- मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने OBC क्रीमीलेयर पर एक अहम फैसला सुनाया है.
- कोर्ट ने कहा-माता-पिता की सैलरी देखकर ओबीसी आरक्षण का अधिकार नहीं छीना जा सकता.
- फैसला ओबीसी सर्टिफिकेट से जुड़ी एक याचिका पर हुई सुनवाई के बाद लिया गया है.
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने सरकारी नौकरी में ओबीसी आरक्षण और क्रीमी लेयर के नियमों को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है. हाईकोर्ट की बेंच ने स्पष्ट किया है कि अभ्यर्थी के क्रीमी लेयर का निर्धारण महज उसके माता-पिता के वेतन या सालाना आय को देखकर नहीं किया जा सकता. जस्टिस आनंद पाठक की एकल पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि क्रीमी लेयर तय करने के लिए केंद्र सरकार के कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग के सभी नियमों, माता-पिता के सेवा पद और प्रमोशन के समय की विस्तृत जांच जरूरी है. यह मामला रागिनी राठौर नाम की एक अभ्यर्थी के ओबीसी जाति प्रमाण पत्र से जुड़ा है. जिसमें एमपी हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने यह फैसला दिया है.
रागिनी राठौर के पिता थे सिविल जज
दरअसल, रागिनी राठौर के पिता मध्य प्रदेश न्यायिक सेवा में न्यायाधीश यानि जज के पद पर कार्यरत हैं. उनकी सैलरी 16.99 लाख रुपए है. रागिनी ने गैर-क्रीमी लेयर श्रेणी के तहत ओबीसी प्रमाण पत्र के लिए आवेदन दिया था. ऐसा इसलिए ताकि उन्हें सरकारी नियुक्तियों में आरक्षण का लाभ मिल सके. लेकिन राजस्व अधिकारियों ने उनके आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि उनके पिता की सालाना सैलरी 16.99 लाख रुपए है, जो क्रीमी लेयर के लिए तय 8 लाख रुपए की वैधानिक सीमा से कही ज्यादा है, अधिकारियों ने केवल वेतन के आंकड़ों को आधार मानकर रागिनी को क्रीमी लेयर यानि आरक्षण के दायरे से बाहर में डाल दिया. इस फैसले के खिलाफ याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था.
ग्वालियर बेंच का अहम फैसला
ग्वालियर हाईकोर्ट में जस्टिस आनंद पाठक की पीठ ने इस याचिका पर सुनवाई की थी. जिसमें उन्होंने कहा अधिकारियों ने नियमों को समझने में भूल की है. कोर्ट ने कहा कि जब बात सरकारी कर्मचारियों या अधिकारियों की आती है, तो क्रीमी लेयर का आकलन सिर्फ उनके बैंक खाते में आने वाली सैलरी या कृषि आय से नहीं होता. इसके लिए केंद्र सरकार और DoPT के स्पष्ट दिशा-निर्देश मौजूद हैं. अदालत ने अपने आदेश में कहा कि सक्षम प्राधिकारियों को अभ्यर्थी के माता-पिता के सेवा स्तर, उनके पद और उस पद पर उनके प्रमोशन किस तारीख या किस उम्र में हुई थी, इन सभी बातों पर बारीकी से जांच करना जरूरी होता है. कोर्ट ने अधिकारियों की तरफ से पहले जारी किए गए दोनों खारिज करने वाले आदेशों को निरस्त कर दिया है. इसके अलावा संबंधित अथॉरिटी को निर्देश दिया कि वे 6 सप्ताह के भीतर सभी नियमों को ध्यान में रखकर नया और न्यायसंगत आदेश पारित करें.
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आरक्षण में यह फैसला अहम
दरअसल, यह फैसला अहम माना जा रहा है. खासकर उन युवाओं के लिए राहत है, जिनके माता-पिता सरकारी नौकरियों में जिनमें न्यायिक सेवा, प्रशासनिक सेवा, या अन्य सरकारी विभाग शामिल हैं, जिनमें कई कर्मचारियों की साला वार्षिक आय 8 लाख रुपए की सीमा को पार कर जाती है. लेकिन DoPT के नियमों के मुताबिक, सरकारी कर्मचारियों के मामले में क्रीमी लेयर का निर्धारण उनके पद जिसमें क्लास-1 या क्लास-2 ऑफिस और उसमें प्रमोशन की उम्र के आधार पर होता है, न कि केवल उनकी सैलरी को जोड़कर. हाई कोर्ट के इस फैसले ने प्रशासनिक अधिकारियों की मनमानी पर रोक लगाई है और यह साफ कर दिया है कि आधी-अधूरी जानकारी या सिर्फ सैलरी स्लिप देखकर किसी भी योग्य उम्मीदवार को उसके आरक्षण के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता. यानि उसके नियमों की जांच भी जरूरी है.
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