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बच्चों को निगलते दिल्ली के गड्ढे-नाले....डेढ़ महीने में छह डूबे मगर सबक नहीं ले रहीं एजेंसियां!

तेज बारिश के कारण दिल्ली के गड्ढे-नालों में पानी भर जाता है और कभी खेल-खेल में तो कभी अनजाने में बच्चे गिर जाते हैं और डूबने से उनकी मौत हो जाती है.

बच्चों को निगलते दिल्ली के गड्ढे-नाले....डेढ़ महीने में छह डूबे मगर सबक नहीं ले रहीं एजेंसियां!
जसोला में एक बच्चा नाले में गिर गया था, 4 दिन बाद उसकी लाश मिली.
PTI
  • दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में बारिश के कारण खुले नालों और गड्ढों में गिरकर छह बच्चों की मौत हुई है
  • बच्चों की मौत के बाद जिम्मेदार एजेंसियों की लापरवाही और खुले गड्ढों पर सुरक्षा व्यवस्था न होने का आरोप लगा
  • दिल्ली सरकार के आंकड़ों के अनुसार दो साल में डूबने से 89 लोगों की मौत हुई है
नई दिल्ली:

जसोला...मुखमेलपुर...बवाना...समयपुर बादली...ये राजधानी दिल्ली के अलग-अलग इलाके हैं लेकिन इनमें एक बात कॉमन है. बीते डेढ़ महीने में इन इलाकों में अलग-अलग घटनाओं में छह बच्चे बारिश के चलते लबालब भरे नालों या खुले गड्ढ़ों में गिरकर अपनी जान गंवा बैठे.
 

  • 10 जुलाई: समयपुर बादली में एक खाली प्लॉट में 7 साल का रेहान शौच के लिए गया था, तभी उसका पैर फिसल गया और वह पास ही बारिश के पानी से भरे गड्ढे में डूब गया. 
  • 12 जुलाई: मुखमेलपुर गांव के हिरनकी रोड के पास खेत में पानी भर गया था. तीन बच्चे खेलने के लिए आए. उनमें से दो आयुष और नितिन की गड्ढे में डूबने से मौत हो गई.
  • 13 अगस्त: बवाना में डीडीए फ्लैट के पास एक गड्ढे में पानी भर गया. दो बच्चे खेलने और तैरने के लिए उसमें कूदे लेकिन डूब गए. एक की उम्र 9 साल तो दूसरे की 10 साल थी.
  • 22 अगस्त: जसोला इलाके में 15 साल का मिथुन एक खुले नाले में गिर गया और बह गया. करीब 4 दिन बाद 25 अगस्त को उसकी लाश मिली.

यानी 10 जुलाई से 25 अगस्त के बीच दिल्ली में 6 बच्चे सिर्फ इसलिए काल के गाल में समा गए क्योंकि जिम्मेदार एजेंसियां लापरवाही ओढ़े बैठी रहीं. जैसे, बवाना में 13 अगस्त को दो बच्चों की मौत के बाद परिवार वालों ने डीडीए पर लापरवाही का आरोप लगाया कि जगह-जगह गड्ढे खोदने के बाद डीडीए ने उन्हें खुला छोड़ दिया. 

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वहीं जसोला में 15 साल के मिथुन की लाश मिलने के बाद दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने चीफ सेक्रेटरी से रिपोर्ट मांगी और दिल्ली नगर निगम ने ड्यूटी में लापरवाही के आरोप में एक जूनियर इंजीनियर को सस्पेंड कर दिया.

इसी साल जनवरी में दिल्ली सरकार ने विधानसभा में कुछ आंकड़े रखे थे. इनमें बताया था कि जनवरी 2024 से दिसंबर 2025 तक यानी दो साल में दिल्ली में दुर्घटनाओं और प्राकृतिक आपदाओं के चलते 239 लोगों की जान गई. इनमें से 89 लोगों की मौत डूबने से हुई.

हैरान करने वाली बात ये है कि ये मौतें किसी नदी-तालाब में डूबने से नहीं हुईं, बल्कि खराब ड्रेनेज सिस्टम की वजह से शहरी इलाकों में हुईं. सरकारी आंकड़ों में उन हॉटस्पॉट भी पहचान की गई. इनमें सरिता विहार अंडरपास, अली विहार के पास बारात घर, कालिंदी कुंज नहर, डीएनडी फ्लाईओवर और जैतपुर शामिल हैं.

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) का डेटा भी डराने वाला है. NCRB की रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 में खुले गड्ढे या नालों में गिरने से 192 लोगों की मौत हो गई थी. इनमें से 20 बच्चे थे.

वहीं, किसी भी जल निकाय में दुर्घटनावश गिरने से 31 हजार 210 लोगों की मौत हुई, जिनमें 4,589 बच्चे थे. इस हिसाब से जल निकाय में दुर्घटनावश गिरने से मरने वालों में लगभग 15 फीसदी बच्चे होते हैं.

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गाइडलाइंस है, कानून है, लेकिन मानता कोई नहीं!

बोरवेल या खुले गड्ढे में गिरकर होने वाली मौतों को रोकने के लिए 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने गाइडलाइंस बनाई थीं. इन गाइडलाइंस को बनाए हुए 16 साल से ज्यादा हो चुके हैं लेकिन ऐसी घटनाओं का बार-बार होना सुप्रीम कोर्ट के आदेशों और जमीनी हकीकत के बीच एक बड़े फर्क को दिखाता है.

लोकसभा में जब बोरवेल से जुड़ी मौतों के बारे में सवाल पूछा गया तो केंद्र सरकार ने बताया कि 2020 से 2025 के बीच NDRF ने बोरवेल में फंसे बच्चों को बचाने के लिए 37 रेस्क्यू ऑपरेशन चलाए. लेकिन बड़े अफसोस की बात है कि इनमें से सिर्फ 17 ही सफल रहे. इसका मतलब है कि आधे से ज्यादा ऑपरेशन में बच्चों को नहीं बचाया जा सका.

2010 में सुप्रीम कोर्ट ने जो गाइडलाइंस बनाई थीं, उसमें साफ था कि बोरवेल के लिए ड्रिलिंग करने से 15 दिन पहले सूचना देनी होगी. ड्रिलिंग करने वाली एजेंसियों का रजिस्टर्ड होना जरूरी है. साइट पर साइनबोर्ड और कंटीले तारों की बाड़ होनी चाहिए. किसी भी बोरवेल को खुला नहीं छोड़ा जाएगा. यहां तक कि कुएं को भी खुला नहीं छोड़ा जाएगा.

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Photo Credit: PTI

यही नियम खुले गड्ढों और खुले नालों पर भी लागू होते हैं. ज्यादातर जगहों पर न तो कोई साइनबोर्ड होता है और न ही बैरिकेडिंग. इनके बिना खेलते हुए किसी बच्चे का इन गड्ढों या बोरवेल में गिर जाना बहुत आसान है. बारिश में तो ये खुले नाले और खुले गड्ढे और भी बड़ा खतरा बन जाते हैं. पानी भर जाने के कारण दिखाई नहीं पड़ता है कि गड्ढा है या जमीन है? 

दिल्ली जैसे बड़े शहरों में, जहां ड्रेनेज की एक बहुत बड़ी समस्या है और जहां थोड़ी देर की ही बारिश में कई इलाकों में पानी भर जाता है, वहां ऐसी दुर्घटनाएं बढ़ जाती हैं. दिल्ली के ज्यादातर ड्रेनेज में कचरा जमा हुआ रहता है, जिस कारण पानी भी बाहर निकल नहीं पाता और बारिश में पानी जमता रहता है.

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