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CJI सूर्य कांत ने क्यों कहा कि चीफ जस्टिस भी वकीलों को नाराज करने का रिस्क नहीं ले सकता?

CJI सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की एक बेंच ने बताया कि रिटायर जजों को हाई कोर्ट में एड हॉक जज के तौर पर वापस लाने की योजना क्यों रोकनी पड़ी.

CJI सूर्य कांत ने क्यों कहा कि चीफ जस्टिस भी वकीलों को नाराज करने का रिस्क नहीं ले सकता?
भारत के चीफ जस्टिस सूर्य कांत की फाइल फोटो

भारत के चीफ जस्टिस सूर्य कांत भी कह रहे हैं कि कोई चीफ जज वकीलों को नाराज करने का रिस्क नहीं ले सकता. जस्टिस सूर्य कांत ने गुरुवार, 29 अक्टूबर को कहा कि बार एसोसिएशनों के विरोध के कारण ही सुप्रीम कोर्ट की उस कोशिश पर रोक लग गई, जिसके तहत रिटायर हो चुके जजों को हाई कोर्ट में तदर्थ न्यायाधीश (एड हॉक जज) के रूप में वापस लाया जाना था. एड हॉक जज मतलब अस्थायी जज. जब होई कोर्ट में केस बहुत ज्यादा बढ़ जाते हैं और जज कम पड़ जाते हैं, तो संविधान अधिकार देता है कि हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस एड हॉक जजों की नियुक्ति करें ताकि केस जल्दी निपट जाएं.

CJI ने बताया कि इस पहल की रूपरेख तब तैयार की गई थी जब वे भारत के पूर्व चीफ जस्टिस एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली बेंच का हिस्सा थे, लेकिन बार एसोसिएशनों द्वारा इस कदम के विरोध में प्रस्ताव पारित करने के बाद इसे लागू नहीं किया जा सका. उन्होंने कहा, “तत्कालीन CJI बोबडे की अध्यक्षता वाली बेंच में रहते हुए, हमने रिटायर हो चुके जजों में से तदर्थ (ad hoc) न्यायाधीशों को नियुक्त करने की प्रथा को एक तरह से फिर से शुरू किया था.”

CJI ने कहा कि उनका विचार इस प्रथा को फिर से चलन में लाने का था, लेकिन बार एसोसिएशनों के विरोध के कारण यह पहल आगे नहीं बढ़ सकी. उन्होंने आगे बताया कि बार एसोसिएशनों ने इसके खिलाफ प्रस्ताव पारित करना शुरू कर दिया था. उन्होंने टिप्पणी की कि कोई भी चीफ जस्टिस बार (वकीलों के संगठन) को नाराज करने का जोखिम नहीं उठा सकता.

राजस्थान में न्यायिक अधिकारियों की सीनियरिटी के मुद्दे पर विचार करते समय, CJI सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची तथा जस्टिस वी. मोहना की एक बेंच ने ये टिप्पणियां कीं. अदालत ने इस बात पर भी चर्चा की कि जब रिटायर हो चुके जज सेवा में वापस नहीं आ पाते हैं, तो इससे कितना बहुमूल्य न्यायिक अनुभव बेकार चला जाता है.

"रिटायर जजों को मुश्किल स्थिति में डाल दिया है"

जस्टिस बागची ने बताया कि इस असफल पहल ने कई रिटायर्ड जजों को मुश्किल स्थिति में डाल दिया है, क्योंकि उनमें से कुछ ने एडहॉक जज के रूप में नियुक्त होने की उम्मीद में निजी काम स्वीकार नहीं किए थे. उन्होंने कहा, "दुखद बात यह है कि जो जज रिटायर हुए और जिन्होंने अपनी सेवाएं देने की पेशकश की थी, उन्होंने निजी काम नहीं लिए, क्योंकि उन्हें पूरी उम्मीद थी कि उनकी नियुक्ति हो जाएगी."

जस्टिस बागची ने अमेरिका में एक महिला जज के साथ हुई अपनी मुलाकात का भी जिक्र किया, जो यह दिखाती है कि रिटायरमेंट के बाद भी न्यायिक विशेषज्ञता का किस तरह बेहतर उपयोग किया जा सकता है. उन्होंने बताया कि उस जज के पास आतंकी मामलों की सुनवाई करने में इतनी विशेषज्ञता थी कि चीफ जस्टिस ने उनसे अपनी सेवाएं देने का अनुरोध किया था.

उन्होंने कहा कि न्यायिक संसाधन बहुत मूल्यवान होते हैं. CJI सूर्य कांत ने भी एक न्यायिक अधिकारी के साथ हुई बातचीत का जिक्र किया, जिन्होंने कई वर्षों तक सेवा देने के बाद इस्तीफा दे दिया था और बाद में वकालत में लौट आए थे. उस अधिकारी ने चिंता जताई थी कि नए पेंशन नियमों के तहत, रिटायरमेंट के बाद मिलने वाला लाभ प्रति माह 25,000 रुपये से अधिक नहीं होगा. CJI ने बताया कि उस अधिकारी ने पूछा था, "आप ही बताइए, मैं अपना गुजारा कैसे करूंगा?" 

बता दें कि संविधान का अनुच्छेद 224A, राष्ट्रपति की सहमति से, किसी हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस को यह अधिकार देता है कि वे उसी या किसी अन्य हाई कोर्ट के रिटायर हो चुके जज से हाई कोर्ट के जज के रूप में बैठने और काम करने का अनुरोध कर सकें.

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