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एकला चलो रे! पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की शून्य से शुरुआत, लेकिन बड़ी चुनौती है इस राह में...

कांग्रेस के लिए बंगाल का इस बार का चुनाव अपनी खोई हुई सियासी जमीन को वापस पाने वाला जंग होगा. लेकिन यह कोई आसान काम नहीं है, क्योंकि आजाद भारत के इतिहास में 2021 में ऐसा पहली बार हुआ जब बंगाल में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का खाता तक नहीं खुला. 

एकला चलो रे! पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की शून्य से शुरुआत, लेकिन बड़ी चुनौती है इस राह में...
कांग्रेस नेता राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे.
  • पश्चिम बंगाल में 2026 विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस पार्टी 20 साल बाद अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी में है.
  • 2021 के चुनाव में कांग्रेस वाम दलों के साथ थी, लेकिन इस चुनाव में पार्टी को सबसे शर्मनाक हार मिली.
  • कांग्रेस के पास राज्य में कोई विधायक नहीं है, लेकिन लोकसभा में मालदा दक्षिण से एक सांसद ईशा खान चौधरी हैं.

West Bengal Assembly Elections 2026: कुछ महीनों बाद पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव होना है. राज्य के चुनावी समर के लिए तैयारियां हर ओर की जा रही है. सत्तासीन तृणमूल कांग्रेस (TMC), विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी (BJP) अपनी-अपनी रणनीति में जुटी है. साथ ही सालों तक बंगाल की सत्ता पर राज करने वाले वाम दल और देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस भी चुनावी तैयारी में जुटी है. लेकिन बंगाल की यह लड़ाई कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती पेश करेगी. कांग्रेस को बंगाल में शून्य से शुरुआत करनी होगी. राज्य में पार्टी के पास एक भी विधायक नहीं है.  करीब दो दशक बाद कांग्रेस बंगाल में अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी में जुटी है. हालांकि इसमें पार्टी को कितनी सफलता मिलती है, यह देखने वाली बात होगी. 

बंगाल में 2021 में सबसे शर्मनाक स्थिति में पहुंची थी कांग्रेस

दरअसल कांग्रेस के लिए बंगाल का इस बार का चुनाव अपनी खोई हुई सियासी जमीन को वापस पाने वाला जंग होगा. लेकिन यह कोई आसान काम नहीं है, क्योंकि आजाद भारत के इतिहास में 2021 में ऐसा पहली बार हुआ जब बंगाल में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का खाता तक नहीं खुला. 

20 साल बाद अकेले दम पर चुनाव लड़ने की तैयारी में कांग्रेस

2021 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस वाम दलों के साथ गठबंधन में बंगाल में उतरी थी. लेकिन न तो कांग्रेस और ना ही वाम दल एक भी सीट जीत पाने में सफल रहे. उससे पहले के भी तीन चुनावों में कांग्रेस अलग-अलग दलों के साथ गठबंधन में उतरती रही. अब पार्टी 20 साल बाद पहली बार अकेले चुनाव लड़कर बंगाल में वापसी की उम्मीद कर रही है.

बंगाल में कांग्रेस के एकमात्र सांसद चौधरी ईशा खान.

बंगाल में कांग्रेस के एकमात्र सांसद चौधरी ईशा खान.

मालदा दक्षिण से एकमात्र सांसद, बताया क्या है कांग्रेस की रणनीति

बंगाल में कांग्रेस के एक भी विधायक नहीं है. लेकिन लोकसभा चुनाव 2024 में मालदा दक्षिण से कांग्रेस के एक उम्मीदवार को जीत मिली थी. इस समय बंगाल में कांग्रेस के एकमात्र लोकसभा सांसद ईशा खान चौधरी हैं. ईशा खान के अनुसार, "चुनावी रणनीति दो स्तरों पर काम कर रही है. हम सीटों की रिकवरी और कांग्रेस की पहचान को फिर से स्थापित करने पर ध्यान दे रहे हैं, जो पिछले कुछ वर्षों में वामपंथियों, तृणमूल आदि के साथ गठबंधन के कारण धुंधली पड़ गई थी."

