- पटना की हाईप्रोफाइल बांकीपुर सीट पर हो उपचुनाव में GenZ फैक्टर भी दिख रहा है.
- बांकीपुर में लगभग 1.20 से 1.35 लाख मतदाता 18 से 29 साल की उम्र के हैं.
- यहां बीजेपी के नीरज सिन्हा और जनसुराज के प्रशांत किशोर के बीच मुकाबला है.
पटना की बांकीपुर विधानसभा सीट पर हो रहा उपचुनाव अब सिर्फ एक सीट का चुनाव नहीं रह गया है. यह चुनाव बीजेपी की प्रतिष्ठा, जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर की राजनीतिक ताकत और बिहार की नई पीढ़ी यानी GenZ मतदाताओं की भूमिका की भी परीक्षा बन गया है. हाल ही में हुए छात्र आंदोलन के बाद इस चुनाव की चर्चा और भी तेज हो गई है. अब सवाल यह है कि क्या छात्र आंदोलन का असर बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में कितना दिखेगा. लेकिन यह मुद्दा अब दिल्ली से लेकर बिहार तक चर्चा में बना हुआ है. क्योंकि छात्र आंदोलन के बाद इस उपचुनाव पर सबकी नजरे हैं.
बीजेपी का गढ़ है बांकीपुर सीट
बांकीपुर विधानसभा सीट लंबे समय से भाजपा का मजबूत गढ़ माना जाता है. कई चुनावों से इस सीट पर भाजपा का कब्जा रहा है. बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन लगातार यहां से विधायक चुने जाते रहे. उनके भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने और राज्यसभा जाने के बाद यह सीट खाली हुई. ऐसे में भाजपा के लिए यह उपचुनाव अपनी प्रतिष्ठा बचाने का सवाल बन गया है. बीजेपी ने यहां नीरज सिन्हा को प्रत्याशी बनाया है. दूसरी तरफ प्रशांत किशोर खुद मैदान में उतरकर भाजपा को उसके सबसे मजबूत गढ़ में चुनौती दे रहे हैं. इसलिए पूरे बिहार की नजर इस चुनाव पर है.
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बांकीपुर में GenZ फैक्टर
इस चुनाव की सबसे बड़ी खासियत यहां के युवा मतदाता हैं. जिससे यहां GenZ फैक्टर दिख रहा है. बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र में बड़ी संख्या में कॉलेज, विश्वविद्यालय, कोचिंग संस्थान और छात्रावास हैं. पटना विश्वविद्यालय, एनआईटी पटना, बीएन कॉलेज, साइंस कॉलेज, एएन कॉलेज, चाणक्य लॉ यूनिवर्सिटी और कई बड़े कोचिंग संस्थानों की वजह से यहां हर साल हजारों छात्र पढ़ाई के लिए आते हैं. निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार बांकीपुर विधानसभा में करीब 3.79 लाख मतदाता हैं. इनमें लगभग 1.20 से 1.35 लाख मतदाता 18 से 29 साल की उम्र के हैं. यानी करीब एक-तिहाई मतदाता युवा हैं. यही वजह है कि इस बार जेनज़ी को चुनाव का बड़ा फैक्टर माना जा रहा है.
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क्या दिखेगा छात्र आंदोलन का असर ?
हाल में हुए छात्र आंदोलन ने इस वर्ग को राजनीतिक रूप से पहले की तुलना में ज्यादा सक्रिय किया है. रोजगार, शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों पर बड़ी संख्या में छात्र सड़कों पर उतरे. आंदोलन के दौरान पुलिस कार्रवाई, लाठीचार्ज, पानी की बौछार और बैरिकेडिंग की तस्वीरें सोशल मीडिया पर तेजी से फैलीं. इसके बाद पूरे बिहार में इस आंदोलन की चर्चा होने लगी. इससे शिक्षा और रोजगार का मुद्दा चुनावी बहस के केंद्र में आ गया.
