Bengal Assembly Elections 2026: 6 दिसंबर, 2025 को बाबरी मस्जिद विध्वंस की 33वीं बरसी पर तृणमूल कांग्रेस (TMC) के एक निलंबित विधायक हुमायूं कबीर ने मुर्शिदाबाद जिले में उस ऐतिहासिक ढांचे की तर्ज पर एक मस्जिद की आधारशिला रखी. यह कदम राजनीतिक गूंज पैदा करने के लिए उठाया गया था, और इसने यह काम भी किया. कुछ ही हफ्तों बाद पश्चिम बंगाल पुलिस ने एक नशीले पदार्थ के मामले में कबीर के परिवार से जुड़ी 10 करोड़ रुपए की संपत्ति कुर्क की. फिर तृणमूल ने उन्हें निष्कासित कर दिया. TMC से निष्कासित होने के बाद बंगाल में एक नया राजनीतिक संगठन 'जनता उन्नयन पार्टी (JUP)' अस्तित्व में आया. इस नए राजनीतिक दल की एंट्री के बाद बंगाल के मुस्लिम वोटों के लिए 2026 की चुनावी जंग आधिकारिक शुरुआत हो गई.
आंकड़ों से समझिए बंगाल में मुस्लिम वोटरों की अहमियत
बंगाल में JUP का उदय और मुस्लिम वोटों के जंग का यह मामला इतना महत्वपूर्ण क्यों है? इसे समझने के लिए आंकड़ों से शुरुआत करते हैं. 2011 की जनगणना के अनुसार बंगाल की जनसंख्या में मुस्लिम लगभग 27 फीसदी हैं. हालांकि BJP दावा करती है कि पिछले दशक में बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ के कारण बंगाल में मुस्लिम आबादी लगभग 30 फीसदी या उससे अधिक हो गई है.
- बंगाल के 3 जिले- मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर दिनाजपुर में मुस्लिम आबादी 50 फीसदी या उससे अधिक है.
- दो अन्य जिले- दक्षिण 24 परगना और बीरभूम में यह 35 फीसदी से ऊपर है.
- इन क्षेत्रों में 89 ऐसी विधानसभा सीटें हैं, जहां मुस्लिम आबादी 30 फीसदी से अधिक है.
- साथ ही 112 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम वोटरों की संख्या 25 फीसदी से अधिक है.
2021 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने 35 फीसदी से अधिक मुस्लिम वोटर वाले 89 में से 87 सीटें जीती थीं, यह लगभग एकतरफा जीत था. 112 मुस्लिम-प्रभावित सीटों में से TMC ने 106 पर कब्जा किया, जबकि बीजेपी के पास केवल 5 सीटें रहीं. 30 फीसदी से अधिक मुस्लिम आबादी वाले निर्वाचन क्षेत्रों में बीजेपी की सफलता दर लगभग शून्य थी. ये सीटें एक ऐसी दीवार बन गईं जिसे भाजपा भेद नहीं पाई.
2021 में 75 तो 2024 में 83 फीसदी मुस्लिम वोटर TMC के साथ थे
'एक्सिस माई इंडिया' (Axis My India) के 2021 के एग्जिट पोल डेटा के अनुसार, लगभग 75 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं ने तृणमूल का समर्थन किया. 2024 के लोकसभा चुनाव में यह आंकड़ा बढ़कर 83 फीसदी हो गई. CSDS का डेटा बताता है कि नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA), NRC विवाद और राजनीतिक असुरक्षा की व्यापक भावना ने मुस्लिम मतदाताओं को ममता बनर्जी से दूर करने के बजाय उनके और करीब ला दिया. अब देखने वाली बात यह होगी कि इस बार के चुनाव में SIR क्या इस वर्ग को और अधिक संगठित करेगा?

