- NSUI ने UGC के जाति-आधारित भेदभाव को खत्म करने के नए नियमों का समर्थन करते हुए अपनी कुछ शर्तें भी रखीं.
- समिति में SC, ST, OBC छात्रों और शिक्षकों का अनिवार्य प्रतिनिधित्व और न्यायाधीशों की भागीदारी की जरूरत बताई.
- NSUI ने पूछा कि समिति का अध्यक्ष कौन होगा और इसे विश्वविद्यालय प्रशासन के प्रभाव से मुक्त रखा जाना चाहिए.
UGC के नए नियमों पर मचे बवाल के बीच कांग्रेस के छात्र संगठन NSUI ने इसका समर्थन किया है. NSUI के अध्यक्ष वरुण चौधरी ने सोशल मीडिया मंच पर लिखे लंबे पोस्ट में कहा- NSUI, UGC द्वारा जारी जाति-आधारित भेदभाव पर पहल का स्वागत करती है. हालांकि, हमारे कुछ सुझाव और सवाल हैं ताकि प्रस्तावित समिति केवल कागजी औपचारिकता बनकर न रह जाए. इस समिति में SC, ST और OBC समुदायों से आने वाले छात्रों का अनिवार्य प्रतिनिधित्व होना चाहिए, साथ ही SC, ST और OBC पृष्ठभूमि के शिक्षकों को भी शामिल किया जाना चाहिए. समिति की स्वतंत्रता, पारदर्शिता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए इसमें सेवारत या सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को भी शामिल किया जाना आवश्यक है.
सवाल उठाया- आखिर कमेटी का चेयरपर्सन कौन होगा?
वरुण चौधरी के इस सोशल मीडिया पोस्ट NSUI के आधिकारिक एक्स अकाउंट से भी शेयर किया गया है. जिसमें नए नियमों का समर्थन तो किया गया है. लेकिन कुछ सवाल भी उठाए गए हैं. सवाल उठाते हुए लिखा गया है कि आखिर कमेटी का चेयरपर्सन कौन होगा? इस सवाल पर UGC चुप है. कमेटी को विश्वविद्यालय प्रशासन के नियंत्रण की कठपुतली नहीं बनाना चाहिए, अन्यथा यह समानता और न्याय के मूल उद्देश्य को ही विफल कर देगा.
NSUI welcomes the UGC Regulations on Caste-Based Discrimination as a necessary step towards addressing discrimination on campuses across the country.
— Varun Choudhary (@varunchoudhary2) January 27, 2026
However, NSUI firmly asserts that the proposed committee must not remain symbolic or administrative in nature. It must include…
पहले की समितियों का जिक्र कर जताई चिंता
एनएसयूआई ने पहले की समितियों का जिक्र करते हुए लिखा कि पहले भी ऐसी कई समितियां विशेषकर लैंगिक भेदभाव से संबंधित बनी हैं परंतु शिकायतों के प्रभावी निपटारे तथा न्याय दिलाने में असफल रही हैं. NFS और आरक्षण नीतियों की विफलता के कारण दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के शिक्षण पदों में भारी रिक्तियां हैं. IITs, IIMs तथा केंद्रीय विश्वविद्यालयों में छात्रों की आत्महत्या की दुखद घटनाएं और उच्च ड्रॉपआउट दर यह रेखांकित करती हैं कि उच्च शिक्षा में बदलाव लाने की आवश्यकता है.
उच्च शिक्षा में भेदभाव पर खुलकर बोलना चाहिए
उच्च शिक्षा में व्याप्त हर प्रकार के भेदभाव पर हमें खुलकर सामूहिक रूप से बोलना चाहिए और इसे समाप्त करने की दिशा में कदम उठाने चाहिए. UGC एक मजबूत, स्वतंत्र और सशक्त समिति का गठन हर विश्वविद्यालय और कॉलेज में सुनिश्चित करे जो शिकायतों पर कार्रवाई करे, जवाबदेही सुनिश्चित करे और न्याय प्रदान करे. NSUI विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जाति, लिंग या किसी भी अन्य पहचान के आधार पर होने वाले हर प्रकार के भेदभाव के खिलाफ दृढ़ता से खड़ी है.
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