"जब मानसून सीजन के दौरान El Nino या दूसरी वजहों से औसत से कम बारिश होती है, तो मानसून का सरकुलेशन कमजोर रहता है. इसकी वजह से वेस्टर्न डिस्टरबेंस का असर हिमालय क्षेत्र में बढ़ जाता है, और कभी-कभी बारिश की तीव्रता बढ़ने से कहीं-कहीं क्लाउडबर्स्ट या भारी बारिश रिकॉर्ड होती है. इसकी वजह से Glacial lakes में भी पानी भर जाता है और Glacial Lake Outburst Flood डिज़ास्टर का खतरा बढ़ जाता है", एनडीटीवी से एक्सक्लूसिव बातचीत में भारत मौसम विभाग के डायरेक्टर जनरल डॉ. एम मोहपात्रा ने ये अहम बात कही.
भारत मौसम विभाग के वैज्ञानिकों के अनुसार, जब मौसम में El Nino का असर ज्यादा रहता है तो इसकी वजह से एयर टेंपरेचर बढ़ता है, और क्लाइमेट चेंज की वजह से भी तापमान में बढ़ोतरी होती है.
मौसम के इस बदलते ट्रेंड का असर यह होता है कि ग्लेशियर के पिघलने पर इसका दुगुना असर पड़ता है जिसकी वजह से Multi Hazard incidents की स्थिति उत्पन्न हो जाती है.
डॉ. मोहपात्रा के मुताबिक, हिमालय क्षेत्र में क्लाइमेट चेंज का बहुत ज्यादा असर हो रहा है. हाल में यह देखा गया है कि सर्दी के महीनों में हिमालय क्षेत्र में बारिश और बर्फ़बारी घटती जा रही है.
साथ ही, हिमालय के इलाकों में तापमान में बढ़ोतरी ज्यादा हो रही है. इसकी वजह से ग्लेशियर के तेजी से पिघलने से भी Glacial Lakes में पानी का स्तर बढ़ जाता है, और इसके साथ ही इनके टूटने का खतरा भी.
इस बढ़ते खतरे को देखते हुए भारत सरकार की तरफ से कदम उठाए जा रहे हैं. सरकार की तैयारी हिमालय क्षेत्र में मेट्रोलॉजिकल मॉनिटरिंग सिस्टम के अलावा हाइड्रोलॉजिकल मॉनिटरिंग, क्रायोस्फेरिक मॉनीटरिंग geophysical processes की मॉनिटरिंग व्यवस्था को और कारगर बनाने की है क्योंकि हिमालय क्षेत्र में यह चारों प्रक्रिया इंटरेक्ट करते हैं.
"मिशन मौसम" के तहत हिमालय क्षेत्र में नए वेदर स्टेशन सेटअप किये जा रहे हैं, और सभी स्टेकहोल्डर सरकारी एजेंसियां ग्लेशियर के पिघलने से बढ़ते खतरे से निपटने के लिए नयी रणनीति पर काम कर रही हैं.
इस नयी योजना के तहत पूरे हिमालय क्षेत्र के सभी संवेदनशील इलाकों में Early Warning Systems और नए वैदर स्टेशन की संख्या बढ़ाई जा रही है. साथ ही, वहां नए डोपलर रडार के साथ साथ ऑटोमेटेड वैदर स्टेशन और ओटोमेटेड स्नो वैदर स्टेशन की संख्या भी बढ़ाई जाएगी.
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