मुस्लिम वोटरों की एकजुटता का विपरीत प्रभाव दूसरी तरफ भी दिखता है. 2021 में जिन निर्वाचन क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी 0-10% थी, वहां भाजपा का सफलता दर करीब 42 फीसदी रहा. 0-10 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले 77 विधानसभा सीटों में 33 सीटें भाजपा ने जीती थी. जैसे-जैसे निर्वाचन क्षेत्र में मुस्लिम आबादी का हिस्सा बढ़ता गया, भाजपा का प्रदर्शन ठीक उसी अनुपात में गिरता गया. 20-30% मुस्लिम आबादी वाली सीटों पर यह गिरकर 25%, 40-50% वाली सीटों पर 8% और उस सीमा के पार 0% रह गया.
बंगाल में किसकी सरकार? तय करने में मुस्लिम वोटरों की भूमिका
बंगाल की राजनीति के केंद्र में यही विरोधाभास है. 294 सीटों वाली विधानसभा में बहुमत के लिए 148 सीटों की जरूरत होती है. 112 मुस्लिम-प्रभावित सीटों में से 106 पहले से ही TMC के पाले में होने के कारण उसे शेष 182 हिंदू-बहुल निर्वाचन क्षेत्रों में से केवल 42 और सीटें जीतने की जरूरत है. 2021 में TMC ने उन 182 सीटों में से 109 जीती थीं, सफलता दर 60 फीसदी थी. इस जीत के साथ TMC को 215 सीटों का आरामदायक बहुमत दिलाया. इसके विपरीत BJP ने 72 हिंदू-बहुल सीटें (40% सफलता दर) जीतीं, लेकिन मुस्लिम बहुल क्षेत्रों से वह प्रभावी रूप से बाहर रही.
- भाजपा को बंगाल जीतने के लिए न केवल हिंदू-बहुल सीटों में हिंदू वोटों को एकजुट करना होगा, जो वह पहले से ही काफी हद तक कर चुकी है.
- साथ-साथ उसे या तो अपनी हिंदू-बहुल सीटों की संख्या में भारी वृद्धि करनी होगी जो अधिक चुनौतीपूर्ण है.
- मुस्लिम गढ़ में सेंध लगाने का तरीका खोजना होगा. दोनों ही संभावनाएं आसान नहीं दिखतीं.
हुमायूं कबीर का राजनैतिक इतिहास, नई पार्टी के साथ एंट्री और बदलते परसेप्शन
हुमायूं कबीर के 'बाबरी मस्जिद दांव' को इसी संदर्भ में समझा जाना चाहिए. भरतपुर के विधायक हुमायूं कबीर का राजनीतिक इतिहास जटिल रहा है. TMC में लौटने से पहले हुमायूं कबीर 2019 का लोकसभा चुनाव BJP के टिकट पर लड़ चुके हैं. अब दावा करते हैं कि वह मुस्लिम राजनीतिक प्रतिनिधित्व का एक वैकल्पिक ध्रुव बना रहे हैं. उनकी जनता उन्नयन पार्टी ने 2026 में 182 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की है.

TMC की प्रतिक्रिया भी काफी कुछ संकेत देती है. संवाद या तालमेल की कोशिश करने के बजाय पार्टी ने कबीर को निलंबित कर दिया और सार्वजनिक रूप से मस्जिद परियोजना से खुद को अलग कर लिया. इसके तुरंत बाद उनके परिवार के खिलाफ पुलिस कार्रवाई हुई. कबीर ने इसे राजनीतिक प्रतिशोध बताया.
इस बीच, भाजपा दोनों तरफ से खेल रही है. कबीर को TMC की 'बी-टीम' बता रही है, जबकि TMC उन पर शुरू से ही BJP का आदमी होने का आरोप लगा रही है. इन आपसी आरोपों से पता चलता है कि किसी भी पार्टी का नैरेटिव पर पूरी तरह नियंत्रण नहीं है.
गढ़ में ममता बनर्जी के दिख रहा खिलाफ असंतोष
'वोटवाइब' (VoteVibe) के 2025 के अंत के ट्रैकिंग डेटा TMC के लिए सतर्क रहने का संकेत देते हैं. हालांकि 54% मुस्लिम उत्तरदाता अभी भी ममता बनर्जी को मुख्यमंत्री के रूप में चाहते हैं, यह एक बड़ी संख्या है. लेकिन 26% उनकी सरकार के प्रदर्शन को खराब या बहुत खराब मानते हैं. लगभग 16% अभी कोई फैसला लेने की स्थिति में नहीं दिखे. इतने बड़े वोट बैंक में मामूली गिरावट भी सीटों के परिणामों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है.
