''अगर आपका वोट आपका जीवन या हालात नहीं बदल सकता है, तो आपको अपना वोट बदलने की जरूरत है.''
लोकतंत्र से जुड़ी ये बातें आमतौर पर कोई नियम नहीं है, बल्कि अपवाद के तौर पर सच साबित होती हैं. मतदाता आमतौर पर जल्दी निराश नहीं होते और न ही उनका धैर्य जल्दी जवाब देता है. इसलिए ऐसे विचारों को अक्सर मजाक में उड़ा दिया जाता है या उन्हें गंभीरता से नहीं लिया जाता है. लेकिन इतिहास बताता है कि जब ऐसा अपवाद सच होता है तो वह केवल एक चुनाव का नतीजा नहीं बदलता, बल्कि राजनीति के पूरे खेल का नियम ही बदल सकता है.
सोमवार को जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने बांकीपुर उपचुनाव में बीजेपी के उम्मीदवार को हरा दिया. इसके बाद हर तरफ यही खबर छाई रही कि बीजेपी का 31 साल पुराना गढ़ ढह गया. यह जीत इसलिए भी खास थी क्योंकि सिर्फ सात महीने पहले बिहार विधानसभा चुनाव में जन सुराज के सभी 238 उम्मीदवार हार गए थे. यही वजह है कि नतीजा आने के बाद मेरे मन में सवाल और उम्मीद दोनों पैदा हुई. क्या यह लोकतंत्र में किसी बड़े बदलाव की शुरुआत है? क्या यह सिर्फ एक पल की सफलता है या फिर एक नए राजनीतिक दौर की शुरुआत?
आलोचक अक्सर तंज कसते हैं,''बिहार में का बा?'' यानी बिहार में आखिर है ही क्या? लेकिन जो लोग बिना किसी पूर्वाग्रह के बिहार को समझने की कोशिश करते हैं, वे जानते हैं कि गरीबी, पिछड़ेपन और जाति आधारित राजनीति के मजबूत असर के बावजूद बिहार का मतदाता कभी-कभी ऐसा फैसला देता है, जो लोकतंत्र में नई उम्मीद जगा देता है. यह बदलाव हमेशा बना रहे, इसकी कोई गारंटी नहीं है. समय के साथ यह अच्छा भी साबित हो सकता है, बुरा भी या फिर बिल्कुल अलग रूप भी ले सकता है.
जब भैंस पर सवार होकर अपने गांव पहुंचे लालू यादव
मैं फरवरी 1990 में बिहार विधानसभा चुनाव की रिपोर्टिंग कर रहा था. वह सचमुच एक ऐतिहासिक और असाधारण समय था. देश के सबसे गरीब राज्य बिहार में, जहां लोगों के पास बुनियादी सुविधाएं, उम्मीद और संवेदनशील शासन, तीनों की कमी थी. वहां मतदाताओं ने बड़ा फैसला लिया. उस चुनाव में लोगों ने केवल सत्ता मंडल राजनीति के नेताओं के हाथों में नहीं सौंपी या तथाकथित ऊंची जातियों के लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक वर्चस्व को ही खत्म नहीं किया. उन्होंने कांग्रेस को भी इतनी बुरी तरह से हराया कि वह आज तक बिहार और पड़ोसी उत्तर प्रदेश में अपनी पुरानी ताकत वापस नहीं पा सकी है.

बांकीपुर में बीजेपी से नाराज सवर्ण मतदाताओं ने लालू प्रसाद यादव की आरजेडी की जगह प्रशांत किशोर की जुन सुराज पार्टी को तरजीह दी.
