- बीजेपी ने टिकट बंटवारे में शीर्ष नेताओं के आपसी टकराव का ख़मियाजा 2024 के लोकसभा चुनाव में भुगता था.
- बड़े नेताओं के बीच टकराव का सबसे पहला कारण होता है अपने चहेते नेताओं को टिकट दिलवाना.
- अब टिकट बंटवारे को लेकर साफ कर दिया है कि इस बार किसी की नहीं चलेगी.
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर बीजेपी बहुत सतर्क हो गई है. बीजेपी कोई भी रिस्क लेने के मूड में नहीं है. इसके लिए सभी नेताओं को संदेश दे दिया गया है कि आपसी टकराव अब नहीं चलेगा. बड़े नेताओं के बीच टकराव का सबसे पहला कारण होता है अपने चहेते नेताओं को टिकट दिलवाना. मगर, अब टिकट बंटवारे को लेकर साफ कर दिया है कि इस बार किसी की नहीं चलेगी. बीजेपी नेताओं के अनुसार, इस बार टिकट वितरण शीर्ष नेताओं की आम राय से होगा. सर्वे के आधार पर केवल जिताऊ उम्मीदवारों को ही टिकट दिया जाएगा. सत्ता विरोधी लहर का सामना कर रहे मौजूदा विधायकों का टिकट काटने में कोई रियायत नहीं बरती जाएगी.
दरअसल, बीजेपी ने टिकट बंटवारे में शीर्ष नेताओं के आपसी टकराव का ख़मियाजा 2024 के लोकसभा चुनाव में भुगता था. बीजेपी ने 2019 में उत्तर प्रदेश में 80 में से 62 सीटें जीती थीं. लेकिन 2024 में पार्टी केवल 36 सीटें ही जीत सकी. पार्टी का वोट शेयर 49.6% से घट कर 41.4% पर आ गया.
बीजेपी ने चौंकाने वाले फ़ैसले में अधिकांश सांसदों को रिपीट किया था. 51 उम्मीदवारों की पहली सूची में 46 सांसदों को फिर से उम्मीदवार बनाया गया था. कुल मिलाकर बीजेपी ने 2024 के लोकसभा चुनाव में 49 सांसदों को दोबारा टिकट दिया था. पार्टी ने एंटी इंकबेंसी का बिल्कुल ध्यान नहीं रखा था. बीजेपी ने 2019 में जिन्हें टिकट दिया था, उनमें से 54 को 2024 में दोबारा टिकट दिया. इनमें से भी 31 भी उम्मीदवार चुनाव हार गए. पार्टी ने जिन 49 सांसदों को दोबारा टिकट दिया, इनमें से भी 27 हार गए. बीएसपी से बीजेपी में आए सांसद राकेश पांडेय भी चुनाव हार गए.33 सांसदों को तीसरी बार या उससे अधिक बार टिकट दिया गया था. इनमें से 20 हार गए.
यूपी की हार इतनी बड़ी थी कि कई केंद्रीय मंत्री भी इसकी चपेट में आ गए. केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी, अजय मिश्रा टेनी, कौशल किशोर, महेंद्र नाथ पांडेय, साध्वी निरंजन ज्योति, भानु प्रताप सिंह वर्मा और संजीव बालियान चुनाव हार गए. आठ बार की सांसद मेनका गांधी सुल्तानपुर से और कल्याण सिंह के बेटे राजवीर सिंह भी हार गए. फ़ैज़ाबाद से लल्लू सिंह और कन्नौज से सुब्रत पाठक भी हारे.
हालांकि बीजेपी नेता इसके लिए एंटी इंकबेंसी के साथ ही भीतरघात को भी जिम्मेदार ठहराते हैं. उनका कहना है कि कई जगहों पर जान-बूझकर पार्टी उम्मीदवारों को हराने के लिए पार्टी के भीतर से ही काम किया गया. राज्य में बीजेपी सरकार होने के बावजूद प्रशासन ने सहयोग नहीं किया और कार्यकर्ता नाराज होकर घर बैठ गए. वोटरों की उदासीनता भी एक बड़ा कारण था, जिसके चलते मतदान प्रतिशत में गिरावट आई थी. उदाहरण के लिए मुज़फ़्फ़रनगर में संजीव बालियान 24,672 वोट से हारे. यहां मतदान प्रतिशत में 9.07% की कमी आई थी.
दो सालों में हर छेद बंद किए गए
बीजेपी ने पिछले दो वर्षों में इन सब कमियों को दूर करने का प्रयास किया है. नए प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने कार्यकर्ताओं की नाराज़गी दूर करने के लिए राज्य भर का दौरा किया. टीम के गठन में सभी को प्रतिनिधित्व देने का प्रयास किया. इसी तरह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी लगातार मंडलों का दौरा कर रहे हैं. इस दौरान वे विधायकों और कार्यकर्ताओं से लगातार संपर्क कर रहे हैं. संगठन महासचिव बी एल संतोष ने कार्यकर्ताओं को ध्यान में रख कर कई निर्देश संगठन को दिए हैं.
एसआईआर के बाद नई मतदाता सूची को ध्यान में रख कर बीजेपी ने बूथ स्तर तक कमेटियों का गठन किया है. मतदान प्रतिशत बढ़ाने के लिए जनजागरण और जनसंपर्क अभियान चलाया जाएगा.
युवाओं-महिलाओं को ज्यादा मिलेंगे टिकट
सबसे बड़ी सावधानी टिकट बांटने में रखी जाएगी. पार्टी यह ध्यान रखेगी कि इस क़वायद में नेताओं के अहम का टकराव न हो. कोशिश होगी कि आपसी सहमति बनाकर टिकट बांटे जाएं. टिकट थोपे न जाएं. एंटी इंकबेंसी से बचने के लिए वर्तमान 255 में सौ से भी ज्यादा मौजूदा विधायकों के टिकट काटे जा सकते हैं. पार्टी युवाओं और महिलाओं को बड़ी संख्या में टिकट देगी. कई बार से जीतते आ रहे विधायकों के प्रदर्शन पर कड़ी नजर रहेगी. उन्हें केवल जीतने के आधार पर ही फिर से टिकट मिलेगा.
एक बीजेपी नेता के अनुसार एक ऐसे समय जब बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में ऐतिहासिक जीत हासिल की है, वह उत्तर प्रदेश जैसे अपने गढ़ में कोई सरप्राइज़ झेलने को तैयार नहीं है.रा ज्य में हैट्रिक के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया जाएगा.बीजेपी जानती है कि उत्तर प्रदेश में लगातार दूसरी फिसलन विपक्ष को नई ऑक्सीजन दे सकती है.इसीलिए पार्टी कोई जोखिम मोल लेने को तैयार नहीं.
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