विशेष रूप से हुमायूं कबीर पर पोलिंग डेटा काफी दिलचस्प है. 16 फीसदी का मानना है कि वह TMC के मुस्लिम वोटों में सेंध लगाएंगे. लेकिन 34 फीसदी को यह लगता है कि वह बीजेपी के आदमी हैं. 28 फीसदी का मानना है कि वह किसी रणनीतिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए TMC का ही एक गुप्त ऑपरेशन हैं. इन श्रेणियों के बीच का लगभग समान विभाजन एक ऐसे समुदाय की ओर इशारा करता है जो राजनीतिक रूप से परिष्कृत है, थोड़ा संशयी है और केवल व्यक्तित्व की राजनीति से आसानी से प्रभावित होने वाला नहीं है.

बिहार की तुलना बंगाल में क्यों नहीं लागू होती?
कबीर के उदय को देख रहे BJP रणनीतिकार स्वाभाविक रूप से बिहार के AIMIM प्रयोग के बारे में सोचते हैं. 2020 के बिहार चुनावों में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ने सीमांचल के मुस्लिम बहुल इलाकों में 5 सीटें जीतीं और उन्हें मुस्लिम वोटों को इस तरह बांटने का श्रेय (या दोष) दिया गया जिससे महागठबंधन को कई सीटों का नुकसान हुआ. 2025 में भी उनकी पार्टी ने यही प्रदर्शन दोहराया. क्या कबीर बंगाल में वैसी ही 'वोट कटवा' भूमिका निभा सकते हैं?
बंगाल में मुस्लिम आबादी काफी अधिक होने के बावजूद वह कहीं अधिक बिखरी हुई है. कोलकाता के शहरी इलाकों, उत्तर के ग्रामीण बेल्ट और दक्षिण के तटीय क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी फैली है. शीर्ष 5 मुस्लिम बहुल जिलों में लगभग 90 सीटें आती हैं, लेकिन मुस्लिम राज्य भर के दर्जनों अन्य निर्वाचन क्षेत्रों में भी अल्पसंख्यक हैं. यह बिखराव कबीर के नेतृत्व वाली रणनीति को बड़े पैमाने पर लागू करना काफी कठिन बनाता है.

2026 के चुनाव में क्या बन सकता है समीकरण
बंगाल चुनाव 2026 की लड़ाई की रेखाएं स्पष्ट हो रही हैं. TMC खुद को BJP के 'विभाजनकारी एजेंडे' के खिलाफ मुस्लिम हितों की एकमात्र विश्वसनीय ढाल के रूप में पेश करने की कोशिश करेगी. इस ढांचा ने 2021 और 2024 में शानदार काम किया था. उसकी चुनौती आंतरिक असंतोष को कम करने, अपने मुस्लिम आधार में 26 फीसदी असंतोष को दूर करने और कबीर को मुर्शिदाबाद और आसपास के जिलों में इतने वोट हासिल करने से रोकने की है, जिससे करीबी मुकाबलों के परिणाम बदल सकें.
भाजपा की चुनौती दूसरे तरीके से अस्तित्व की है. मुस्लिम-प्रभावित सीटों में संरचनात्मक सफलता के बिना या कबीर के पक्ष में मुस्लिम वोटों के बड़े बिखराव के बिना पार्टी हिंदू-बहुल निर्वाचन क्षेत्रों में क्लीन स्वीप करने पर निर्भर है. लेकिन यह बड़ा टास्क है. यह एक ऐसा टास्क है, जिसमें BJP 2021 के मोदी लहर में भी पिछड़ गई थी. बीजेपी को उन 209 सीटों में से 148 जीतने की जरूरत है, जहां मुस्लिम आबादी 30 फीसदी से कम है. यह हकीकत में टफ टास्क है.
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