- केंद्रीय मंत्री किरेन रिजीजू के बयान के बाद अब राहुल गांधी पर विशेषाधिकार हनन की तलवार लटकती दिख रही है
- संसद, विधानसभा और विधान परिषद के सदस्यों को कर्तव्यों के पालन के लिए कुछ विशेष अधिकार और छूट मिली हुई हैं
- ईनके उल्लंघन करने या सदन या सदस्यों की गरिमा को ठेस पहुंचाने को विशेषाधिकार हनन कहा जाता है
लोकसभा में बजट सत्र के दौरान विपक्षी कांग्रेस पार्टी के नेता राहुल गांधी के तीखे तेवरों ने सियासी माहौल गर्मा दिया है. केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजीजू के हालिया बयान के बाद अब राहुल गांधी पर विशेषाधिकार हनन की तलवार लटकती दिख रही है. अगर यह प्रस्ताव सदन में आता है और कार्यवाही आगे बढ़ती है तो राहुल के लिए संसदीय और कानूनी राह काफी चुनौतीपूर्ण हो सकती है. मामला आगे बढ़ा तो उनकी सांसदी भी खतरे में पड़ सकती है.
विशेषाधिकार हनन होता क्या है?
भारत में संसद, विधानसभा और विधान परिषद के सदस्यों को कर्तव्यों का प्रभावी ढंग से पालन सुनिश्चित करने के लिए कुछ विशेष अधिकार और छूट प्रदान की गई हैं. जब सदन जब इन विशेषाधिकारों का उल्लंघन होता है या किसी भी तरह से सदन या उसके सदस्यों की गरिमा को ठेस पहुंचाई जाती है, तो उसे विशेषाधिकार हनन कहा जाता है.
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इसकी प्रक्रिया क्या है?
- विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव की शुरुआत स्पीकर को लिखित नोटिस दिए जाने से होती है.
- नोटिस मिलने पर स्पीकर तय करेंगे कि मामला विशेषाधिकार हनन का बनता है या नहीं.
- अगर लोकसभा अध्यक्ष नोटिस स्वीकार करते हैं तो उसे विशेषाधिकार समिति के पास भेजा जा सकता है.
समिति करेगी जांच
अगर स्पीकर मामले को विशेषाधिकार समिति को सौंपते हैं तो प्रक्रिया कुछ ऐसे होगी. समिति राहुल गांधी को नोटिस भेजकर उन बयानों का आधार पूछेगी जो उन्होंने सदन में दिए हैं. उन्हें अपनी बात साबित करने के लिए दस्तावेजी सबूत देने होंगे. राहुल को समिति के सामने पेश होकर अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाएगा. समिति तीखे सवाल पूछ सकती है कि बिना नोटिस के मंत्रियों पर आरोप क्यों लगाए. विशेषाधिकार समिति मामले से जुड़े अधिकारियों या अन्य सदस्यों को भी पूछताछ के लिए बुला सकती है.
क्या होती है कार्रवाई?
अपनी जांच पूरी करने के बाद समिति एक रिपोर्ट तैयार करती है और उसे सदन के पटल पर रखती है. दोषी पाए जाने पर भी समिति खुद सजा नहीं देती बल्कि सजा की सिफारिश करती है. समिति ये सुझाव दे सकती है:
- चेतावनीः विशेषाधिकार समिति दोषी पाए जाने पर राहुल गांधी को चेतावनी देने या फटकार लगाने की सिफारिश कर सकती है.
- खेद जताना: अगर ज्यादा गंभीर नहीं लगे तो समिति उन्हें सदन में बिना शर्त माफी मांगने या खेद जताने का निर्देश दे सकती है.
- निलंबन: मामला गंभीर लगने पर समिति उन्हें कुछ दिनों या पूरे सत्र के लिए सदन की कार्यवाही से अलग रखने की सिफारिश कर सकती है.
- निष्कासन: बेहद गंभीर मामलों में समिति सदस्यता रद्द करने की भी सिफारिश कर सकती है. इसे सदन में वोटिंग के जरिए लागू किया जाता है.
- जेल की सजाः बेहद ही गंभीर मामलों में सदन संबंधित सांसद को कारावास की सजा भी सुना सकता है. हालांकि ऐसा दुर्लभ मामलों में ही होता है.
पहले इन पर गिरी गाज
भारत के संसदीय इतिहास में ऐसे कई उदाहरण रहे हैं, जब विशेषाधिकार हनन या सदन की अवमानना के मामले में सांसदों पर गाज गिरी है.
इंदिरा गांधी (1978): लोकसभा की विशेषाधिकार समिति ने इंदिरा गांधी को 1975 के एक मामले में सदन की अवमानना और विशेषाधिकार हनन का दोषी पाया था. न सिर्फ उनकी सदस्यता रद्द की गई बल्कि सत्र खत्म होने तक उन्हें जेल भी भेजा गया था.
सुब्रमण्यम स्वामी (1976): इमरजेंसी के दौरान सुब्रमण्यम स्वामी पर आरोप लगा कि उन्होंने विदेश में रहकर भारत विरोधी प्रचार किया और सदन की गरिमा को ठेस पहुंचाई. विशेषाधिकार समिति की रिपोर्ट के आधार पर उन्हें राज्यसभा से निष्कासित कर दिया गया था.
कैश फॉर क्वेरी मामला (2005): संसद में सवाल पूछने के बदले पैसे लेने के स्टिंग में फंसे 11 सांसदों की सदस्यता एक झटके में खत्म कर दी गई थी. विशेषाधिकार समिति और पवन बंसल समिति की सिफारिशों के आधार पर सदन ने इसे सदन की अवमानना माना था.
सदन के अंदर दिए गए बयानों पर अदालती कार्यवाही नहीं होती, लेकिन विशेषाधिकार हनन की कार्यवाही की जा सकती है. इस मामले में अध्यक्ष का निर्णय सर्वोपरि होता है. किरेन रिजिजू के कड़े रुख से साफ है कि सरकार इस बार राहुल गांधी को नियमों के घेरे में कसने की पूरी तैयारी कर चुकी है.
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