सिंधु जल संधि को लेकर भारत-पाकिस्तान के बीच पैदा हुए तनाव और विवादों के बाद अब बांग्लादेश को भी अपने जल अधिकारों को लेकर गहरा डर सताने लगा है. पिछले साल पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि को रोक दिया था. इधर, बांग्लादेश सीमा पर साल 1996 में भारत के साथ हुआ 30-वर्षीय गंगा जल समझौता इस वर्ष दिसंबर में समाप्त होने जा रहा है.
ऐसे में बांग्लादेश को आशंका है कि यदि नए समझौते में कड़े कानूनी प्रावधान नहीं जोड़े गए, तो भविष्य में उसे भी पाकिस्तान की तरह शुष्क मौसम में पानी की भारी किल्लत या कूटनीतिक दबाव का सामना करना पड़ सकता है. इसी डर के चलते बांग्लादेश अब गंगा जल समझौते के नवीनीकरण में 1977 वाले गारंटी क्लॉज को दोबारा शामिल करने पर अड़ गया है, ताकि उसे हर परिस्थिति में न्यूनतम पानी की पक्की गारंटी मिल सके.
"गंगा जल संधि: पुनर्निधारण के मुद्दे" विषय पर सेमिनार
सरकारी समाचार एजेंसी BSS की रिपोर्ट के अनुसार बांग्लादेशी जल संसाधन मंत्री शाहिद उद्दीन चौधरी एनी ने मंगलवार को ढाका में 'बांग्लादेश इंस्टीट्यूट ऑफ लॉ एंड इंटरनेशनल अफेयर्स' द्वारा आयोजित "गंगा जल संधि: पुनर्निधारण के मुद्दे" विषय पर एक सेमिनार में कहा कि 1996 के समझौते में जो गारंटी क्लॉज हटा दिया गया था, उसे बहाल करना बेहद जरूरी है. यह प्रावधान निचले तटवर्ती देश (बांग्लादेश) को सूखे के दिनों में भी एक निश्चित मात्रा में जल आपूर्ति की कानूनी सुरक्षा देता है.
संधि से नाखुश क्यों बांग्लादेश?
बांग्लादेश मौजूदा संधि से मुख्य रूप से इसलिए नाखुश है क्योंकि उसे लगता है कि यह संधि सूखे के मौसम में पर्याप्त और भरोसेमंद पानी की गारंटी नहीं देती है. IMPRI थिंक टैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार, पानी के बंटवारे का फॉर्मूला पुरानी हाइड्रोलॉजिकल स्थितियों पर आधारित है, जबकि सूखे के मौसम में नदी का बहाव अब अधिक अनिश्चित हो गया है. बांग्लादेश का यह भी कहना है कि संधि में पर्यावरण से जुड़ी बातें अपर्याप्त हैं और वह नदी के ऊपरी हिस्से से पानी निकालने, नदी की सेहत, खारेपन और इकोलॉजिकल फ्लो (पारिस्थितिक प्रवाह) जैसे मुद्दों पर व्यापक विचार-विमर्श चाहता है.
फरक्का बैराज को "मौत का जाल" मानते बांग्लादेश के लोग
भारत और बांग्लादेश के बीच पानी का बंटवारे को लेकर गंगा पर बना फरक्का बैराज भी विवाद का एक बड़ा कारण रहा है. पश्चिम बंगाल में भारत द्वारा बनाया गया यह बैराज गंगा के पानी के एक हिस्से को हुगली नदी प्रणाली की ओर मोड़ने के लिए बनाया गया था. सूखे के मौसम में नदी के निचले हिस्से में पानी का बहाव कम होने की चिंताओं के कारण बांग्लादेश में लंबे समय से इसकी आलोचना होती रही है. एनी ने मंगलवार को कहा कि बांग्लादेशी लोग लंबे समय से फरक्का बैराज को "मौत का जाल" मानते रहे हैं. उन्होंने कहा कि फरक्का के बाद भारत ने गंगा पर कई बैराज और लगभग 900 तटबंध बनाए हैं, जिससे दोनों देशों के रिश्तों में तनाव आया है.
संयुक्त नदी आयोग के जरिए बातचीत
विदेश मंत्रालय के अनुसार, भारत का कहना है कि फरक्का बैराज कोई बांध नहीं, बल्कि पानी का बहाव मोड़ने वाला एक ढांचा है. इसे गेट्स की एक प्रणाली के ज़रिए गंगा के लगभग 40,000 क्यूसेक पानी को फरक्का नहर में भेजने के लिए डिज़ाइन किया गया है, जबकि बाकी पानी नदी के निचले हिस्से में बांग्लादेश की ओर बहता रहता है. मंत्रालय ने यह भी कहा कि प्रोटोकॉल के तहत ज़रूरी होने पर 'संयुक्त नदी आयोग' के ज़रिए बांग्लादेश के साथ पानी के बहाव का डेटा नियमित रूप से साझा किया जाता है. बांग्लादेश और भारत के बीच 54 प्रमुख नदियां साझा होती हैं, और गंगा इनमें से सबसे महत्वपूर्ण सीमा-पार जलमार्गों में से एक है. दोनों देश पानी के बंटवारे और नदी से जुड़े मामलों पर संयुक्त नदी आयोग के माध्यम से बातचीत करते हैं.
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