मतदाता लोकतंत्र की दिशा बदल सकते हैं. इसका सबसे बड़ा सबूत मुझे कुछ दिन बाद मिला. 10 मार्च 1990 को लालू प्रसाद ने बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी. शपथ लेने के बाद वे अपने पैतृक गांव फुलवरिया पहुंचे. हम पत्रकार भी उनके साथ थे. वहां धूल से सने, बिना चप्पल और बिना शर्ट के छोटे-छोटे बच्चे, जिनकी आंखों में उम्मीद साफ दिखाई देती थी, उन्हें देखकर खुशी से तालियां बजा रहे थे. लालू अब मुख्यमंत्री बन चुके थे. पूरा राज्य उनके लिए एक मंच जैसा था. उसी दौरान उन्होंने पास में चर रही एक भैंस पर फुर्ती से छलांग लगाई और उसकी पीठ पर बैठ गए. इसके बाद जुलूस आगे बढ़ने लगा. घर पहुंचने पर देखा तो उनकी मां खाना बना रही थीं. लालू उन्हें बताना चाहते थे कि अब वे बिहार के मुख्यमंत्री बन गए हैं. लेकिन उनकी मां की दुनिया बहुत सीमित थी. उन्हें न तो 'बिहार' का मतलब पता था और न ही 'मुख्यमंत्री'का. तब लालू ने उन्हें समझाने के लिए कहा,''मैं हथुआ का राजा बन गया हूं.''
उनकी मां हथुआ राज की जमींदारी से परिचित थीं, जो भूमिहार ब्राह्मणों के बघोचिया परिवार के पास थी. लालू का मतलब यह था कि अब वे पूरे राज्य के सबसे ताकतवर व्यक्ति बन चुके हैं. उनकी मां की नजर में सबसे शक्तिशाली व्यक्ति 'हथुआ राजा' ही था, इसलिए उन्होंने उसी उदाहरण से अपनी बात समझाई.
उस दिन फुलवरिया के उस छोटे से घर में बैठकर मुझे पहली बार एहसास हुआ कि मतदाताओं ने अपने वोट की कितनी बड़ी ताकत दिखाई है. और आज, न्यूजरूम में बैठकर मेरे पास इस बात के ठोस सबूत हैं कि फरवरी 1990 में आए उस बदलाव ने भारतीय राजनीति की दिशा ही बदल दी. यह बदलाव अच्छा था, बुरा था या मिला-जुला, इस पर आज भी बहस जारी है.
क्या बांकीपुर जैसी जीत दोहरा पाएगी जन सुराज पार्टी
प्रशांत किशोर या उनकी जन सुराज पार्टी के लिए बांकीपुर जैसी जीत को पूरे बिहार में दोहराना आसान नहीं होगा. 1990 में मंडल और मंदिर की राजनीति का जो असर पूरे राज्य में देखने को मिला था, वैसा प्रभाव पैदा करना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है. लेकिन फिर भी मैं बांकीपुर उपचुनाव के नतीजे को उम्मीद की नजर से देखना चाहता हूं. इसकी वजह यह है कि यहां मतदाताओं ने पार्टी से ज्यादा उम्मीदवार को महत्व दिया और अपनी पसंद बदली. यानी बिहार जैसे जाति-आधारित राजनीति वाले राज्य में भी लोगों ने सिर्फ जाति नहीं, बल्कि किसी और वजह से वोट दिया.
बांकीपुर को लंबे समय से बीजेपी का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है. यह बिहार का सबसे शहरी इलाकों में से एक है. यहीं मुख्यमंत्री का सरकारी आवास है, राज्य का प्रमुख विश्वविद्यालय है, ऐतिहासिक गांधी मैदान है और उसके आसपास का महत्वपूर्ण इलाका भी इसी विधानसभा क्षेत्र में आता है. बांकीपुर का जातीय समीकरण भी बीजेपी के पक्ष में रहा है. यहां ऊंची जातियों के मतदाता 35-40 फीसद हैं. नीतीश कुमार के साथ होने की वजह से बीजेपी के पास करीब 50 फीसद वोटों का मजबूत आधार माना जाता था.एक और बड़ी बात यह थी कि ऊंची जातियों के मतदाताओं में 14-15 फीसद कायस्थ जाति के हैं. साल 1995 से लेकर परिसीमन से पहले के पटना पश्चिम विधानसभा क्षेत्र में बीजेपी लगातार कायस्थ उम्मीदवार नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा को टिकट देती रही. साल 2010 में परिसीमन के बाद पहली बार बनी बांकीपुर विधानसभा सीट से बीजेपी के नितिन नवीन चुनाव जीते. नितिन नवीन और उनके पिता ने मिलकर 31 साल में नौ बार इस सीट पर जीत दर्ज की. इसी वजह से बांकीपुर को बीजेपी का लगभग अभेद्य किला माना जाता था.
