संसदीय समिति औपनिवेशिक युग के आपराधिक कानूनों में बदलाव के हिस्से के रूप में व्यभिचार कानून को और पुरुषों, महिलाओं तथा ट्रांस सदस्यों के बीच बिना-सहमति से यौन संबंधों को अपराध के दायरे में लाने की सिफारिश कर सकती है. सूत्रों ने कहा कि पैनल भारतीय दंड संहिता, आपराधिक प्रक्रिया संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम - क्रमशः भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम को बदलने के लिए तीन विधेयकों का अध्ययन कर रहा है.
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा पेश किए गए विधेयकों को तीन महीने की समय सीमा के साथ अगस्त में आगे की जांच के लिए गृह मामलों की स्थायी समिति को भेजा गया था, जिसके अध्यक्ष भाजपा सांसद बृज लाल हैं.
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शुक्रवार को समिति की बैठक हुई, लेकिन विधेयकों पर मसौदा रिपोर्ट को अपनाया नहीं गया, क्योंकि विपक्षी सदस्यों ने तीन महीने के विस्तार की मांग की. अगली बैठक 6 नवंबर को होगी.
मसौदा रिपोर्ट में ये सिफारिश करने की उम्मीद है कि व्यभिचार को 2018 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द किए गए कानून को बहाल करके या एक नया कानून पारित करके फिर से एक अपराध बनाया जाए.
कानून में तब कहा गया था कि एक पुरुष जिसने एक विवाहित महिला के साथ उसके पति की सहमति के बिना यौन संबंध बनाया, तो दोषी पाए जाने पर पांच साल की सजा हो सकती है. महिला को सज़ा नहीं होगी.
रिपोर्ट में ये सिफारिश करने की संभावना है कि व्यभिचार पर हटाए गए प्रावधान को वापस लाए जाने पर लिंग-तटस्थ बना दिया जाएगा, जिसका अर्थ है कि पुरुष और महिला को सजा का सामना करना पड़ सकता है.
अप्रकाशित मसौदा रिपोर्ट में कहा गया है, "विवाह संस्था की रक्षा के लिए, इस धारा (आईपीसी की 497) को लिंग-तटस्थ बनाकर संहिता में बरकरार रखा जाना चाहिए."

धारा 377 पर
इस बीच, समिति ने कथित तौर पर धारा 377 पर भी चर्चा की - एक ब्रिटिश युग का प्रावधान जो समलैंगिकता को अपराध मानता था और जिसे पांच साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने भी रद्द कर दिया था.
उम्मीद है कि समिति सरकार को सिफारिश करेगी, जिसने 377 और 497 दोनों को अपराधमुक्त करने का विरोध किया था, कि आईपीसी की धारा 377 को फिर से लागू करना और बनाए रखना अनिवार्य है.
"हालांकि, अब भारतीय न्याय संहिता में, पुरुष, महिला, ट्रांसजेंडर के खिलाफ गैर-सहमति वाले यौन अपराधों और पाशविकता के लिए कोई प्रावधान नहीं किया गया है."
अन्य सिफ़ारिशें
अन्य संभावित सिफ़ारिशों में लापरवाही के कारण होने वाली मौतों के लिए सज़ा को छह महीने से बढ़ाकर पांच साल करना और अनाधिकृत विरोध प्रदर्शनों के लिए सज़ा को दो साल से घटाकर 12 महीने करना है. समिति ये भी कह सकती है कि भारतीय दंड संहिता का नाम बरकरार रखा जाए.
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