- विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक 2026 (एफसीआरए बिल) को लेकर सरकार और ईसाई संगठन आमने सामने हैं.
- सरकार कह रही है कि कानून धर्मनिरपेक्ष है और पूजा स्थलों का धार्मिक स्वरूप सुरक्षित रहेगा.
- चर्च और विपक्ष को संपत्ति छिनने का डर है.
ईसाई बहुल राज्य मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा और देश के कई प्रमुख ईसाई संगठनों ने केंद्र सरकार से एफसीआरए विधेयक 2026 को संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजने की मांग की. कांग्रेस ने भी विधेयक का कड़ा विरोध करने का एलान किया है. दूसरी तरफ केंद्र सरकार का कहना है कि कानून किसी धर्म को निशाना नहीं बनाता और इसका मकसद विदेशी चंदे से बनी संपत्तियों के प्रबंधन की स्पष्ट व्यवस्था करना है. आखिर इस विधेयक में ऐसा क्या है जिससे चर्च, अस्पताल, स्कूल और गैर सरकारी संगठनों को चिंता हो रही है?
दरअसल, एफसीआरए विधेयक 2026 का सबसे बड़ा विवाद विदेशी चंदे से बनी संपत्तियों पर सरकार के नियंत्रण को लेकर है. विधेयक में रजिस्ट्रेशन रद्द होने, वापस करने या समय पर नवीनीकरण न होने पर ऐसी संपत्तियों को पहले अस्थायी रूप से नामित प्राधिकरण के अधीन रखने और तय अवधि में रजिस्ट्रेशन बहाल न होने पर स्थायी रूप से उसके पास रखने का प्रस्ताव है. सरकार इसे धर्मनिरपेक्ष और पारदर्शिता बढ़ाने वाला कदम बता रही है. ईसाई संस्थाएं और विपक्ष इसे व्यापक सरकारी अधिकार मानकर संयुक्त संसदीय समिति से जांच की मांग कर रहे हैं.
India's Ambassador to the US, Vinay Mohan Kwatra tweets, "There are many misunderstandings in the media and in civil society about the proposed Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill(FCRA), 2026. Here is the Myth vs. Reality check.
— ANI (@ANI) August 10, 2026
Myth: India is an outlier in doing… pic.twitter.com/AsMDYMKhvB
एफसीआरए क्या है और अचानक इसकी चर्चा क्यों हो रही है?
एफसीआरए यानी विदेशी अंशदान विनियमन कानून 1976 वह कानून है जो भारत में विदेश से मिलने वाले चंदे और दूसरी तरह के विदेशी अंशदान को नियंत्रित करता है. समय-समय पर इसमें संशोधन कर इसे और मजबूत बनाया गया. साल 2010 में नया कानून लागू किया गया, जिसे बाद में 2016, 2018, 2020 में संशोधित भी किया गया.
सरल भाषा में समझें तो कोई गैर सरकारी संगठन, सामाजिक संस्था, धार्मिक संस्था या दूसरी पात्र संस्था अगर विदेश से पैसा लेना चाहती है तो उसे इस कानून के तहत रजिस्ट्रेशन या किसी खास मामले में पहले से अनुमति लेनी होती है.
गृह मंत्रालय के मुताबिक इस कानून का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी पैसा भारत की संप्रभुता, सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था और राष्ट्रीय हित के खिलाफ इस्तेमाल न हो. दुनिया के कई लोकतांत्रिक देशों, जैसे- संयुक्त राज्य अमेरिका (एफएआरए), ऑस्ट्रेलिया (एफआईटीएस), यूनाइटेड किंगडम (एफआईआरएस) और कनाडा (एफआईटीएए) ने भी विदेशी वित्तपोषण और विदेशी प्रभाव में पारदर्शिता एवं जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए कानून बनाए हैं.
