- चुनाव आयोग ने ममता बनर्जी के बागी गुट डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस को लिफाफा चुनाव चिह्न आवंटित किया है
- उच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग से पूछा कि 183 विकल्पों में से लिफाफा चिह्न ही क्यों दिया गया
- अदालत ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाए और कहा कि इस प्रकार का निर्णय विवाद पैदा करता है
ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस से बागी होकर बने नए गुट को पार्टी का दर्जा देते हुए 'लिफाफा' चुनाव चिह्न आवंटित करने पर चुनाव आयोग घिर गया है. उच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग की इस मामले में खिंचाई की है और पूछा कि आखिर नए बने डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस को चुनाव चिह्न लिफाफा क्यों दिया गया है, जबकि आपके पास कुल 183 विकल्प मौजूद थे. यही नहीं अदालत ने तीखी टिप्पणी करते हुए चुनाव आयोग से कहा कि आपको निष्पक्ष होकर काम करना चाहिए. बेंच ने पूछा कि जब आपके पास कुल 183 विकल्प थे तो फिर आपने उपचुनाव में उतरने वाले दल को लिफाफा सिंबल ही क्यों दिया. वह भी तब जबकि ISF का सिंबल भी लिफाफा है और उसका कैंडिडेट भी नंदीग्राम उपचुनाव में उतरा है.
अदालत ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि आपको यह सिंबल रिजर्व रखना चाहिए था. इस मामले में आज फिर से सुनवाई होनी है. केस की सुनवाई के दौरान जस्टिस कृष्ण राव ने तीखी टिप्पणी की और चुनाव आयोग से कहा कि आपको निष्पक्ष होकर काम करना चाहिए. अदालत ने चुनाव आयोग से पूछा कि आखिर आप एक नए बने दल को लिफाफा सिंबल देकर विवाद क्यों खड़ा करना चाहते हैं. जस्टिस राव ने चुनाव आयोग के वकील से कहा कि आपके काम करने का यह गलत तरीका है. अदालत ने कहा, 'आपकी संस्था लोगों को उकसाती है और कानूनी विवाद पैदा करती है. क्या चुनाव आयोग के काम करने का यही तरीका है?'
दरअसल इस मामले में ISF ने अर्जी दाखिल की थी और उसका कहना है कि जब हमारे पास चुनाव चिह्न लिफाफा है तो फिर एक नए बने दल को भी इसे क्यों आवंटित किया गया. इसी मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस राव ने आयोग से कहा, 'आप हर बार लोगों को मजबूर कर देते हैं कि वह अदालत का रुख कर लें.' चुनाव आयोग के वकील की दलील थी कि चुनाव लड़ने वालों की पसंद होती है कि वे किस सिंबल पर उतरना चाहते हैं. इस पर ISF की ओर से पेश वकील ने ऐतराज जताया. उनका कहना था कि यह तर्क ही गलत है क्योंकि सिंबल तय करने का अधिकार तो चुनाव आयोग के पास ही होता है. बता दें कि बंगाल के नंदीग्राम में 6 अक्तूबर को उपचुनाव होना है.
यह सीट सीएम शुभेंदु अधिकारी के इस्तीफे से खाली हुई है. चुनाव आयोग की वकील अनामिका पांडे ने कहा कि ISF एक पंजीकृत दल है, लेकिन मान्यता प्राप्त नहीं है. इसलिए उसके लिए एक निश्चित सिंबल नहीं है. उन्होंने कहा कि ISF ने बीते विधानसभा चुनाव में एक ही सीट हासिल की थी. इसके चलते लिफाफा सिंबल फिर से फ्री हो गया था. अब उसे देश के किसी भी दल को आवंटित किया जा सकता है. इस पर हाई कोर्ट ने कहा कि 4 महीने पहले ही विधानसभा चुनाव हुआ था. उसमें ISF का सिंबल लिफाफा था और अब इतनी जल्दी ही कैसे किसी दूसरे दल को इसे अलॉट किया जा सकता है.
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