चुनाव से पहले हालात पूरी तरह बीजेपी के पक्ष में नजर आ रहे थे. बिहार में बीजेपी के पहले मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी खुद चुनाव का मोर्चा संभाले हुए थे. केवल सात महीने पहले हुए बिहार विधानसभा चुनाव में बीजेपी–जेडीयू–एलजेपी गठबंधन ने इंडिया गठबंधन, खासकर आरजेडी को करारी शिकस्त दी थी.
बांकीपुर में बीजेपी की हार की सबसे बड़ी वजह क्या है
कई लोगों का मानना है कि बीजेपी की हार की सबसे बड़ी वजह उसका अतिआत्मविश्वास था. मतदान से पहले पार्टी के कई नेताओं को लगता था कि बांकीपुर में उम्मीदवार का चेहरा नहीं, बल्कि कमल का चुनाव चिन्ह ही जीत दिलाने के लिए काफी है. चुनाव की शुरुआत से ही बीजेपी को उम्मीदवार के चयन को लेकर परेशानी का सामना करना पड़ा. नितिन नवीन के राज्यसभा जाने के बाद पार्टी ने पहले अभिषेक कुमार सिन्हा को उम्मीदवार बनाया. लेकिन बाद में उन्होंने चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया. उनके पिता का नाम लालू प्रसाद से जुड़े एक पुराने घोटाले में आया था. बीजेपी को डर था कि प्रशांत किशोर इस मुद्दे को चुनाव में भ्रष्टाचार का बड़ा हथियार बना सकते हैं.

बांकीपुर में प्रशांत किशोर की जीत की एक बड़ी वजह सवर्ण मतदाताओं की बीजेपी से नाराजगी को बताया जा रहा है.
इसके बाद बीजेपी ने नीरज कुमार सिन्हा को उम्मीदवार बनाया. प्रशांत किशोर के घर-घर जाकर लोगों से सीधे संपर्क करने वाले अभियान का मुकाबला करने के लिए बीजेपी ने कई बड़े नेताओं को प्रचार में उतार दिया. लेकिन इसके बावजूद बीजेपी मतदाताओं की नाराजगी की गहराई को समझ नहीं पाई. चुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी समर्थकों के बीच सबसे ज्यादा सुनाई देने वाली बात थी,''इस बार पार्टी को सबक सिखाना जरूरी है.''
सुबह की सैर के दौरान बांकीपुर में कई जगह बुजुर्ग मतदाता बीजेपी नेतृत्व के बढ़ते आत्मविश्वास और दिखावे भरे रवैये से नाराज नजर आए. मतदान से करीब एक सप्ताह पहले पटना विश्वविद्यालय के एक पूर्व प्रोफेसर, जो एक साहित्यिक क्लब भी चलाते हैं, ने फोन पर मुझसे कहा,''इस क्षेत्र के मतदाता सिर्फ बिजली, सड़क और पानी के मुद्दों पर वोट नहीं करते. वे रविशंकर प्रसाद को इसलिए चुनते रहे हैं क्योंकि वे उनकी बौद्धिक क्षमता, अनुभव और व्यापक सोच को महत्व देते हैं. इसके साथ जातीय और वैचारिक समर्थन भी जुड़ा रहा है. लेकिन अगर पार्टी मतदाताओं को हल्के में लेने लगे, तो समर्थन बिखरने लगता है. ऐसे मतदाता आरजेडी की ओर नहीं जाएंगे, लेकिन प्रशांत किशोर उनके लिए एक भरोसेमंद विकल्प बन सकते हैं.''