अब 2026 में केंद्र सरकार इसमें एक बड़ा बदलाव प्रस्तावित कर रही है. 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किए गए एफसीआरए विधेयक में सबसे अहम प्रस्ताव विदेशी चंदे से बनी संपत्तियों की देखरेख और उनके भविष्य को लेकर है.
FCRA बिल इसलिए लाया जा रहा है जिससे संगठनों पर दबाव बना सके
— रिंकू यादव समाजवादी (@Yadav_2027) August 10, 2026
और उनकी जो महंगी जमीनें हैं उनको ज़ब्त किया जा सके।
- श्रीमती डिम्पल यादव जी, लोकसभा सांसद pic.twitter.com/XKkdxTDMsw
विवाद की असली वजह समझिए
मान लीजिए किसी संस्था ने विदेशी चंदे से स्कूल बनाया, अस्पताल बनाया, चर्च या कोई दूसरा पूजा स्थल बनाया, छात्रावास बनाया, कोई दफ्तर बनाया या जमीन और अन्य संपत्ति खरीदी.
अब किसी वजह से उस संस्था का एफसीआरए रजिस्ट्रेशन खत्म हो जाता है. तो ऐसी स्थिति में विधेयक के मुताबिक विदेशी चंदे और उससे बनी संपत्तियां पहले नामित प्राधिकरण यानी कानूनी तौर पर जिम्मेदारी निभाने के लिए नियुक्त की गई संस्थान के पास अस्थायी रूप से चली जाएंगी.
अगर संस्था तय अवधि के भीतर नया रजिस्ट्रेशन हासिल कर लेती है, रजिस्ट्रेशन का नवीनीकरण करा लेती है या उसे बहाल करा लेती है, तो संपत्ति और इस्तेमाल न हुआ विदेशी पैसा वापस किया जा सकता है. लेकिन अगर तय अवधि में ऐसा नहीं हुआ तो संपत्ति स्थायी रूप से नामित प्राधिकरण के पास चली जाएगी. यही वह प्रावधान है जिसने सबसे ज्यादा विवाद पैदा किया है.

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नामित प्राधिकरण को कितनी शक्ति मिलेगी?
विधेयक के अनुसार नामित प्राधिकरण को संपत्तियों की देखरेख, प्रबंधन, सुरक्षा, संरक्षण और जरूरत पड़ने पर संबंधित संस्था की गतिविधियों के प्रबंधन की जिम्मेदारी भी दी जा सकती है. विधेयक में इस प्राधिकरण को कुछ मामलों में दीवानी अदालत जैसी शक्तियां भी देने का प्रस्ताव है. वह लोगों को बुला सकता है, दस्तावेज मांग सकता है और संपत्ति तथा खातों की जांच कर सकता है.
यानी रजिस्ट्रेशन खत्म होने के बाद संस्था के पास मौजूद विदेशी चंदे से बनी संपत्ति पर नियंत्रण पहले जैसा नहीं रहेगा.
अगर जमीन का कुछ पैसा विदेशी था और कुछ भारतीय?
प्रस्तावित प्रावधान के अनुसार अगर कोई संपत्ति पूरी तरह विदेशी चंदे से नहीं बनी बल्कि उसका कुछ हिस्सा विदेशी चंदे और कुछ हिस्सा दूसरे स्रोतों से आया है, तब भी शुरुआत में पूरी संपत्ति नामित प्राधिकरण के पास जा सकती है. हालांकि संस्था उस हिस्से को वापस लेने का दावा कर सकती है जिसे अलग और स्पष्ट रूप से दूसरे स्रोतों से आया हुआ साबित किया जा सके. यही वजह है कि आलोचक पूछ रहे हैं कि संपत्ति के वास्तविक हिस्से का निर्धारण कैसे होगा और इस प्रक्रिया में संस्था को कितना समय और कितना कानूनी संरक्षण मिलेगा.

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चर्च और पूजा स्थलों को लेकर सरकार ने क्या कहा?
