भारत के चीफ जस्टिस (CJI) सूर्य कांत ने रविवार को कहा कि हमें इस बात पर विचार करने की जरूरत है कि क्या न्याय देने की प्रक्रिया को और बेहतर बनाया जा सकता है. ऐसा इसलिए क्योंकि अब बड़ी संख्या में लोग हाई कोर्ट में लंबित मामलों की जल्द सुनवाई या तुरंत सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख कर रहे हैं. CJI सूर्य कांत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने हमेशा हाई कोर्ट की स्वतंत्रता का सम्मान किया है. इसमें हाई कोर्ट का अपने यहां मामलों की सुनवाई के लिए जजों की जिम्मेदारी तय करने का अधिकार भी शामिल है. लेकिन, जिस तरह से बार-बार जल्द सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट से अपील की जा रही है, उससे यह सोचने की जरूरत है कि क्या हमारी न्याय प्रक्रिया को और तेज और लोगों के प्रति अधिक जवाबदेह बनाया जा सकता है.
उन्होंने कहा, "हमें खुद से कुछ सवाल पूछने चाहिए. क्या हम जरूरी मामलों की पहचान और बेहतर तरीके से कर सकते हैं? क्या मामलों की सुनवाई तय करने की प्रक्रिया को और पारदर्शी बनाया जा सकता है, ताकि लोगों को पहले से पता हो कि उनके मामले की सुनवाई कब होगी? क्या तकनीक की मदद से उन मामलों को प्राथमिकता दी जा सकती है, जिनमें देरी से किसी व्यक्ति को ऐसा नुकसान हो सकता है जिसकी भरपाई नहीं की जा सके?"
उन्होंने आगे पूछा, "क्या हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि किसी व्यक्ति को समय पर न्याय पाने के लिए दिल्ली आने-जाने की क्षमता पर निर्भर न रहना पड़े?"
संवैधानिक न्याय की शुरुआत और अंत सिर्फ नई दिल्ली में नहीं होता- CJI
उन्होंने कहा कि भारत में संवैधानिक न्याय की शुरुआत और अंत सिर्फ नई दिल्ली में नहीं होता. इसकी ताकत देशभर में फैले 25 हाई कोर्ट के मजबूत नेटवर्क में है. इन सभी हाई कोर्ट को लोगों के अधिकारों की रक्षा करने और कानून का राज बनाए रखने की जिम्मेदारी सौंपी गई है. उन्होंने कहा कि हाई कोर्ट आम लोगों की रोजमर्रा की समस्याओं से सीधे जुड़े रहते हैं. वे स्थानीय लोगों की शिकायतों की भाषा समझते हैं. वे अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों की परिस्थितियों को जानते हैं और यह भी समझते हैं कि सरकार के किसी फैसले का लोगों पर क्या असर पड़ता है.
CJI ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट को बहुत व्यापक अधिकार मिले हैं. इन अधिकारों के तहत वे कानून, सरकारी नियमों, प्रशासनिक फैसलों और आपसी समझौतों से जुड़े अलग-अलग विवादों में लोगों को उचित राहत दे सकते हैं. उन्होंने कहा कि हाई कोर्ट के लिए समय पर अंतरिम राहत देना भी उतना ही जरूरी है. अंतरिम राहत का मतलब है कि मामले का अंतिम फैसला आने से पहले ही किसी व्यक्ति को अस्थायी राहत देना.
CJI सूर्य कांत ने कहा, "कई बार न्याय और अन्याय के बीच का अंतर अंतिम फैसले में नहीं, बल्कि इस बात में होता है कि अदालत ने उस समय दखल दिया या नहीं, जब इसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी."
केरल हाई कोर्ट के 70 साल के इतिहास का जिक्र करते हुए CJI सूर्य कांत ने कहा कि केरल हाई कोर्ट और केरल राज्य, दोनों का गठन 1956 में हुआ था. पिछले 70 सालों में दोनों का सफर एक-दूसरे से गहराई से जुड़ा रहा है. उन्होंने कहा कि केरल हाई कोर्ट ने राज्य के संवैधानिक विकास में अहम भूमिका निभाई है.
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