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This Article is From Dec 02, 2025

ला-नीना इफेक्ट के कारण उत्तर भारत को जमाएगी ठंड, दिल्ली को लेकर भी विशेषज्ञों ने किया अलर्ट

मौसम विभाग के मुताबिक इस साल नवंबर का आसत तापमान में भी 1-2 डिग्री तापमान कम रहा है.बताया जा रहा है कि प्रशांत महासागर में ला-नीना के प्रभाव के चलते दिसंबर से फरवरी के बीच औसत तापमान सामान्य से कम रह सकता है.

ला-नीना इफेक्ट के कारण उत्तर भारत को जमाएगी ठंड, दिल्ली को लेकर भी विशेषज्ञों ने किया अलर्ट
  • इस बार दिल्ली-एनसीआर समेत पूरे उत्तर भारत में ला-नीना प्रभाव के कारण कड़ाके की ठंड पड़ने की संभावना है
  • विशेषज्ञों के अनुसार दिसंबर से फरवरी तक तापमान सामान्य से कम रह सकता है और ठंड के दिन बढ़ सकते हैं
  • नवंबर में उत्तर भारत का औसत तापमान सामान्य से एक से दो डिग्री कम दर्ज किया गया है
नई दिल्ली:

इस बार दिल्ली-एनसीआर समेत पूरे उत्तर भारत में कड़ाके की ठंड पड़ने की संभावना है. विशेषज्ञों के अनुसार इस बार उत्तर भारत में ला-नीना का इफेक्ट देखने को मिलेगा, जिसकी वजह से पिछली बार की तुलना में तापमान में ज्यादा गिरावट दर्ज की जा सकती है. जानकारों की मानें तो इस साल 15 दिसंबर तक तापमान और गिर सकता है. कहा जा रहा है कि ला-नीला प्रभाव के कारण दिसंबर से फ़रवरी तक ठंड रहेगी और इस बीच कड़ाके की ठंड के दिन भी बढ़ सकते हैं. स्काइ मेट के प्रेसिडेंट जीपी शर्मा ने NDTV से खास बातचीत में कहा कि प्रशांत महासागर में ला नीना प्रभाव के चलते इस साल ठंड ज्यादा दिन तक रहेगी.

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हालांकि, वो मानते हैं कि कड़ाके की ठंड 10-12 दिन के पैच में पड़ सकती है.लेकिन फ़िलहाल 15 दिसंबर तक मौसम में कोई बड़ा बदलाव नहीं देखते को मिलेगा. उनका कहना है कि कश्मीर से हिमाचल तक में जब बर्फबारी होती है, तो उसका असर पूरे उत्तरी भारत ख़ासतौर पर दिल्ली पर पड़ता है. मौसम आगे भी ऐसा ही बना रहा तो उत्तर भारत में 15 से 20 दिसंबर तक तापमान ज्यादा गिर सकता है. 

आपको बता दें कि मौसम विभाग के मुताबिक इस साल नवंबर का आसत तापमान में भी 1-2 डिग्री तापमान कम रहा है.बताया जा रहा है कि प्रशांत महासागर में ला-नीना के प्रभाव के चलते दिसंबर से फरवरी के बीच औसत तापमान सामान्य से कम रह सकता है. इससे पूर्वांचल के दक्षिणी हिस्से को छोड़कर अधिकांश क्षेत्रों में शीतलहर के दिनों में दो से पांच दिन का इजाफा होने की संभावना है.

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ला नीना क्या होता है ? 

अल नीनो का असर जब अपने चरण पर पहुंच जाता है तो फिर ला नीनो कहा जाता है. इससे होता ये है कि जो ट्रेड विंड्स दक्षिण अमेरिका से ऑस्ट्रेलिया और एशिया की तरफ चल रहीं थी वो पहले की तुलना में और तेज चलने लगती हैं. इसका असर ये होता है कि दक्षिण अमेरिका के तटों के पास समुद्र का ठंडा पानी समुद्र के तल से और तेजी से ऊपर की तरफ आता है. वहीं, दूसरी तरफ समुद्र की सतह पर जो गरम पाना था वह मजबूत ट्रेड विंड्स की वजह से ऑस्ट्रेलिया और एशिया के देशों की तरफ तेजी से बढ़ती है और फिर इन महाद्वीप के देशों में जबरदस्त बारिश होती है. मौसम वैज्ञानिक मानते हैं कि अल नीनो की तुलना में ला नीना का चक्र थोड़ा लंबा होता है. ये एक से चार साल तक भी चल सकते हैं. 

क्या है अल नीनो इफेक्ट? 

सरल शब्दों में अगर इसे समझना चाहें तो हम कहेंगे कि ये वातावरण में होने वाला एक ऐसा बदलाव है जो समुद्र की सतह पर चलने वाली हवाओं से तय होता है. 

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