पिछले 31 सालों से बांकीपुर में बीजेपी की सफलता का बड़ा कारण यहां की सामाजिक और जनसांख्यिकीय संरचना रही है. लेकिन इस बार पढ़े-लिखे, अपेक्षाकृत संपन्न और बड़ी संख्या में मौजूद सवर्ण मतदाताओं का एक वर्ग कई वजहों से असंतुष्ट दिखाई दिया. उन्हें लगा कि बीजेपी का राजनीतिक और सामाजिक फोकस अब सवर्णों से हटकर पिछड़े और अति पिछड़े वर्गों की ओर अधिक हो गया है. हालांकि कायस्थ जाति के नितिन नवीन को आगे बढ़ाया गया, लेकिन कई लोगों ने इसे सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद सवर्ण नेतृत्व के संतुलन के लिए पर्याप्त नहीं माना.बिहार लंबे समय से बेरोजगारी की समस्या से जूझ रहा है. इसकी वजह से बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में पलायन करना पड़ा है. बांकीपुर में भी बड़ी संख्या में शिक्षित युवा रहते हैं जो या तो नौकरी की तलाश में हैं या फिर बेहतर अवसर और अच्छी गुणवत्ता वाली नौकरियों की उम्मीद कर रहे हैं. यही मुद्दा इस चुनाव में भी उनके लिए महत्वपूर्ण बना रहा.
प्रशांत किशोर कौन से मुद्दे उठाते रहे हैं
साल 2022 में पदयात्रा शुरू करने के बाद से ही बेरोजगारी, शिक्षा और युवाओं के मुद्दे प्रशांत किशोर के अभियान का केंद्र रहे हैं. बांकीपुर चुनाव में भी उन्होंने इन्हीं मुद्दों को लगातार उठाया, लेकिन इस बार उनका सीधा निशाना मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी थे. उन्होंने चुनाव को बीजेपी उम्मीदवार बनाम बाकी दलों की लड़ाई नहीं रहने दिया, बल्कि इसे प्रशांत किशोर बनाम सम्राट चौधरी की सीधी टक्कर में बदल दिया. इससे बीजेपी के उम्मीदवार नीरज कुमार और दूसरे प्रत्याशी मतदाताओं की चर्चा से लगभग बाहर हो गए.

बांकीपुर के उपचुनाव में मिली जीत का जश्न मनाते जन सुराज पार्टी के कार्यकर्ता.
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इसी बीच यूजीसी के नए दिशा-निर्देश, नीट पेपर लीक और उसके बाद छात्रों के विरोध-प्रदर्शन जैसे मुद्दे सामने आ गए. बांकीपुर में शायद ही कोई छात्र स्कूल के बाद पढ़ाई छोड़ता हो. यहां लगभग हर परिवार उच्च शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर गंभीर रहता है. यूजीसी से जुड़े संस्थान और नीट जैसी परीक्षाएं, यहां लगभग हर घर का हिस्सा हैं.
बांकीपुर में हर कुछ सौ मीटर पर कॉलेज या कोचिंग संस्थान मिल जाते हैं. यहां करीब एक-तिहाई मतदाता 30 साल से कम उम्र के हैं. इस पीढ़ी ने लालू प्रसाद यादव के शासनकाल, जिसे एनडीए अक्सर 'जंगलराज' कहता है, को या तो देखा नहीं है या उसकी याद बहुत कम है. इसलिए इन युवाओं पर पुरानी राजनीतिक या जातीय सोच का असर अपेक्षाकृत कम है. लेकिन शिक्षा व्यवस्था में पैदा हुई अनिश्चितता, परीक्षा से जुड़े विवाद और अव्यवस्था ने उन्हें नाराज कर दिया. युवाओं की यह नाराजगी उनके परिवारों तक भी पहुंची और मतदान के फैसलों को प्रभावित करती दिखी.