यह विवाद का दूसरा बड़ा हिस्सा है. ईसाई संस्थाओं की चिंता है कि विदेशी चंदे से बने चर्च या दूसरे धार्मिक स्थल भी इस व्यवस्था की चपेट में आ सकते हैं.
हालांकि, केंद्र सरकार ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि पूजा स्थल का धार्मिक स्वरूप खत्म नहीं किया जाएगा.
विधेयक में लिखा है कि अगर स्थायी रूप से नामित प्राधिकरण के पास गई संपत्ति पूजा स्थल है, तो उसके प्रबंधन की व्यवस्था इस तरह की जाएगी कि उसका धार्मिक चरित्र बरकरार रहे.
सरकार का कहना है कि इसका मतलब यह है कि किसी चर्च को स्कूल या किसी सरकारी कार्यालय में बदल देने जैसी स्थिति नहीं बनेगी.
सरकार ने यह भी कहा है कि एफसीआरए किसी एक धर्म पर लागू नहीं होता. धार्मिक शिक्षा, पूजा स्थलों का रखरखाव और दूसरे धार्मिक कल्याण कार्य सभी समुदायों के लिए नियमों के तहत पात्र रह सकते हैं.

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सरकार का सबसे बड़ा तर्क क्या है?
केंद्र सरकार कह रही है कि यह प्रावधान पहली बार संपत्ति को सरकार के नियंत्रण में लाने की कोशिश नहीं है. सरकार के मुताबिक 2010 के एफसीआरए कानून की धारा 15 में भी विदेशी चंदे से बनी संपत्ति के रजिस्ट्रेशन रद्द होने की स्थिति में निर्धारित प्राधिकरण के पास जाने की व्यवस्था थी. 2026 का विधेयक इस व्यवस्था को अधिक स्पष्ट और विस्तृत बनाता है.
फर्क यह है कि नया विधेयक संपत्ति की देखरेख, प्रबंधन, अस्थायी नियंत्रण और आगे के निपटारे की विस्तृत प्रक्रिया बनाता है. साथ ही रजिस्ट्रेशन वापस होने या नवीनीकरण होने पर संपत्ति लौटाने और लंबे समय तक बहाली न होने पर स्थायी व्यवस्था का प्रस्ताव करता है.
सरकार का कहना है कि पुरानी व्यवस्था में संपत्ति के भविष्य को लेकर व्यावहारिक और प्रशासनिक अस्पष्टता थी.

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क्या सरकार किसी संस्था की पूरी संपत्ति जब्त कर लेगी?
सरकार का जवाब है, नहीं. सरकार के अनुसार केवल वही संपत्तियां इसके दायरे में आएंगी जो विदेशी चंदे से बनी हैं.
लेकिन विधेयक का मूल पाठ यह भी कहता है कि अगर कोई संपत्ति विदेशी और दूसरे स्रोतों से मिलकर बनी है तो शुरुआत में पूरी संपत्ति नामित प्राधिकरण के पास जा सकती है. दूसरे स्रोतों से आए हिस्से को अलग से साबित करने पर उसे वापस लेने का रास्ता रखा गया है.
इसलिए यहां सरकार की व्याख्या और आलोचकों की चिंता के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर है.
सरकार इसे संपत्ति की सुरक्षा और प्रबंधन की व्यवस्था कह रही है. आलोचक इसे संपत्ति पर सरकारी नियंत्रण की व्यापक शक्ति मान रहे हैं.
क्या रजिस्ट्रेशन खत्म होते ही संपत्ति हमेशा के लिए चली जाएगी?
नहीं. जैसा कि ऊपर बताया गया है विधेयक में पहले अस्थायी नियंत्रण का प्रावधान है. यानी संस्था को नया रजिस्ट्रेशन लेने, नवीनीकरण कराने या रजिस्ट्रेशन बहाल कराने का मौका मिलेगा. इसे तय अवधि के भीतर करना होगा. अगर रजिस्ट्रेशन बहाल हो गया तो संपत्ति वापस मिल जाएगी. लेकिन अगर संस्था तय अवधि में रजिस्ट्रेशन बहाल नहीं करा पाती तो संपत्ति स्थायी रूप से नामित प्राधिकरण के पास चली जाएगी.