2006 में कांग्रेस ने बंगाल में अकेले दम पर जीती थी 21 सीटें

2021 में कांग्रेस ने माकपा के नेतृत्व वाले वाम मोर्चे के साथ गठबंधन किया था और दोनों ही पार्टियां एक भी सीट जीतने में विफल रही थीं. इससे पहले 2006 में पार्टी ने अपने दम पर 21 सीटें जीती थीं. 2011 में कांग्रेस ने तृणमूल के साथ गठबंधन किया और ममता बनर्जी के नेतृत्व में 34 साल पुराने वाम मोर्चा शासन को उखाड़ फेंका था.

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बंगाल में इस समय दो ध्रुवीय राजनीति 

2021 में कांग्रेस और वामपंथी दल दोनों ही खाता खोलने में विफल रहे, ऐसे में 2021 की बंगाल विधानसभा एक द्विध्रुवीय सदन बन गई, जिसमें ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने 294 में से 213 सीटें जीतीं और भाजपा ने राज्य के इतिहास में पहली बार 3 से 77 सीटों तक अपनी छलांग लगाई. 

यही कांग्रेस के लिए पहली चुनौती है, जिसे न केवल राज्य में जमी हुई तृणमूल से लड़ना होगा, बल्कि केंद्र समर्थित भाजपा (जो मुख्य विपक्षी दल है) से भी मुकाबला करना होगा. कांग्रेस को मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे अपने पारंपरिक गढ़ों में सीटें वापस पाने और उत्तर बंगाल की अन्य सीटों पर वोट शेयर बढ़ाने की जरूरत है.

मुस्लिम वोटों का गणित

मालदा और मुर्शिदाबाद जिलों में राज्य की सबसे अधिक मुस्लिम आबादी (लगभग 50%) है. मुर्शिदाबाद में 20 और मालदा में 12 विधानसभा सीटें हैं. 2021 में बीजेपी ने मालदा से 4 और मुर्शिदाबाद से 2 सीटें जीती थीं, जबकि बाकी तृणमूल के खाते में गईं. ऐसे में कांग्रेस को मुस्लिम मतदाताओं का वह हिस्सा वापस पाना होगा, जो हाल के वर्षों में तृणमूल की ओर चला गया है. ईशा खान चौधरी को उम्मीद है कि इस बार CAA-NRC जैसे मुद्दों का डर कम होगा और विकास व रोजगार के मुद्दे काम करेंगे.

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हुमायूं कबीर और अधीर रंजन चौधरी का कारक

तृणमूल के निलंबित विधायक हुमायूं कबीर ने अपनी खुद की 'जनता उन्नयन पार्टी' (JUP) बनाकर अल्पसंख्यक वोटों को बांटने की कोशिश की है, जो भाजपा के लिए फायदेमंद हो सकता है. कांग्रेस इस पर नजर रख रही है. वहीं, मुर्शिदाबाद के दिग्गज कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी 2024 में अपनी बहरामपुर लोकसभा सीट हार गए थे. 

उन्हें प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटाकर शुभंकर सरकार को जिम्मेदारी दी गई है. हालांकि ईशा खान चौधरी का कहना है कि अधीर एक जननेता हैं और सरकार एक संगठन के व्यक्ति हैं, इसलिए तालमेल में कोई समस्या नहीं होगी.

बंगाल में कांग्रेस के लिए मुख्य चुनौती तृणमूल और भाजपा द्वारा बनाया गया द्विध्रुवीय स्थान है. ध्रुवीकरण भाजपा और तृणमूल के लिए काम करता है, जिससे अन्य दल हाशिए पर चले जाते हैं. कांग्रेस अब गंगा के कटाव और बेरोजगारी जैसे जमीनी मुद्दों को उठाकर जनता के बीच अपनी जगह फिर से बनाने की कोशिश कर रही है.

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