- पुरानी दिल्ली में 103 सालों से चली आ रही इस रामलीला में पारंपरिक लकड़ी के रथ का उपयोग होता है
- यह रामलीला धार्मिक आयोजन के साथ-साथ इतिहास और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का एक महत्वपूर्ण माध्यम भी है
- लकड़ी के रथ को इंसानी ताकत और रस्सियों की मदद से खींचा जाता है, जिससे परंपरागत कारीगरी की याद ताजा होती है
दिल्ली में रामलीला का मंचन अब आधुनिक तकनीक और भव्य सजावट के साथ किया जा रहा है, लेकिन पुरानी दिल्ली में एक ऐसी रामलीला भी है, जहां आधुनिकता के बीच इतिहास आज भी अपनी पुरानी पहचान के साथ जिंदा है. ऐतिहासिक लाल किले के करीब, पुरानी दिल्ली की गलियों में 103 साल पुरानी परंपरा आज भी कायम है. यहां रामलीला के मंच पर सिर्फ भगवान राम की लीलाओं का मंचन नहीं होता, बल्कि आज़ादी से पहले के दौर की ऐतिहासिक धरोहरों को भी सहेजकर रखा गया है.
लकड़ी का प्राचीन रथ, उसके पुराने पहिए और हाथों से खींचे जाने की परंपरा, इस रामलीला को दूसरी रामलीलाओं से अलग बनाती है.
क्या है इस ऐतिहासिक रथ की खासियत?
पुरानी दिल्ली जहां की गलियां अपने भीतर सदियों का इतिहास समेटे हुए है. इन्हीं ऐतिहासिक गलियों के करीब, लाल किले की छाया में, नवश्री धार्मिक लीला कमेटी की रामलीला एक ऐसी परंपरा को जीवित रखे हुए है, जिसे एक सदी से भी ज्यादा समय से संजोया जा रहा है. यहां रामलीला सिर्फ धार्मिक आस्था का उत्सव नहीं, बल्कि इतिहास और सांस्कृतिक विरासत का भी एक अनूठा संगम है.

इस रामलीला की सबसे खास पहचान है भगवान राम का पारंपरिक लकड़ी का रथ. इसकी खासियत यह है कि रथ की मूल संरचना में आधुनिक मोटर या इंजन का इस्तेमाल नहीं होता. इसे इंसानी ताकत से खींचकर मैदान में आगे बढ़ाया जाता है.
रथ के लकड़ी के पहिए, उसके तख्ते और पारंपरिक बनावट उस दौर की याद दिलाते हैं, जब धार्मिक आयोजनों में आधुनिक मशीनों की जगह इंसानी मेहनत और पारंपरिक कारीगरी की अहम भूमिका होती थी. यह रथ सिर्फ रामलीला का एक हिस्सा नहीं, बल्कि उस विरासत का प्रतीक है, जिसे पीढ़ी दर पीढ़ी सहेजने की कोशिश की जा रही है.
रामलीला के युद्ध प्रसंगों में इन रथों की भूमिका और भी खास हो जाती है. एक ओर भगवान राम और लक्ष्मण का रथ, तो दूसरी ओर रावण और उसकी सेना का रथ. मैदान में रथों की आवाजाही और युद्ध के दृश्यों के बीच कलाकारों का अभिनय रामायण के प्रसंगों को जीवंत कर देता है.

खास बात यह है कि इन रथों को चलाने के लिए आधुनिक इंजन पर निर्भर रहने के बजाय पारंपरिक तरीके से रस्सियों और इंसानी ताकत का सहारा लिया जाता है. पुरानी दिल्ली की इस रामलीला में लकड़ी का यह रथ सिर्फ भगवान राम की सवारी नहीं, बल्कि इतिहास की चलती-फिरती निशानी है.
आधुनिक तकनीक के इस दौर में भी जब इसे इंसानी ताकत से खींचा जाता है, तो यह परंपरा हमें अपने अतीत से जोड़ती है. यहां रामलीला के जरिए भगवान राम की कथा तो सुनाई ही जाती है, साथ ही हमारी सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की कोशिश भी की जाती है.
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