इसके बाद सरकार या संबंधित सरकारी संस्था उसे सार्वजनिक उद्देश्य के लिए इस्तेमाल कर सकती है. जरूरत पड़ने पर उसे बेचा भी जा सकता है और बिक्री से मिलने वाली रकम भारत की संचित निधि में जमा करने का प्रस्ताव है.

संस्था को अदालत जाने का अधिकार भी होगा?
हां. सरकार के मुताबिक विधेयक में नामित प्राधिकरण के फैसले के खिलाफ पुनर्विचार और न्यायिक अपील का रास्ता रखा गया है. विधेयक के अनुसार नामित प्राधिकरण अपने आदेश की 90 दिन के भीतर समीक्षा कर सकता है. इसके अलावा प्रभावित व्यक्ति 90 दिन के भीतर जिला न्यायाधीश की अदालत में अपील कर सकता है. सरकार इसे न्यायिक निगरानी की सुरक्षा के रूप में पेश कर रही है.
आलोचकों का सवाल हालांकि यह है कि संपत्ति पर शुरुआती नियंत्रण प्रशासनिक प्राधिकरण के पास जाने के बाद न्यायिक राहत कितनी जल्दी और प्रभावी तरीके से मिल पाएगी. इस मुद्दे पर विस्तृत संसदीय चर्चा की मांग की जा रही है.
यह बात समझना सबसे जरूरी है. अगर किसी संस्था का एफसीआरए रजिस्ट्रेशन खत्म हो गया तो यह जरूरी नहीं कि संस्था ने धोखाधड़ी की है.
हालांकि इस विधेयक में रजिस्ट्रेशन रद्द करने का प्रावधान है. संस्था खुद रजिस्ट्रेशन वापस कर सकती है. रजिस्ट्रेशन का नवीकरण नहीं हो सकता या नवीकरण का आवेदन खारिज हो सकता है. विधेयक ऐसी स्थितियों को भी संपत्ति के अस्थायी नियंत्रण से जोड़ता है.
यही वजह है कि विरोध कर रहे संगठन कह रहे हैं कि केवल रजिस्ट्रेशन की प्रशासनिक स्थिति बदलने से इतनी बड़ी संपत्ति पर सरकारी नियंत्रण क्यों हो. जिस पर सरकार का जवाब है कि रजिस्ट्रेशन समाप्त होने के बाद विदेशी चंदे से बनी संपत्तियों को अनिश्चितकाल तक बिना स्पष्ट कानूनी व्यवस्था के नहीं छोड़ा जा सकता.

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2026 में एफसीआरए के नियम भी बदले हैं
एफसीआरए के नियमों में कई अहम बदलाव किए गए हैं. अब रजिस्ट्रेशन में संस्था को यह अधिक स्पष्ट रूप से बताना होगा कि वह किस उद्देश्य के लिए और किन राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों में विदेशी पैसा इस्तेमाल करेगी. धार्मिक गतिविधियों के लिए भी स्वीकार्य उद्देश्यों को स्पष्ट रूप से सूचीबद्ध किया गया है.
नवीनीकरण के लिए पिछले दो वर्षों में कम से कम 10 लाख रुपये के विदेशी अंशदान के इस्तेमाल का प्रमाण देने की शर्त रखी गई है.
वार्षिक रिपोर्ट में परियोजना और गतिविधि के स्तर पर धन के इस्तेमाल तथा अंतिम विदेशी दानदाता की जानकारी देने की व्यवस्था भी मजबूत की गई है.
सरकार इसे धर्म विरोधी क्यों नहीं मानती?
