- दिल्ली में हुई भारी बारिश ने सड़कों और बाजारों में जलभराव की समस्या पैदा कर दी, जिससे जनजीवन प्रभावित हुआ
- दिल्ली का मौजूदा ड्रेनेज सिस्टम सन 1976 में बना था जो अब बढ़ती आबादी और शहरीकरण के अनुरूप नहीं है
- दिल्ली में जलभराव की समस्या का मुख्य कारण पुराना ड्रेनेज सिस्टम, सीवेज नालों में जमा गंदगी और खराब समन्वय है
राजधानी दिल्ली में मंगलवार को कुछ घंटे झमाझम बारिश हुई. हफ्तों बाद दिल्ली में इस तरह की बारिश हुई. बारिश से गर्मी से राहत तो मिली. लेकिन यही बारिश आफत भी लेकर आई. कुछ देर की बारिश ने दिल्ली को 'स्विमिंग पूल' सा बना दिया था. बाजारों में घुटनों तक पानी भर गया था. सड़कों पर पानी जमा हो गया था. गाड़ियों की रफ्तार धीमी हो गई थी.
दिल्ली के सदर बाजार में संकरी गलियों में घुटनों तक पानी भर गया था. गंदे पानी और तैरते कचरे के बीच लोगों, बच्चों और खरीदारों को पानी से होकर गुजरना पड़ा. कई दुकानों में पानी भी घुस गया.
ये सब इसलिए हुआ क्योंकि दिल्ली में अचानक ही कुछ घंटों में बहुत बारिश हो गई. दिल्ली के प्रमुख वेदर स्टेशन सफदरजंग में सुबह 8:30 से शाम 5:30 बजे तक 57.6 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई. पूसा में सबसे ज्यादा 88.5 मिमी बारिश हुई. भारी बारिश के कारण MCD, PWD, NDMC को पानी भरने, पेड़ गिरने और बिजली कटौती से जुड़ी 136 शिकायतें मिल गई थीं.
दिल्लीवालों के लिए जरा सी बारिश में पानी भरने की समस्या से दो-चार होना कोई नई बात नहीं है. तेजी से हो रहे शहरीकरण में थोड़ी सी बारिश से जलभराव की परेशानी आम बात है.
लेकिन ऐसा क्यों...?
दिल्ली देश की राजधानी है लेकिन यहां अभी भी ड्रेनेज का प्लान 50 साल पुराना है. दिल्ली का मौजूदा ड्रेनेज प्लान 1976 में बनाया गया था. तब दिल्ली की आबादी लगभग 60 लाख थी. लेकिन आज दिल्ली की आबादी 2 करोड़ से ज्यादा हो चुकी है और ड्रेनेज सिस्टम वही पुराना है.
दिल्ली का ड्रेनेज मुख्य रूप से 3 नैचुरल बेसिन पर टिका है. ये हैं- नजफगढ़ बेसिन, बारापुला बेसिन और ट्रांस-यमुना बेसिन.
नजफगढ़ बेसिन दिल्ली का सबसे बड़ा बेसिन है, जो पश्चिमी और उत्तर-पश्चिमी दिल्ली के पानी को समेटता है. बारापुला बेसिन दक्षिण और मध्य दिल्ली के पानी की निकासी संभालता है. जबकि, ट्रांस-यमुना बेसिन पूर्वी दिल्ली (यमुना पार के इलाकों) के ड्रेनेज को नियंत्रित करता है.

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दिल्ली सरकार के मुताबिक, पूरी राजधानी में ऐसी 169 जगहें ऐसी हैं जहां पानी जमा होने की समस्या होती है. 2023, 2024 और 2025 के ट्रैफिक पुलिस के डेटा के आधार पर सरकार ने कुल 445 हॉटस्पॉट की पहचान की है, जहां बारिश में पानी भर जाता है.
अब दिक्कत ये है कि दिल्ली का मौजूदा ड्रेनेज सिस्टम औसतन 25 मिमी प्रति घंटे तक की बारिश को संभाल सकता है. लेकिन दिल्ली में अब कम समय में ही इससे ज्यादा बारिश हो जाती है. इससे ड्रेनेज सिस्टम पर दबाव बढ़ता है और पानी भर जाता है.
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क्या सिर्फ ड्रेनेज सिस्टम ही समस्या है?
दिल्ली का 2018 में आया मास्टर प्लान कहता है कि आज दिल्ली जिस ड्रेनेज सिस्टम पर निर्भर है, उसे 1976 में बनाया गया था और तब बारिश की तीव्रता इतनी नहीं होती थी. उस समय दिल्ली का शहरीकरण नहीं हुआ था, आबादी भी कम थी और पक्की सतह भी कम थी. लेकिन आज हालात कुछ और हैं. कम समय में ज्यादा बारिश और बढ़ती आबादी दबाव बढ़ा रही है.
मास्टर प्लान यह भी बताता है कि दिल्ली की ड्रेनेज व्यवस्था कई अलग-अलग एजेंसियों में बंटी हुई है. दिल्ली में 426.5 किलोमीटर नेचुरल ड्रेनेज लाइनें और 3,311.5 किलोमीटर स्टॉर्म वॉटर ड्रेन हैं, जिनका काम MCD, PWD और NDMC जैसी 11 एजेंसियां संभालती हैं. हर एजेंसी अपने जिम्मेदारी संभालती है लेकिन प्राथमिकताएं अलग-अलग होने के कारण को-ऑर्डिनेशन की कमी बनी रहती है. इसका असर ये होता है कि बाढ़ या जलभराव जैसी स्थिति में तेजी से कार्रवाई कर पाना मुश्किल होता है.