पटना की राजनीति के जानकारों का कहना है कि इस चुनाव में सवर्ण मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा बीजेपी से दूर हो गया. उनका अनुमान है कि कायस्थ और अन्य सवर्ण समुदायों के लगभग आधे वोट बीजेपी से खिसक गए. यह स्थिति बीजेपी के लिए चिंता का विषय हो सकती है, क्योंकि फरवरी 2027 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव होने हैं. वहां भी सवर्ण मतदाता पार्टी का अहम आधार माने जाते हैं.
दिलचस्प बात यह रही कि बांकीपुर के मतदाताओं ने इस बार अपनी पसंद तो बदली, लेकिन मतदान का एक पुराना पैटर्न कायम रखा. पहले भी यहां जाति एक महत्वपूर्ण कारक रही है, लेकिन मतदाता अपने फैसले को हमेशा विकास, शिक्षा और प्रगतिशील सोच के साथ जोड़कर देखते रहे हैं.
सवर्ण समुदाय में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) को लेकर गहरी नाराजगी और अविश्वास अब भी बना हुआ है. आरजेडी के 15 साल के शासनकाल में इस वर्ग ने खुद को पूरी तरह अलग-थलग महसूस किया. कई लोगों के लिए 'लालू राज' का मतलब 'यादव राज' बन गया था. उस दौर में राज्य की खराब होती कानून-व्यवस्था और आर्थिक गिरावट का असर सवर्ण समुदाय पर भी पड़ा.यही वजह रही कि बड़ी संख्या में लोग रोजगार और बेहतर जीवन की तलाश में दिल्ली, उत्तर प्रदेश और दूसरे महानगरों की ओर पलायन कर गए. इसके बाद उन्होंने लंबे समय तक बीजेपी या बीजेपी के साथ गठबंधन में रहने वाली जेडीयू को अपना राजनीतिक विकल्प बनाए रखा.
क्या बीजेपी से नाराज हैं सवर्ण मतदाता
यही वजह है कि इस चुनाव में जब सवर्ण मतदाता बीजेपी से नाराज हुए, तब भी उन्होंने आरजेडी को विकल्प नहीं माना. इसकी बजाय बड़ी संख्या में उनका झुकाव प्रशांत किशोर की ओर दिखाई दिया. दिलचस्प बात यह है कि प्रशांत किशोर अपने नाम के साथ उपनाम (सरनेम) का इस्तेमाल नहीं करते हैं. वो काफी समय से राजनीति में जाति के प्रभाव का विरोध करते रहे हैं. हालांकि यह सर्वविदित है कि वह ब्राह्मण हैं. ऐसे में माना जा रहा है कि सवर्ण मतदाता बीजेपी से तो दूर हुए, लेकिन उनका झुकाव ऐसे नेता की ओर रहा जिसकी छवि साफ-सुथरी राजनीति की हो और जिसकी सामाजिक पृष्ठभूमि भी सवर्ण समुदाय से जुड़ी हो.

बांकीपुर में हुए उपचुनाव का नतीजा आने के बाद बिहार बीजेपी के ऑफिस में पसरा सन्नाटा.