केंद्र का कहना है कि कानून किसी धर्म को अलग से नहीं देखता. सरकार के अनुसार एफसीआरए के तहत नियम सभी संगठनों पर समान रूप से लागू होते हैं. सरकार ने यह भी कहा है कि नए नियमों में धार्मिक गतिविधियों के स्वीकार्य रूपों को स्पष्ट रूप से सूचीबद्ध किया गया है.
इसमें पूजा स्थलों का रखरखाव, धार्मिक शिक्षा, नैतिक शिक्षा, ध्यान और धार्मिक परंपराओं के संरक्षण जैसे काम शामिल हैं.

गृह मंत्री अमित शाह ने ईसाई प्रतिनिधियों से हुई बैठकों में भी विधेयक को धर्मनिरपेक्ष बताते हुए आश्वासन दिया कि सरकार का उद्देश्य ईसाई संस्थाओं को निशाना बनाना नहीं है.
यही कारण है कि सरकार कह रही है कि विधेयक को धार्मिक चश्मे से देखना सही नहीं होगा.
फिर ईसाई संस्थाओं को इतनी चिंता क्यों है?
ईसाई संस्थाओं का तर्क है कि भारत में चर्च आधारित संस्थाएं सिर्फ पूजा तक सीमित नहीं हैं. उनके पास अस्पताल, स्कूल, कॉलेज, छात्रावास, अनाथालय, बुजुर्गों के लिए संस्थान, ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्र और सामाजिक सेवा संस्थाएं भी हैं. इनमें से कई संस्थाओं को विदेश से चंदा मिलता है.
ऐसी स्थिति में यदि किसी संस्था का एफसीआरए रजिस्ट्रेशन खत्म हो जाता है तो विदेशी चंदे से बनी संपत्तियों पर उसका नियंत्रण प्रभावित हो सकता है.
ईसाई प्रतिनिधियों का सवाल है कि किसी संस्था का रजिस्ट्रेशन विवाद में होने पर उसके अस्पताल या स्कूल का प्रबंधन किसी सरकारी नामित प्राधिकरण को क्यों दिया जाए.
यही चिंता मिजोरम और मेघालय जैसे राज्यों में ज्यादा दिखाई दे रही है, जहां चर्च संस्थाएं शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में बड़ी भूमिका निभाती हैं.

मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा
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मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा क्यों मैदान में उतरे?
मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने बीते हफ्ते केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की थी. उन्होंने ईसाई समुदाय के विभिन्न प्रतिनिधियों के साथ विधेयक के प्रावधानों पर चिंता जताई. सोमवार को उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए केंद्र से अपील की कि विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा जाए.
उनका तर्क है कि अलग-अलग राज्यों और समाज के अलग-अलग पक्षों से सुझाव लेने के बाद कानून को अंतिम रूप देना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिहाज से बेहतर होगा.
मिजोरम में चर्च और सामाजिक संस्थाओं की भूमिका काफी महत्वपूर्ण है, इसलिए राज्य सरकार इस मुद्दे पर विशेष रूप से सक्रिय है.
ईसाई संगठनों ने भी एक साथ आवाज क्यों उठाई?
कई प्रमुख ईसाई संगठनों ने सोशल मीडिया के जरिए गृह मंत्री और केंद्र सरकार से विधेयक को रोकने या संयुक्त संसदीय समिति को भेजने की अपील की. इनमें कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया, नेशनल काउंसिल ऑफ चर्चेज इन इंडिया और काउंसिल ऑफ चर्चेज इन मिजोरम जैसे संगठन शामिल हैं.
इनका कहना है कि वे विदेशी चंदे में पारदर्शिता और जवाबदेही के खिलाफ नहीं हैं. पर उनकी मुख्य चिंता यह है कि संपत्ति संबंधी प्रावधानों से संस्था की स्वायत्तता और लंबे समय से चल रहे स्कूल, अस्पताल और सामाजिक सेवा संस्थानों के काम पर असर पड़ सकता है.
