इन भरोसेमंद दवाइयों के पीछे आखिर कौन है? आज की कहानी है सन फार्मा (Sun Pharma) के मालिक दिलीप सांघवी की. एक ऐसा इंसान जिसे कभी भारत की सबसे बड़ी फार्मा कंपनी ने नौकरी देने से धक्के मारकर निकाल दिया था और एक दिन उसी इंसान ने उस पूरी की पूरी कंपनी को ही खरीद लिया. जीरो से हीरो की इस कड़ी में कहानी सन फार्मा के दिलीप सांघवी. 

From ₹10,000 to a ₹4 Lakh Crore Empire: The Success Story of Sun Pharma and Dilip Shanghvi

बिचौलिए से मालिक बनने का सपना
कहानी शुरू होती है 1955 में, गुजरात के एक छोटे से शहर अमरेली से. दिलीप के पिता शांतिलाल सांघवी कोलकाता में जेनेरिक दवा की एक छोटी सी थोक की दुकान चलाते थे. दिलीप जब कॉलेज में थे, तो पिता के काम में हाथ बंटाने लगे. वहीं उन्हें एक बात समझ आ गई कि "असली मलाई तो बिचौलिए नहीं, बल्कि दवा बनाने वाली कंपनियां खा रही हैं."

दिलीप ने सोच लिया कि अपनी खुद की कंपनी बनानी है. लेकिन पेंच ये था कि न तो उनके पास फार्मेसी की डिग्री थी, न कोई साइंटिफिक बैकग्राउंड. वो तो ठहरे कॉमर्स के स्टूडेंट. उन्होंने सोचा, चलो पहले किसी बड़ी कंपनी में काम सीख लेते हैं. उन्होंने उस वक्त की सबसे बड़ी कंपनी 'रैनबैक्सी (Ranbaxy)' में एंट्री लेवल जॉब के लिए अप्लाई किया. लेकिन रैनबैक्सी ने उनका रेज़्यूमे देखा और कहा, "तुम्हारे पास टेक्निकल डिग्री नहीं है, तुम हमारे किस काम के?" और उन्हें रिजेक्ट कर दिया. ये रिजेक्शन एक तमाचा था, लेकिन इसी तमाचे ने दिलीप के अंदर वो आग लगा दी जिसने आगे चलकर इतिहास रच दिया.

एक 'वन-मैन आर्मी' और 10 हजार रुपये का दांव
दिलीप अपने पिता के पास गए और अपना सपना बताया. एक 26 साल का लड़का, जिसे दवा बनाने का 'द' भी नहीं पता था, वो कंपनी खोलने की बात कर रहा था. फिर भी, पिता ने भरोसा जताया और ₹10,000 उधार दे दिए.

साल था 1983. दिलीप पहुंच गए गुजरात के वापी में. और नींव रखी गई 'सन फार्मा' की. दिलीप अकेले थे. वही सेल्समैन, वही मैनेजर, वही मालिक. उन्होंने शुरुआत के लिए वो रास्ता चुना जहां बड़े खिलाड़ी नहीं थे. मानसिक बीमारियों (Mental Health) की दवाएं. सिर्फ 5 दवाओं के साथ उन्होंने बाजार में कदम रखा.

लेकिन बाजार तो बाजार है, कोई रेड कार्पेट थोड़े ही बिछा था. वो अपना बैग लेकर डॉक्टरों के क्लिनिक जाते, तो डॉक्टर कहते "सन फार्मा? ये कौन सी कंपनी है भाई? हम तो रैनबैक्सी और सिप्ला लिखते हैं." कई बार तो उन्हें धक्के मारकर बाहर निकाल दिया जाता.

मेडिकल स्टोर वालों ने भी दवा रखने से मना कर दिया कि जब डॉक्टर पर्ची पर लिखेगा ही नहीं, तो हम बेचेंगे किसे? यहीं पर दिलीप सांघवी ने खेला एक मास्टरस्ट्रोक. उन्होंने दुकानदारों से कहा, "भाई साहब, आप दवा रख लो. बिक जाए तो पैसे दे देना, न बिके तो मैं वापस ले जाऊंगा." इसे कहते हैं 'नो रिस्क ऑफर'.

बस, तीर निशाने पर लगा. मानसिक बीमारियों की दवाइयां बाजार में कम थीं, असर अच्छा था, तो डॉक्टरों ने लिखना शुरू कर दिया और दुकानदारों ने बेचना. 1990 आते-आते ये छोटी सी कंपनी एक मुनाफे वाला ब्रांड बन चुकी थी. 