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बांकीपुर में प्रशांत किशोर की जीत सिर्फ बीजेपी के लिए ही नहीं, बल्कि आरजेडी और तेजस्वी यादव के लिए भी चिंता का विषय हो सकती है. इस नतीजे से संकेत मिलता है कि बीजेपी या एनडीए के कुछ पारंपरिक मतदाता पार्टी से नाराज होने पर भी आरजेडी को अपना विकल्प नहीं मान रहे हैं. वे किसी नए विकल्प की तलाश में हैं. हालांकि, राजनीति के जानकार अभी प्रशांत किशोर की इस जीत को किसी बड़े राजनीतिक बदलाव की शुरुआत मानने से बच रहे हैं. उनकी सावधानी की अपनी वजह है. बांकीपुर का सामाजिक और राजनीतिक माहौल बिहार के बाकी विधानसभा क्षेत्रों से काफी अलग है. इसे उत्तर प्रदेश के नोएडा जैसा क्षेत्र माना जा सकता है, जहां अपेक्षाकृत पढ़े-लिखे, शहरी और जागरूक मतदाता अधिक हैं. इसलिए केवल इस सीट की जीत के आधार पर यह मान लेना कि जन सुराज पार्टी पूरे बिहार में बड़ी ताकत बन जाएगी, थोड़ी जल्दबाजी होगी. इसके लिए प्रशांत किशोर को राज्यभर में मजबूत संगठन खड़ा करना होगा, ऐसे उम्मीदवार उतारने होंगे जो स्थानीय जनता की अपेक्षाओं पर खरे उतरें और ऐसा माहौल बनाना होगा जो इस बदलाव को व्यापक समर्थन दिला सके.
बिहार के मतदाता पहले भी बड़े राजनीतिक बदलाव कर चुके हैं. 1990 के दशक में उन्होंने सत्ता परिवर्तन कराया और बाद में नीतीश कुमार को भी मौका दिया. लोगों को उनकी सोच और योजनाएं पसंद आईं. लड़कियों के लिए साइकिल योजना, महिलाओं के लिए विभिन्न कल्याणकारी योजनाएं और अति पिछड़े वर्गों को राजनीतिक रूप से मजबूत करने जैसे फैसलों ने उन्हें लंबे समय तक प्रासंगिक बनाए रखा. यही वजह रही कि बीजेपी और आरजेडी, दोनों को कई सालों तक नीतीश कुमार के साथ गठबंधन की जरूरत पड़ती रही.
बीजेपी आज भी देश की सबसे मजबूत चुनावी मशीनरी वाली पार्टियों में गिनी जाती है. इसलिए माना जा रहा है कि वह इस हार से सबक लेकर अपनी रणनीति में बदलाव करेगी. हालांकि, पार्टी नेतृत्व के कुछ नेताओं का अत्यधिक आत्मविश्वास और आक्रामक रवैया मतदाताओं को खटकने लगा है. इसके अलावा, सक्रिय राजनीति में नीतीश कुमार की पहले जैसी भूमिका न रहने से जो खालीपन पैदा हुआ है, उसकी भरपाई का रास्ता भी बीजेपी को तलाशना होगा.
इसी वजह से कई राजनीतिक विश्लेषक बैंकीपुर के नतीजे को बिहार की राजनीति में बड़े बदलाव का शुरुआती संकेत मानने से इनकार करते हैं. उनका कहना है कि तमिलनाडु में अभिनेता विजय को मिला समर्थन और पारंपरिक दलों के खिलाफ माहौल दक्षिण भारत की अलग राजनीतिक परिस्थितियों का परिणाम है. वहीं दूसरी ओर कुछ लोग यह तर्क भी देते हैं कि नई राजनीतिक ताकतों और पारंपरिक दलों से अलग विकल्पों को जनता का समर्थन मिलना इस बात का संकेत है कि मतदाता नए प्रयोग करने के लिए तैयार हैं.
भारतीय राजनीति का इतिहास बताता है कि कई बार जन आंदोलनों का असर चुनावी नतीजों में नहीं दिखता, जबकि कई बार यही आंदोलन चुनाव में भारी जनसमर्थन की लहर बन जाते हैं. इसलिए बांकीपुर के चुनाव परिणाम को लेकर अलग-अलग लोगों की राय भी अलग होगी. यह इस बात पर निर्भर करता है कि कोई मतदाता वोट की बदलाव लाने की क्षमता पर कितना भरोसा करता है और इस नतीजे को कितना बड़ा राजनीतिक संकेत मानता है.
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