- एक जगह टूटकर बरसते हैं बादल और दूसरी जगह नहीं गिरती एक बूंद.
- बारिश छोटे-छोटे लेकिन अहम मौसमीय बदलावों पर निर्भर करती है.
- हवा, नमी, बादल, तापमान और बड़े मौसमीय सिस्टम सभी मिलकर कहीं झमाझम बारिश तो कहीं नहीं गिराते एक भी बूंद.
मान लीजिए आपके शहर में लोग बारिश का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन 40-50 किलोमीटर दूर इतनी बारिश हो रही है कि सड़कें पानी में डूब गई हैं. यह देखकर अक्सर सवाल उठता है कि आखिर एक ही समय में दो जगहों पर मौसम इतना अलग कैसे हो सकता है? मौसम वैज्ञानिक कहते हैं कि मानसून कभी भी पूरे इलाके में एक साथ और बराबर बारिश नहीं कराता. बारिश छोटे-छोटे मौसमीय बदलावों पर निर्भर करती है. इसलिए कहीं तेज बारिश होती है, तो कहीं बादल आने के बाद भी पानी नहीं बरसता.

सबसे पहले समझिए, बारिश होती कैसे है?
बारिश के लिए तीन चीजें जरूरी होती हैं. पहली, हवा में भरपूर नमी. दूसरी, उस नमी से भरे बादल. और तीसरी, ऐसा माहौल जिसमें बादल ऊपर उठकर ठंडे हों और पानी की बूंदों में बदल जाएं. अगर इनमें से कोई एक चीज भी कम पड़ जाए, तो बारिश नहीं होती.
लेकिन इससे भी अहम ये है कि हवा का रास्ता बदलता रहता है, जो बारिश के लिए होने और नहीं होने में अहम किरदार निभाता है. आपने कई बार देखा होगा कि बारिश की कुछ बूंदें भी गिरती हैं, फिर अचानक आसमान से बादल छंटने लगते हैं और मौसम बदल जाता है.
दरअसल, बारिश कराने वाली नमी ज्यादातर अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से आती हैं. लेकिन ये नम हवाएं हर जगह एक जैसी नहीं पहुंचतीं. जहां ज्यादा नमी पहुंचती है, वहां बादल घने बनते हैं और अच्छी बारिश होती है. वहीं कुछ दूरी पर नमी कम पहुंचने से बारिश नहीं हो पाती और तेज चलती हवाओं का उसमें किरदार होता है.

तटीय, तराई और पहाड़ी इलाकों में बारिश अलग-अलग क्यों?
यही वजह है कि तटीय इलाकों यानी समुद्र के पास के इलाकों में ज्यादा बारिश होती है, क्योंकि वहां समुद्र से आने वाली हवाओं में बहुत अधिक नमी होती है. इसके उलट, तराई या मैदानी इलाकों तक पहुंचते-पहुंचते हवा की नमी काफी हद तक खत्म हो जाती है, जिससे उन इलाकों में बारिश कम होती है.
समुद्री इलाकों से उठी नमी से भरी गर्म हवा जब रास्ते में पहाड़ों से टकराती है, तो वह ऊपर की ओर उठती है. जैसे-जैसे हवा ऊपर जाती है, उसका तापमान कम होने लगता है. ठंडी हवा नमी को ज्यादा देर तक अपने अंदर नहीं रख सकती. नमी पानी की बूंदों में बदल जाती है, जिससे पहाड़ों पर बहुत अधिक बारिश होती है.
अब नमी वाली जो हवा पहाड़ों को पार करने में सक्षम हो जाती हैं वो उसके दूसरी तरफ नीचे उतरती है और धीरे-धीरे सूख जाती है. यही वजह है कि लोगों को बादल दिखते हैं थोड़ी बहुत बूंदाबांदी भी होती है, पर पहाड़ पर हो रही बारिश की तरह तराई (मैदानी इलाकों) में लोगों को उतनी बारिश नहीं मिलती.

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बादल हर जगह नहीं बरसते
आसमान में बादल दिखने का मतलब यह नहीं कि बारिश जरूर होगी. कई बार बादल बन तो जाते हैं, लेकिन उनमें पानी की बूंदें इतनी नहीं बन पातीं कि वे जमीन तक पहुंच सकें. ऐसे में बादल छाए रहते हैं, लेकिन बारिश नहीं होती.
कई बार आपने देखा होगा कि शहर के एक हिस्से में तेज बारिश हो रही होती है, जबकि दूसरे हिस्से में सड़कें सूखी रहती हैं. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि कुछ बादल बहुत छोटे इलाके में बनते हैं और वहीं बरसकर खत्म हो जाते हैं. मौसम वैज्ञानिक इसे स्थानीय बारिश यानी लोकल रेनफॉल कहते हैं.

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बड़े मौसमीय सिस्टम, जो डालते हैं बड़ा असर
लो प्रेशर एरिया, मानसूनी ट्रफ, डिप्रेशन, हिंद महासागर में डाइपोल बनना (यानी हिंद महासागर के पश्चिम और पूर्वी हिस्से के समुद्र के तापमान के बीच का अंतर होना) और एमजेओ (मैडेन-जूलियन ऑसिलेशन यानी यह भूमध्य रेखा के आसपास पश्चिम से पूर्व की ओर धीरे-धीरे चलने वाला बादलों और बारिश का एक बड़ा समूह होता है) जैसे बड़े मौसमीय सिस्टम पूरे देश में बारिश का रुख तय करते हैं.

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जलवायु परिवर्तन डाल रहा असर
जब ये सिस्टम किसी इलाके के ऊपर या उसके आसपास सक्रिय होते हैं, तो वहां बारिश की संभावना काफी बढ़ जाती है. लेकिन इनसे दूर के इलाकों में बारिश कम हो सकती है.
मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से बारिश का पैटर्न बदल रहा है. पहले कई दिनों तक हल्की-हल्की बारिश होती थी. अब कई जगह लंबे समय तक बारिश नहीं होती और फिर कुछ घंटों में ही इतनी तेज बारिश हो जाती है कि बाढ़ जैसे हालात बन जाते हैं.

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आखिर क्या कहता है मौसम विभाग?
भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के मुताबिक मानसून कभी भी एक जैसी बारिश नहीं करता. बारिश का समय, जगह और मात्रा लगातार बदलती रहती है. यही कारण है कि एक जिले में सामान्य बारिश हो सकती है, जबकि उसी समय पड़ोसी जिले में बहुत ज्यादा या बिल्कुल भी बारिश न हो.
इसे इस उदाहरण से समझिए. बारिश का पूरा पानी एक टैंकर में भरा है. तो मानसून उस टैंकर को पूरे देश में बराबर नहीं उड़ेलता. वह कहीं ज्यादा पानी गिरा देता है, कहीं थोड़ा और कहीं बिल्कुल नहीं. यह सब हवाओं की दिशा, नमी, बादलों की स्थिति, तापमान और बड़े मौसमीय सिस्टम पर निर्भर करता है, जैसा कि ऊपर बताया गया है.
यही वजह है कि एक जगह लोग छाता लेकर घर से निकलते हैं, जबकि कुछ किलोमीटर दूर लोग आसमान की तरफ देखकर अब भी बारिश का इंतजार कर रहे होते हैं.
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