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आईआईटी दिल्ली की स्टडी भी बताती है कि दिल्ली में पानी भरने की समस्या सिर्फ बारिश ही नहीं है. स्टडी कहती है कि दिल्ली का लगभग आधा सीवेज बिना ट्रीटमेंट के ही बरसाती नालों में बहा दिया जाता है. इससे नालों में कचरा जमा होता है और वे ब्लॉक हो जाते हैं.
CAG और दिल्ली प्रदूषण कंट्रोल कमेटी (DPCC) की रिपोर्ट में भी सामने आया है कि पुरानी डिजाइन, कचरा, अतिक्रमण और प्रदूषण के कारण नालों की क्षमता लगातार घट रही है. नालों में सीवर का पानी जाने और कचरा जमा होने से नालों में गाद की मात्रा बढ़ती जाती है.
एक कारण ये भी!
2014 में दिल्ली का 'सीवरेज मास्टर प्लान 2031' आया था, जिसमें कहा गया था कि दिल्ली का 50% हिस्सा सीवरेज सिस्टम से नहीं जुड़ा है. इसका मतलब है कि आधी दिल्ली से निकलने वाला सीवेज बरसाती नालों में बहता है.
सड़क किनारे की नालियों में फेंके गए कचरे के साथ सीवेज भी जमा हो जाता है, जिससे नालियों में गाद जम जाती है और वे ब्लॉक हो जाती है.
इन नालियों को हर साल साफ करने की जरूरत है. 2 जुलाई तक अधिकारियों ने नालों से 90 फीसदी गाद निकाल लेने का दावा किया था.
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सरकार क्या कर रही है?
दिल्ली सरकार ने पिछले साल सितंबर में 'ड्रेनेज मास्टर प्लान 2025' को मंजूरी दी थी. ये मास्टर प्लान अगले 30 साल के लिए है. इसके लिए सरकार ने कुल 57,362 करोड़ रुपये रखे हैं.
अभी दिल्ली का ड्रेनेज सिस्टम हर घंटे 25 मिमी तक की बारिश को झेल सकता है, जिसे बढ़ाकर 70 मिमी किया जाएगा. इससे ज्यादा बारिश होने पर भी पानी जमा होने की समस्या कम होने की उम्मीद है.
इस प्लान के तहत दिल्ली के सीवरेज सिस्टम और बरसाती नालों को पूरी तरह अलग किया जाएगा. दिल्ली सरकार इस मास्टर प्लान को 5 अलग-अलग चरणों में लागू करेगी. इस प्लान में दिल्ली को तीन बेसिनों- नजफगढ़, बारापुल्ला और ट्रांस-यमुना में बांटा गया है, जिन्हें आधुनिक हाइड्रोलिक मॉडलिंग और इंजीनियरिंग तकनीकों का इस्तेमाल करके फिर से डिजाइन किया गया है.
सरकार के मुताबिक, पूरी योजना के लगभग पांच साल में पूरा होने की उम्मीद है और इसमें पहले उन इलाकों को प्राथमिकता दी जाएगी जहां बाढ़ का सबसे ज्यादा खतरा है.

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मास्टर प्लान में माना गया है कि दिल्ली का ड्रेनेज सिस्टम मूल रूप से आज के शहर से चार गुना छोटे शहर के लिए बनाया गया था. प्राकृतिक नालों पर कब्जे, पुराने डिजाइन, सीवेज का बारिश के पानी के साथ मिलना, टुकड़ों में निर्माण और बारिश के पानी को इकट्ठा करने की खराब व्यवस्था ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है.
सितंबर 2025 में आया ये मास्टर प्लान दिल्ली के ड्रेनेज सिस्टम के लिए 50 साल बाद आया मास्टर प्लान था. सरकार को उम्मीद है कि इसे लागू करने के बाद तीन साल के भीतर जलभराव की घटनाएं आधी हो जाएंगी.
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