बांकीपुर पर राजनीतिक जानकारों की राय
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस माहौल का फायदा उठाने की कोशिश सभी दल करेंगे. प्रशांत किशोर लगातार शिक्षा, रोजगार, पलायन और सरकारी व्यवस्था जैसे मुद्दे उठा रहे हैं. दूसरी तरफ भाजपा विकास कार्यों, मजबूत संगठन और अपने पुराने वोट बैंक के भरोसे चुनाव लड़ रही है. इसलिए दोनों पक्षों की रणनीति अलग-अलग है. हालांकि केवल आंदोलन होने से चुनाव का नतीजा तय नहीं हो जाता. बिहार के चुनावी इतिहास में कई बड़े आंदोलन हुए हैं, लेकिन हर आंदोलन वोट में नहीं बदला. बड़ी संख्या में छात्र आंदोलन में शामिल होते हैं, लेकिन मतदान के दिन कई छात्र अपने घर चले जाते हैं या वोट डालने नहीं पहुंचते. इसलिए यह देखना भी जरूरी होगा कि आंदोलन में दिखी भीड़ मतदान के दिन भी नजर आती है या नहीं.
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बीजेपी के पास मजबूत संगठन
भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका मजबूत संगठन है. पार्टी का बूथ स्तर तक नेटवर्क है. व्यापारी वर्ग, मध्यम वर्ग और लंबे समय से भाजपा के समर्थक मतदाता बांकीपुर में बड़ी संख्या में हैं. भाजपा की कोशिश होगी कि चुनाव को विकास, संगठन और स्थिर नेतृत्व के मुद्दे पर रखा जाए. वहीं युवा मतदाता पारंपरिक वोटर से अलग माने जाते हैं. यह वर्ग सोशल मीडिया पर ज्यादा सक्रिय रहता है. नए मुद्दों पर जल्दी अपनी राय बनाता है और किसी एक दल के साथ हमेशा नहीं रहता. यही वजह है कि जेनज़ी को किसी भी दल का पक्का वोट बैंक नहीं माना जाता. चुनाव के दौरान उनका रुख बदल भी सकता है.
कैसा रहेगा समीकरण ?
हालांकि अब छात्र आंदोलन पहले जैसा तेज नहीं दिख रहा है. सरकार और केंद्र स्तर पर हुए कुछ फैसलों के बाद माहौल काफी शांत हुआ है. खासकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद आंदोलन की रफ्तार काफी धीमी पड़ गई. ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आंदोलन की नाराजगी मतदान तक बनी रहती है या चुनाव फिर पुराने चुनावी समीकरणों पर लौट जाता है. अब सबकी नजर युवा मतदाताओं पर है. अगर 18 से 29 साल के मतदाता बड़ी संख्या में मतदान करते हैं और शिक्षा, रोजगार तथा छात्र आंदोलन जैसे मुद्दों को ध्यान में रखकर वोट देते हैं, तो चुनाव का मुकाबला पहले से ज्यादा दिलचस्प हो सकता है. लेकिन अगर पहले की तरह पारंपरिक वोट बैंक ही सबसे बड़ी भूमिका निभाता है, तो भाजपा के लिए अपनी सीट बचाना आसान हो सकता है.
बांकीपुर का यह उपचुनाव सिर्फ एक विधानसभा सीट का चुनाव नहीं है. यह भाजपा के गढ़ की परीक्षा है, प्रशांत किशोर की राजनीतिक चुनौती है और सबसे बढ़कर बिहार की नई पीढ़ी की चुनावी ताकत की भी परीक्षा है. इस चुनाव का नतीजा यह बताएगा कि सोशल मीडिया और सड़कों पर दिखी जेनज़ी की ताकत क्या मतदान केंद्र तक पहुंचती है या फिर बिहार की राजनीति एक बार फिर पुराने चुनावी गणित के हिसाब से चलती है.
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