- मद्रास हाई कोर्ट ने कहा कि बच्चा न होना वैवाहिक क्रूरता या गलती नहीं माना जा सकता
- हाई कोर्ट ने पति की क्रूरता के आधार पर तलाक की अपील को खारिज कर दिया
- अदालत ने कहा कि शादी का एकमात्र मकसद बच्चे पैदा करना नहीं होता
मद्रास हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा कि बच्चा न होना अपने आप में 'क्रूरता' नहीं माना जा सकता. कोर्ट ने कहा कि सिर्फ इसलिए कि पति-पत्नी माता-पिता नहीं बन पाए, इसलिए पत्नी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता. जस्टिस जीआर स्वामीनाथन और जस्टिस एमडी सुमति की बेंच ने कहा कि बच्चा पैदा न कर पाना पत्नी की 'वैवाहिक गलती' नहीं मानी जा सकती.
कोर्ट ने कहा, 'शादी का एकमात्र मकसद बच्चा पैदा करना नहीं हो सकता. सिर्फ इसलिए कि किसी कपल के बच्चे नहीं हैं, किसी पार्टनर को वैवाहिक रिश्ते में असफल नहीं माना जा सकता.'
अदालत ने यह टिप्पणी तब की, जब एक पति ने क्रूता के आधार पर तलाक मांगा. हाई कोर्ट ने उसकी अपील को खारिज कर दिया. इससे पहले फैमिली कोर्ट ने उसकी याचिका खारिज कर दी थी.
क्या है पूरा मामला?
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों की शादी जून 2007 में हुई थी. पति का आरोप था कि शुरुआत में शादीशुदा जिंदगी ठीक-ठाक चलने के बाद, उसकी पत्नी उसे अपमानित करने लगी, काम से देर से लौटने पर उस पर शक करती थी, अक्सर घर छोड़कर चली जाती थी.
उसने यह भी आरोप लगाया कि जून 2016 में, पत्नी ने सबके सामने उसे नामर्द कहा, चप्पल और बाद में झाड़ू से मारा, अपना मंगलसूत्र उतार दिया, उनकी तस्वीरें फाड़ दीं और घर छोड़कर चली गई.
पत्नी ने आरोपों से इनकार किया. उसने कहा कि उसने गर्भाशय में फाइब्रॉइड (गांठ) के लिए सर्जरी करवाई थी और बच्चा पैदा करने और वैवाहिक जीवन जारी रखने की उम्मीद में इलाज भी करवाया था.
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हाई कोर्ट ने क्या-क्या कहा?
हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को सही ठहराया और कहा कि मारपीट, अपमान और घर छोड़ने के आरोप ठीक से साबित नहीं हुए.
बेंच ने फर्टिलिटी ट्रीटमेंट से जुड़े शारीरिक और भावनात्मक बोझ पर जोर दिया. कोर्ट ने कहा कि ऐसे इलाज में हार्मोनल इंजेक्शन, बार-बार स्कैन और ब्लड टेस्ट, शरीर के अंदर किए जाने वाले प्रोसीजर, शारीरिक तकलीफ, चिंता, उम्मीद और निराशा के बार-बार आने वाले दौर शामिल हो सकते हैं. कोर्ट ने कहा कि पत्नी का ऐसा इलाज करवाने के लिए तैयार होना इस आरोप के उलट है कि उसने शादी छोड़ दी थी या जानबूझकर वैवाहिक जीवन से दूर रही थी.
कोर्ट ने कहा, 'जब कोई पत्नी, शारीरिक और भावनात्मक मुश्किलों को जानते हुए भी, बच्चा पैदा करने और वैवाहिक रिश्ते को बचाने की उम्मीद में खुशी-खुशी ऐसा इलाज करवाती है, तो उसके इस व्यवहार को किसी भी तरह से शादी को ठुकराना या पति के प्रति क्रूरता नहीं माना जा सकता.'
कोर्ट ने यह भी कहा कि भले ही पति-पत्नी दोनों ही बच्चे न होने का भावनात्मक दुख झेलते हों, लेकिन फर्टिलिटी ट्रीटमेंट के शारीरिक नतीजे महिला को ही भुगतने पड़ते हैं.
अदालत ने इस दलील को भी खारिज कर दिया कि जोड़े का लंबे समय तक अलग रहना ही क्रूरता या शादी के पूरी तरह से टूटने को साबित करने के लिए काफी है.
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