From ₹10,000 to a ₹4 Lakh Crore Empire: The Success Story of Sun Pharma and Dilip Shanghvi

सात समंदर पार छलांग
जब भारत में जड़ें मजबूत हो गईं, तो दिलीप ने देखा अमेरिका का सपना. अमेरिका, जहां के नियम-कानून दुनिया में सबसे सख्त हैं. 1997 में खबर आई कि अमेरिका की एक फार्मा कंपनी कैराको (Caraco) दिवालिया होने की कगार पर है. कोई उसमें पैसा लगाने को तैयार नहीं था. लेकिन दिलीप को कचरे में हीरा नजर आया. उन्होंने कंपनी खरीद ली.

शुरुआत में ये दांव उल्टा पड़ता दिखा. अमेरिका की FDA (फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन) ने नोटिस पर नोटिस भेज दिए. सबने कहा, "दिलीप सांघवी ने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है." लेकिन जो इंसान हार न माने, वही बाजीगर है. दिलीप खुद अमेरिका गए, सिस्टम सुधारा, साइंटिस्ट लगाए और कई सालों की मेहनत के बाद उस डूबती हुई कैराको को अमेरिका की एक भरोसेमंद कंपनी बना दिया. 2007-08 तक सन फार्मा की 55% कमाई इंटरनेशनल मार्केट से आने लगी थी.

क्लाइमैक्स अभी बाकी है...
अब आता है कहानी का वो हिस्सा, जिसे सुनकर आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे. याद है न रैनबैक्सी? वही कंपनी जिसने दिलीप को नौकरी नहीं दी थी. 2004 से 2013 के बीच रैनबैक्सी में ऐसा भूचाल आया कि कंपनी ताश के पत्तों की तरह बिखरने लगी. नकली डेटा, खराब दवाइयां. अमेरिका ने बैन लगा दिया. जापान की कंपनी 'दाईची सांख्यो' ने इसे खरीदा था, पर उन पर 500 मिलियन डॉलर का जुर्माना लग गया. दाईची के तो हाथ-पैर फूल गए. वो इस कंपनी से पीछा छुड़ाना चाहते थे, पर कोई खरीदार नहीं था.

2014 में दिलीप सांघवी की एंट्री
उन्होंने 4 बिलियन डॉलर (करीब 2000 करोड़ रुपये) में पूरी की पूरी रैनबैक्सी को खरीद लिया. ये भारत के फार्मा इतिहास का सबसे बड़ा सौदा था. जिसने नौकरी नहीं दी थी, आज दिलीप सांघवी उस कंपनी के मालिक बन बैठे थे. रैनबैक्सी को वापस पटरी पर लाना लोहे के चने चबाने जैसा था. एम्प्लॉईज का गुस्सा, डॉक्टरों का टूटा भरोसा, FDA का बैन. सब कुछ झेलना था. पर दिलीप ने रैनबैक्सी का नाम सन फार्मा में मिलाया, कल्चर बदला और धीरे-धीरे कंपनी को फिर से जिंदा कर दिया.  

4 लाख करोड़ का साम्राज्य
इसके बाद दिलीप नहीं रुके. वो स्पेशलिटी ड्रग्स (कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों की दवा) के मुश्किल बाजार में उतरे. शुरुआत में मार्जिन गिरा, प्रॉफिट 70% तक नीचे आ गया. इन्वेस्टर्स की सांसें अटक गईं कि कहीं दिलीप सांघवी ने ज्यादा बड़ा रिस्क तो नहीं ले लिया? पर दिलीप जानते थे कि रात जितनी गहरी होती है, सवेरा उतना ही करीब होता है. उन्होंने मार्केटिंग से ज्यादा डॉक्टरों के साथ भरोसा बनाने पर फोकस किया. नतीजा- 2023 में कंपनी ने ₹43,000 करोड़ से ज्यादा का रिकॉर्ड रेवेन्यू कमाया. 

From ₹10,000 to a ₹4 Lakh Crore Empire: The Success Story of Sun Pharma and Dilip Shanghvi

आज सन फार्मा के दुनिया भर में 40 से ज्यादा मैन्युफैक्चरिंग प्लांट हैं. कंपनी की 70% कमाई भारत के बाहर से आती है. आज ये कंपनी 4 लाख करोड़ का आंकड़ा पार कर चुकी है और अमेरिका के बाजार की टॉप 5 कंपनियों में राज करती है. अभी हाल में ट्रंप प्रशासन ने अमेरिका में फार्मा कंपनियों पर 200% इम्पोर्ट ड्यूटी लगाने का ऐलान किया है. ऐसे में सबसे बड़ा नुकसान भारतीय फार्मा इंडस्ट्रीज को होने वाला है. क्योंकि भारत दुनिया में जेनेरिक दवाओं को सबसे बड़ा प्रोड्यूसर है. 

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