देश में पहली बार समान नागरिक संहिता यानी UCC के तहत हलाला मामले में FIR दर्ज हुई है. यह FIR उत्तराखंड के हरिद्वार में दर्ज हुई है. उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता लागू होने के बाद हलाला का यह पहला मामला है. हरिद्वार जिले के बुग्गावाला थाने में पुलिस ने एक महिला की शिकायत पर उसके पति और ससुराल वालों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है.
क्या है पूरा मामला?
शिकायतकर्ता शाहिन ने अपने पति मोहम्मद दानिश और ससुराल पक्ष के अन्य सदस्यों के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए हैं. पुलिस रिपोर्ट के अनुसार, दानिश पर अपनी पत्नी को प्रताड़ित करने और विवाह से संबंधित अधिकारों के उल्लंघन का आरोप है. इस मामले में पुलिस ने आरोपी पति दानिश के खिलाफ समान नागरिक संहिता, उत्तराखंड 2024 (संशोधन 2026) की धारा 32(1)(ii) और 32(1)(iii) के तहत कार्रवाई की है, जो विशेष रूप से हलाला जैसी प्रथाओं को प्रतिबंधित और दंडनीय बनाती हैं.
किन धाराओं में दर्ज हुई FIR?
- पुलिस ने इस मामले में केवल UCC ही नहीं, बल्कि अन्य कड़े कानूनों के तहत भी शिकंजा कसा है.
- समान नागरिक संहिता, उत्तराखंड 2024: धारा 32(1)(ii) और 32(1)(iii).
- भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023: धारा 115(2) (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना) और धारा 85.
- मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों की सुरक्षा) अधिनियम, 2019: धारा 3 और 4 (तीन तलाक से संबंधित).
- दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961: धारा 3 और 4.
बुग्गावाला पुलिस ने इस मामले में गहनता से जांच की और SI मनोज कुमार ने चार्जशीट तैयार कर न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वितीय रुड़की कोर्ट में पेश किया. इस मामले में मुख्य आरोपी दानिश के अलावा उसके परिवार के अन्य सदस्यों के नाम भी शामिल हैं.
यह मामला उत्तराखंड में UCC के प्रभावी क्रियान्वयन की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है, जो महिलाओं के वैवाहिक अधिकारों की रक्षा करने और कुप्रथाओं को समाप्त करने के उद्देश्य से लाया गया है. उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता लागू हुए करीब डेढ़ वर्ष हो चुका है. कानून लागू होने के बाद हलाला का यह पहला मामला सामने आया है. इससे पहले हलाला और बहुविवाह का एक भी मामला सामने नहीं आया था. सरकार का दावा है कि यूसीसी लागू होने से महिलाओं को समान अधिकार, सम्मान और सुरक्षा का कानूनी अधिकार मिला है. राज्य में यूसीसी लागू होने के बाद से विवाह के पंजीकरण में बढ़ोतरी हुई है. अब औसतन प्रतिदिन 1400 पंजीकरण हो रहे हैं, जबकि पहले यह संख्या औसतन 67 थी.
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