अंग्रेजों से आजादी के बाद भारत और पाकिस्तान का नक्शा कैसे होगा? इसे तैयार करने की जिम्मेदारी एक ऐसे अंग्रेज को दी गई थी, जिसके पास भारत को लेकर कोई ज्ञान ही नहीं था. तत्कालीन वायसराय लुई माउंटबेटन का मानना था कि अगर कोई ऐसा व्यक्ति भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा रेखा तय करेगा, तो वह बिना किसी पक्षपात के न्याय कर सकेगा.
इसलिए माउंटबेटन ने इसकी जिम्मेदारी उन सिरिल रैडक्लिफ को सौंपी, जो न तो कभी भारत आए थे और न ही उन्हें भारत और यहां की संस्कृति के बारे में पता था. हैरान करने वाली बात यह है कि भारत का बंटवारा करने के लिए रैडक्लिफ को महज 5 हफ्तों का समय मिला था. जाहिर है कि इसमें कुछ गलती भी हो सकती थी.
रैडक्लिफ से गलती हुई भी. रैडक्लिफ को पंजाब और बंगाल का बंटवारा करना था. उन्हें सिर्फ इतना कहा गया था कि आबादी को ध्यान में रखें और बंटवारा करें. उन्हें यह काम सौंपा गया था कि वे ज्यादा हिंदू आबादी वाले इलाकों को भारत के पास रखें और ज्यादा मुस्लिम आबादी वाले इलाकों को पाकिस्तान को सौंप दें. जब उन्होंने बंटवारे की रेखा खींची तो बंगाल के कुछ हिस्से कुछ समय के लिए पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) का हिस्सा बन गए थे.
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रैडक्लिफ की एक गलती पड़ी भारी
रैडक्लिफ ने जो नक्शा तैयार किया, उसमें उन्होंने नादिया जिले के कुछ हिस्से पाकिस्तान को सौंप दिए. मुर्शिदाबाद का पूरा इलाका और मालदा, दिनाजपुर और उत्तर 24 परगना के बड़े हिस्से भी भारतीय सीमा के बाहर चले गए.
15 अगस्त 1947 को भारत का पहला स्वतंत्रता दिवस मनाने के बजाय, इन जगहों के लोग विरोध-प्रदर्शन में व्यस्त थे. उस समय की रिपोर्टों के अनुसार, कुछ इलाकों में पूरी तरह से बिजली गुल थी और महिलाओं ने दो दिनों तक खाना बनाना बंद कर दिया था.

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पाकिस्तान को अपने हिस्से से ज्यादा मिलने पर बहुत खुशी हुई, और मुस्लिम लीग के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने प्रमुख जगहों पर पाकिस्तानी झंडे फहराए. तनाव बढ़ गया, और खबरों के अनुसार हिंदू परिवारों ने किसी भी हमले को रोकने के लिए अपने घरों में खौलता हुआ पानी तैयार रखा.
मालदा जिला कलेक्टर के दफ्तर और नादिया जिले के मुख्यालय कृष्णानगर में जिला लाइब्रेरी के ऊपर पाकिस्तानी झंडे देखे गए. कृष्णानगर के शाही परिवार ने विरोध-प्रदर्शनों का नेतृत्व किया, और प्रमुख हस्तियां अपना विरोध दर्ज कराने के लिए कलकत्ता (अब कोलकाता) पहुंचीं.
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लेकिन जल्द ही सुधार ली गई गलती
इसके बाद भारत के आखिरी ब्रिटिश गवर्नर-जनरल लुइस माउंटबेटन ने रैडक्लिफ को अपनी गलती सुधारने का आदेश दिया. 17 अगस्त की रात को यह घोषणा की गई कि मालदा, दिनाजपुर और जलपाईगुड़ी जिलों के कुछ हिस्से और नादिया के तीन मुस्लिम-बहुल सब-डिविजन- मेहरपुर, चुआडांगा और कुश्तिया ही पूर्वी पाकिस्तान को सौंपे जाएंगे. मुर्शिदाबाद समेत बाकी इलाका भारत के पास ही रहेगा.

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लोगों में खुशी की लहर दौड़ गई और निवासियों ने 18 अगस्त 1947 को 'भारत भुक्ति दिवस' यानी भारत में विलय दिवस के रूप में मनाना शुरू किया. आज भी, इनमें से कई जगहों पर 15 अगस्त और 18 अगस्त, दोनों दिन राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाता है. अहम घटनाओं में से एक यह थी कि मालदा के तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट अशोक सेन ने जिले के प्रशासनिक भवन में भारतीय राष्ट्रीय ध्वज फहराया, जो भारत में इसके वापस आने का प्रतीक था.
कुछ गलतियां जो सुधरी नहीं
कुछ गलतियां सुधारी नहीं जा सकीं. व्यापक विरोध के बावजूद, बौद्ध आदिवासियों की बहुलता वाला पूरा चटगांव पहाड़ी इलाका पाकिस्तान के पास ही रह गया. इस इलाके के लोग आज भी अपने धर्म के कारण उत्पीड़न का सामना कर रहे हैं, हालांकि पूर्वी पाकिस्तान अब बांग्लादेश बन चुका है.
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