कांग्रेस का विरोध किस बात पर है?
कांग्रेस ने भी यह स्पष्ट कर दिया है कि वो इस विधेयक का विरोध करेगी. पार्टी का आरोप है कि सरकार गैर सरकारी संगठनों और अल्पसंख्यक संस्थाओं पर जरूरत से ज्यादा नियंत्रण स्थापित करना चाहती है.
कांग्रेस ने अपने सभी सांसदों के लिए 10 से 12 अगस्त तक संसद में मौजूद रहने का व्हिप जारी किया है. पार्टी ने 2023 में विपक्षी सांसदों के निलंबन के दौरान कई महत्वपूर्ण कानूनों के पारित होने का उदाहरण देते हुए कहा है कि इतिहास दोहराया नहीं जाना चाहिए.
क्या यह विधेयक पिछली संपत्तियों पर भी असर डाल सकता है?
यह एक और अहम सवाल है जिसकी चर्चा कम हो रही है. संशोधन विधेयक में एक संक्रमणकालीन (बदलाव या परिवर्तन के दौर का) प्रावधान भी है, जिसके तहत पहले से मौजूदा कानून की धारा 15 के तहत नामित प्राधिकरण में निहित विदेशी चंदे और संपत्तियों को नए ढांचे के तहत अस्थायी रूप से नामित प्राधिकरण में माना जा सकता है. लिहाजा यह संशोधन विधेयक भविष्य में बनने वाली संपत्तियों का मामला केवल नहीं है. इस प्रावधान की व्याख्या और इसका वास्तविक असर भी संसदीय बहस का महत्वपूर्ण विषय हो सकता है.
सरकार के पक्ष में एक और बड़ा बदलाव भी है
विधेयक में सिर्फ सख्ती ही नहीं बढ़ाई गई है. एक महत्वपूर्ण बदलाव दंड से जुड़ा है. मौजूदा व्यवस्था में एफसीआरए के उल्लंघन पर अधिकतम पांच साल तक की जेल का प्रावधान है. संसदीय कामकाज का अध्ययन करने वाली संस्था पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के मुताबिक 2026 के विधेयक में इसे घटाकर अधिकतम एक साल करने का प्रस्ताव है. इसके अलावा एफसीआरए से जुड़े अपराध की जांच शुरू करने से पहले केंद्र सरकार की मंजूरी की व्यवस्था प्रस्तावित है. सरकार इसे अनुपालन व्यवस्था को अधिक संतुलित बनाने का तर्क देती है.
एफसीआरए के आंकड़े क्या कहते हैं?
गृह मंत्रालय के अनुसार 2019 से 2022 के बीच 13,520 संगठनों को करीब 55,741 करोड़ रुपये का विदेशी अंशदान मिला. 15 जुलाई 2026 तक एफसीआरए के तहत 14,449 सक्रिय रजिस्ट्रेशन हैं. वहीं 22,498 रजिस्ट्रेशन रद्द और 15,212 समाप्त बताए गए हैं. इसलिए कानून में संपत्ति से जुड़ा कोई भी बड़ा बदलाव हजारों संस्थाओं और उनके स्कूलों, अस्पतालों तथा सामाजिक सेवा ढांचे को प्रभावित कर सकता है.
अब चूंकि संसद का मानसून सत्र 13 अगस्त तक चलना है और 12 अगस्त को इसे चर्चा के लिए लाए जाने की संभावना है. हालांकि अंतिम दिनों में इसकी कार्यसूची को लेकर अनिश्चितता भी बनी हुई है. तो ऐसे में आने वाले तीन दिनों में यही देखने वाली बात होगी कि क्या सरकार इस संशोधन विधेयक को इसके मौजूदा स्वरूप में आगे बढ़ाएगी या उसमें बदलाव करती है या उसे संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजती है.
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